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Biography (hindi)

सायना नेहवाल जीवनी - Biography of Saina Nehwal in Hindi Jivani

साइना नेहवाल भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं। वर्तमान में वह दुनिया की शीर्ष वरीयता प्राप्त महिला बैडमिंटन खिलाडी हैं तथा इस मुकाम तक पहुँचने वाली वे प्रथम भारतीय महिला हैं। साथ ही एक महीने में तीसरी बार प्रथम वरीयता पाने वाली भी वो अकेली महिला खिलाडी हैं। लंदन ओलंपिक २०१२ मे साइना ने इतिहास रचते हुए बैडमिंटन की महिला एकल स्पर्धा में कांस्य पदक हासिल किया।

        बैडमिंटन मे ऐसा करने वाली वे भारत की पहली खिलाड़ी हैं। २००८ में बीजिंग में आयोजित हुए ओलंपिक खेलों मे भी वे क्वार्टर फाइनल तक पहुँची थी। वह बीडबल्युएफ विश्व कनिष्ठ प्रतियोगिता जीतने वाली पहली भारतीय हैं। वर्तमान में वह शीर्ष महिला भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं और भारतीय बैडमिंटन लीग में अवध वैरियर्स की तरफ से खेलती हैं।

प्रारंभिक जीवन :

        साइना का जन्म १७ मार्च १९९० को हिसार, हरियाणा के एक जाट परिवार मे हुआ था। इनके पिता का नाम डॉ॰ हरवीर सिंह नेहवाल और माता का नाम उषा नेहवाल है। साइना साईं के नाम से बना है। सायना ने शुरुआती प्रशि‍क्षण हैदराबाद के लाल बहादुर स्‍टेडि‍यम, हैदराबाद में कोच नानी प्रसाद से प्राप्त कि‍या। माता-पि‍ता दोनो के बैडमिंटन खि‍लाड़ी होने के कारण सायना का बैडमिंटन की ओर रुझान शुरु से ही था।

        पि‍ता हरवीर सिंह ने बेटी की रुचि को देखते हुए उसे पूरा सहयोग और प्रोत्‍साहन दि‍या। सायना अब तक कई बड़ी उपलब्धियाँ अपने नाम कर चुकी हैं। वे विश्व कनिष्ठ बैडमिंटन विजेता रह चुकी हैं। ओलिम्पिक खेलों में महिला एकल बैडमिंटन का काँस्य पदक जीतने वाली वे देश की पहली महिला खिलाड़ी हैं। उन्‍होंने 2006 में एशि‍याई सैटलाइट प्रतियोगिता भी जीती है।

        सायना के पूर्व भारत की सर्वश्रेष्ठ महिला खिलाड़ी अपर्णा पोपट ने ही 1999 में स्वीडिश ओपन में सेमीफाइनल तक प्रवेश पाया था । इस जीत के दौरान उसने विश्व की 4 नंबर खिलाड़ी जर्मनी की जू हुवाइवेन को क्वार्टर फाइनल में हराया था । सायना की उस वक्त रैंकिग 86 हो गई थी । इससे पूर्व उससे पिछले वर्ष उसकी रैंकिंग मात्र 185 थी । सायना के पिता श्री हरवीर सिंह भारतीय कृषि अनुसंधान केन्द्र हैदराबाद में प्रमुख वैज्ञानिक पद पर कार्यरत हैं | यहां वह 1998 में चले गए थे |

        1999 में उसके माता-पिता को अहसास हुआ कि उनकी दो पुत्रियों में से छोटी सायना बैडमिंटन में अत्यधिक रुचि रखती है । सायना की माँ ऊषा विश्वविद्यालय स्तर की बैडमिंटन चैंपियन रही थीं । अत: उन्हीं की प्रेरणा से सायना ने गोपी चंद की कोचिंग में खेल की ट्रेनिंग आरम्भ कर दी । 9 वर्ष की उम्र से सायना ने खेलना आरम्भ कर दिया था । शुरू में उसके कोच नानी प्रसाद, गोवर्धन रेड्डी, तथा एस.एम. आरिफ थे ।

        सायना को द्रोणाचार्य अवार्ड विजेता एस.एम. आरिफ ने प्रशिक्षित किया था और बाद में सितम्बर 2014 तक उन्हें पुल्लेला गोपीचंद ने प्रशिक्षित किया था. सायना कई बार बैडमिंटन में राष्ट्रिय चैंपियन भी बन चुकी है और फिलहाल पूर्व भारतीय बैडमिंटन चैंपियन और राष्ट्रिय प्रशिक्षक विमल कुमार से वह प्रशिक्षण ले रही है. इंडियन बैडमिंटन लीग के हैदराबाद हॉटशॉट्स के लिये सायना खेलती है. उन्होंने 2015 की BWF वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर जीता था और ऐसा करने वाली वह पहली महिला बनी थी.

