
-आचार्य बालक्रष्ण
घ्रणा करने वाला निन्दा, द्वेष, ईर्ष्या करने वाले व्यक्ति को यह डर भी हमेशा सताये रहता है कि जिससे मैं घ्रणा करता हूँ कहीं वह भी मेरी निन्दा व मुझसे घ्रणा न करना शुरु कर दे।
-आचार्य बालक्रष्ण
निन्दक दूसरों के आर-पार देखना पसन्द करता है, परन्तु खुद अपने आर-पार देखना नहीं चाहता।
-आचार्य बालक्रष्ण
असंयम की राह पर चलने से आनन्द की मंजिल नहीं मिलती।
-आचार्य बालक्रष्ण
मेरे पूर्वज, मेरे स्वाभिमान।
-आचार्य बालक्रष्ण
गुणों की व्रध्दि और क्षय तो अपने कर्मों से होता है।
-आचार्य बालक्रष्ण
सज्जन व कर्मशील व्यक्ति तो यह जानता है कि शब्दों की अपेक्षा कर्म अधिक जोर से बोलते हैं। अत: वह अपने शुभकर्म में ही निमग्न रहता है।
-आचार्य बालक्रष्ण
जो किसी की निन्दा स्तुति में ही अपने समय को बर्बाद करता है वह बेचारा दया का पात्र है, अबोध है।
-आचार्य बालक्रष्ण
आयुर्वेद हमारी मिट्टी हमारी संस्कृति व प्रक्रति से जुडी हुई निरापद चिकित्सा पध्दति है।
-आचार्य बालक्रष्ण
शरीर स्वस्थ और निरोग हो तो ही व्यक्ति दिनचर्या का पालन विधिवत कर सकता है, दैनिक कार्य और श्रम कर सकता है।
-आचार्य बालक्रष्ण
आयुर्वेद वस्तुत: जीवन जीने का ज्ञान प्रदान करता है, अत: इसे हम धर्म से अलग नहीं कर सकते। इसका उद्देश्य भी जीवन के उद्देश्य की भांति चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति ही है।
-आचार्य बालक्रष्ण
आनन्द प्राप्ति हेतु त्याग व संयम के पथ पर बढना होगा।
-आचार्य बालक्रष्ण
जब आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय विषय से जुडता है, तभी ज्ञान प्राप्त हो पाता है।
-आचार्य बालक्रष्ण
जो मनुष्य मन, वचन और कर्म से, गलत कार्यो से बचा रहता है, वह स्वयं भी प्रसन्न रहता है।
-आचार्य बालक्रष्ण