        सायना नेहवाल ने विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के महिला एकल मुकाबले में रजत पदक जीतकर भारत को गौरवान्वित किया है. विश्व चैंपियनशिप के इतिहास में सायना भले ही भारत को स्वर्ण पडल दिलाने में विफल रही पर वे उन भारतीय खिलाडियों के लिये प्रेरक बनकर जरुर उभरी है, जो खेल की दुनिया में कोई मुकाम हासिल करना चाहती है.

        यदि खेल में ईमानदारी से गंभीर प्रयास हो तो एक नहीं अनेक सायना और सानिया सरीखी देख का गौरव बढ़ाने आगे आ सकती है. जब कभी भी सायना से उनकी चाह के बारे में पूछा जाता तो वह हमेशा यही कहती, “मै हमेशा से एक ओलिंपिक पदक चाहती हु और भारत के राष्ट्रिय ध्वज को मंच पर हमेशा से उपर जाते हुए देखना चाहती हु.”

बैडमिंटन कैरियर :

• सायना ने अपने कैरियर के लिए शुरूआती प्रशिक्षण जो है वो  लाल बहादुर स्‍टेडि‍यम, हैदराबाद से कोच नानी प्रसाद से लिया |
• ओलिम्पिक के खेलों में महिला एकल बैडमिंटन का काँस्य पदक जीतने वाली वे देश की पहली महिला खिलाड़ी हैं।
• 2006 की एशि‍याई सैटलाइट प्रतियोगिता सायना ने जीती है।
• उन्होंने 2009 में इंडोनेशिया ओपन जीतते हुए सुपर सीरीज़ बैडमिंटन प्रतियोगिता का खिताब अपने नाम किया और ऐसा करने वाली वो भारत की पहली महिला बैडमिंटन खिलाडी है क्योंकि इस से पहले यह किसी ने नहीं जीता |
• सन 2008 में बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन द्वारा साल की सबसे होनहार खिलाड़ी का सम्मान दिया गया.
• 2010 में भारत के चौथे बड़े सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया.
• खेल के सबसे बड़े अवार्ड ‘राजीव गाँधी खेल रत्न’ से साइना को 2009-10 में सम्मानित किया गया.
• खेल के सबसे बड़े अवार्ड ‘राजीव गाँधी खेल रत्न’ से साइना को 2009-10 में सम्मानित किया गया.

        आंध्रप्रदेश के बैडमिंटन कोच नानी प्रसाद ने सबसे पहले उनकी प्रतिभा को पहचाना जब वो सायना आठ साल की थी उनके पिता के लिए यह मुश्किल तो था कि वो अपनी आधी तनख्वाह को अपनी आठ साल की बच्ची के लिए खर्च करें लेकिन फिर कोच के द्वारा भरोसा जताए जाने के बाद उनके पिता ने उनको सपोर्ट किया | इस तरह सायना के लिए रह आसान होती गयी |

        सायना कहती है कि मेरे माता पिता कि चूँकि खेल की पृष्ठभूमि रही है इसलिए दोनों ने मुझे बहुत सपोर्ट किया और ऐसे में जब वो प्रैक्टिस करती थी तो उन्हें स्टेडियम जाने के लिए 25 किलोमीटर का फासला तय करना पड़ता था लेकिन मेरे लिए यह काम पापा करते थे और वो रोज मुझे सुबह 4 बजे उठाते और उसके बाद मुझे अपने स्कूटर से स्टेडियम लेकर जाते और मेरे जल्दी उठने के कारण या भी डर रहता था कि कंही नींद के झोकों की वजह से में स्कूटर से गिर नहीं जाऊ इसलिए पापा मम्मी को भी साथ ले जाते थे जो पीछे मुझे पकडके बैठ जाती थी |

        2006 – मई 2006 में साइना ने 4 स्टार टूर्नामेंट – फिलिपिन्स ओपेंस में हिस्सा लिया. 16 साल की छोटी सी उम्र में साइना ने यह ख़िताब जीता, और भारत एवं एशिया की पहली महिला खिलाड़ी बन गई, जिन्होंने ये जीत हासिल की. इसी साल उन्होंने एक बार फिर सेटेलाइट टूर्नामेंट में जीत हासिल की. 2008 – सन 2008 में साइना पहली भारतीय बन गई, जिन्होंने ‘वर्ल्ड जूनियर बैडमिंटन चैम्पियनशीप’ का ख़िताब जीता. इसी साल साइना ने ‘चायनीस टेपी ओपन ग्रांड प्रिक्स गोल्ड’ , ‘इंडियन नेशनल बैडमिंटन चैम्पियनशीप’ एवं ‘कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स’ में भी जीत हासिल की थी.

        2008 में साइना को सबसे होनहार खिलाड़ी के रूप में घोषित किया गया था. 2010 – सन 2010 में साइना ने ‘इंडिया ओपन ग्रांड प्रिक्स गोल्ड’, ‘सिंगापूर ओपन सुपर सीरीज’, ‘इण्डोनेशिया ओपन सुपर सीरीज’ एवं ‘हांगकांग सुपर सीरीज’ में अपनी जीत दर्ज कराई. 2010 में दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में साइना सबसे बड़ी जीत हासिल की, उन्होंने बैडमिंटन सिंगल में मलेशिया की खिलाड़ी को हरा कर गोल्ड मैडल जीता. 2011 – सन 2011 में साइना ने ‘स्विस ओपन ग्रांड प्रिक्स गोल्ड’ में जीत हासिल की. इसके अलावा ‘मलेशिया ओपन ग्रांड प्रिक्स गोल्ड’, ‘इण्डोनेशिया ओपन सुपर सीरीज प्रीमियर’ एवं ‘BWF सुपर सीरीज मास्टर फाइनल्स’ में दूसरा स्थान प्राप्त किया.

साइना नेहवाल ने दूसरी बार जीता ऑस्ट्रेलियाई ओपन खिताब :

        भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ने 12 जून, 2016 रविवार को एक बार फिर कमाल करते हुए ऑस्ट्रेलियन ओपन सुपर सीरीज पर कब्जा कर लिया। साइना का साल का यह पहला खिताब है। साइना ने दूसरी बार इस खिताब को अपने नाम किया है। इससे पहले 2014 में भी उन्होंने यह खिताब जीता था। यह पहला मौका है जब पहली बार किसी खिलाड़ी ने दूसरी बार यह टूर्नामेंट जीता है। सिडनी में खेले गए ऑस्ट्रेलियन ओपन सुपर सीरीज के फाइनल में साइना ने चीन की सुन यू को 11-21, 21-14, 21-19 से हराया।

        7.5 लाख डॉलर की इनामी राशि के टूर्नामेंट के फाइनल में साइना ने शुरुआत में लड़खड़ाने के बाद शानदार वापसी की। 70 मिनट तक चले इस मुकाबले में साइना ने अपनी चीनी प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ अपना जीत का रेकॉर्ड और मजबूत किया। इससे पहले शनिवार को साइना ने चौथी वरीयता प्राप्त यिहान वांग को हराकर फाइनल में जगह बनाई थी। वर्ल्ड रैंकिंग में आठवें पायदान पर मौजूद साइना ने शनिवार को सिडनी में खेले गए मुकाबले में चीन की यिहान वांग को 21-8, 21-12 से हराया था।

        साइना 2 अप्रैल, 2015 को विश्व रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनी थी। उसने अगस्त में जकार्ता में विश्व चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता था। वह नवंबर में चाइना ओपन सुपर सीरिज प्रीमियर के फाइनल में भी पहुंची लेकिन इसके बाद चोट के कारण उसका फॉर्म गिर गया। इंडिया ओपन, मलेशिया ओपन, बैडमिंटन एशिया चैम्पियनशिप में वह सेमीफाइनल में हारी। उसने एशियाई चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीता और जून में इंडोनेशिया ओपन सुपर सीरिज में क्वार्टर फाइनल तक पहुंच गईं।

        साइना नेहवाल2002 में Yonex की sponsored थी! जैसे जैसे साइना नेहवालकी ranking बढती गयी वैसे ही वैसे उनको बहुत से चीजों की sponsorships मिलती गयी! साइना नेहवालको उनके बढ़िया खेल के लिए 2010 को राजीव गाँधी खेल रत्न के अवार्ड से नवाजा गया है! राजीव गाँधी खेल रत्न के अलावा साइना नेहवालको और भी कई तरह के अवार्ड मिले!

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युवराज सिंह जीवनी - Biography of Yuvraj Singh in Hindi Jivani

युवराज सिंह (युवी) भारत के क्रिकेट खिलाडी हैं। इनका जन्म 12 दिसंबर 1981 को चंडीगढ़ में भूतपूर्व क्रिकेट खिलाड़ी योगराज सिंह के यहाँ जाट परिवार में हुआ था। इन्होंने 20-20 विश्व कप 2007 में इंग्लैंड के खिलाफ 6 गेंदों में 6 छक्के मारे थे, और 20-20 में 12 गेंदों में अर्धशतक बनाने का विश्व रिकॉर्ड भी उनके नाम है। उनको सिक्सर किंग नाम से जाना जाता है। युवराज सिंह को विश्व कप 2011 में अहम भूमिका निभाने में मैन ऑफ़ द टूर्नामेंट चुना गया। इंडियन प्रीमियर लीग में किंग्स इलेवन पंजाब, पुने वॉरियर्स इंडिया, रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर, [दिल्ली डेयरडेविल्स]] की और से खेल चुके है , हाल में आईपीएल विजेता सनराइजर हैदराबाद से खेल रहे है। इन्होंने १ ओवर मे ६ छक्के लगाने का विश्व रिकार्ड बनाया है

            युवराज सिंह के पिता का नाम  योगराज सिंह था! योगराज सिंह को भी क्रिकेट से बहुत प्यार था और वह भी एक क्रिकेट प्लेयर रह चुके थे! युवराज सिंह  के पिता बचपन से ही यही चाहते थे की युवराज सिंह  एक क्रिकेटर प्लेयर बने और अपने देश के लिए इंडियन  क्रिकेट team में खेले! युवराज सिंह  को भी बचपन से ही क्रिकेट से बहुत प्यार था! और आखिरकार युवराज सिंह  ने 3 अक्तूबर 2000 को अपने क्रिकेट जीवन का पहला मैच इंडियन क्रिकेट team में खेला! उसके बाद युवराज सिंह ने पीछे मुढ़कर नहीं देखा और लगातार इंडियन क्रिकेट टीम के लिए बढ़िया प्रदर्शन करने लगे!

        युवराज सिंह (Yuvraj Singh) को विश्व कप 2011 में अहम भूमिका निभाने में मैन ऑफ़ द टूर्नामेंट चुना गया। इंडियन प्रीमियर लीग में किंग्स इलेवन पंजाब, पुने वॉरियर्स इंडिया, रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर, दिल्ली डेयरडेविल्स की और से खेल चुके है, हाल में आईपीएल विजेता सनराइजर हैदराबाद से खेल रहे है। इन्होंने १ ओवर मे ६ छक्के लगाने का विश्व रिकार्ड बनाया है। युवराज सिंह (Yuvraj Singh) को भी बचपन से ही क्रिकेट से बहुत प्यार था| और आखिरकार युवराज सिंह ने 3 अक्तूबर 2000 को अपने क्रिकेट जीवन का पहला मैच इंडियन क्रिकेट team में खेला, उसके बाद युवराज सिंह ने पीछे मुढ़कर नहीं देखा और लगातार इंडियन क्रिकेट टीम के लिए बढ़िया प्रदर्शन करने लगे।

        युवी ने अपने जीवन में एक बड़ा रिकॉर्ड तब बनाया जब 2007 के 20-20 विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ खेले गए एक मैच में स्टुअर्ड ब्राड के 6 बाल पर 6 छक्के लगाया। युवराज सिंह ने 6 बाल पर 6 छक्के लगाकर पूरी दुनिया के क्रिकेट प्रेमी को हिला कर रख दिया। 6 बाल पर 6 छक्के लगाना अपने आप में एक बहुत बड़ा रिकॉर्ड है। इसके साथ साथ 2007 के 20-20 विश्व कप के मैच में युवराज सिंह (Yuvraj Singh) ने मात्र 12 गेद पर 50 रन बनाकर एक विश्व कप रिकॉर्ड भी बना दिया। युवराज सिंह (Yuvraj Singh) के 12 गेद पर 50 रन बनाने का रिकॉर्ड अभी तक कोई नहीं तोड़ पाया है। युवराज सिंह एक बहुत ही तेजी से रन बनाने वाले बैटमैन थे।

        Yuvraj Singh ने अभी तक 250 से भी ज्यादा ODI और 40 से भी ज्यादा टेस्ट मैच खेल चुके है! अपने क्रिकेट जीवन में Yuvraj Singh बहुत सारे रिकॉर्ड बनाये है! अगर Yuvraj Singh के इस समय की बात करे तो अभी Yuvraj Singh इंडियन क्रिकेट team से बाहर चल रहे है! लेकिन हम उम्मीद करते है की जल्दी ही Yuvraj Singh  इंडियन क्रिकेट team में वापसी करेगें! और अपने पुराने अंदाज में फिर से क्रिकेट खेलना start कर देनें! 

        युवराज को 2012 में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा “अर्जुन” पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 2014 में युवराज “पद्मश्री” पुरस्कार से भी सम्मानित किये गए जो की भारत का चौथा सबसे बड़ा अवार्ड है. 2014 में रॉयल चैलेंजर बंगलोर ने युवराज को IPL की नीलामी में सबसे महंगा खिलाडी 14 करोड़ में ख़रीदा. 2015 की IPL नीलामी में दिल्ली डेयरडेविल्स ने युवराज को 15 करोड़ में ख़रीदा. 2016 की IPL नीलामी में सनराइजर हैदराबाद ने युवराज को 7 करोड़ में ख़रीदा.

व्यक्तिगत जीवन :

        युवराज का जन्म पंजाब में हुआ है. युवराज भूतपूर्व क्रिकेटर योगराज सिंह और शबनम सिंह के बेटे है. उनके माता-पिता के तलाक के बाद युवराज अपनी माता के साथ रहते थे. बचपन में टेनिस और रोलर स्केटिंग युवराज के पसंदीदा खेल थे और युवराज दोनों भी खेल अच्छा ही खेलते थे. युवराज ने अन्तराष्ट्रीय अंडर 14 रोलर स्केटिंग चैंपियनशिप भी जीती है. लेकिन उनके पिता ने उनके सारे मेंडल्स फेक दिए थे और कहा था की वे सिर्फ क्रिकेट पर ही ध्यान दे. युवराज के पिता उन्हें रोज अभ्यास के लिए ले जाते थे. उन्होंने अपनी पढाई DAV पब्लिक स्कूल, चंडीगढ़ से की. युवराज ने बाल कलाकार के रूप में छोटे रोल भी किये, मेहँदी सांगा दी और पुट सरदार में उन्होंने छोटे किरदार निभाये है. युवराज ने 12 नवंबर 2015 को हजेल कीच से सगाई की थी.

कॅरियर : 

        युवराज सिंह पहली बार कूच-बिहार ट्राफी के दौरान चर्चा में आए जब उन्होंने पंजाब क्रिकेट टीम की तरफ से खेलते हुए 358 रन बनाए. इस प्रदर्शन के बल पर उन्हें साल 2000 में अंडर 19 विश्व कप के लिए भारतीय टीम में खेलने का मौका मिला. भारत ने इस साल यह प्रतियोगिता जीत भी ली.

        साल 2000 में ही युवराज को भारतीय क्रिकेट टीम के लिए भी चुना गया. आईसीसी नॉक-आउट ट्राफी के दौरान केन्या के खिलाफ उन्होंने अपना पहला मैच खेला. इस सीरीज के दूसरे ही मैच में युवी ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ विस्फोटक रुख अपनाते हुए अपने बल्ले की धाक दिखा दी थी. इस मैच में उन्होंने 82 गेंदों पर 84 रन बनाए पर सीरिज के बाद युवी को टीम में दुबारा जगह बनाने के लिए एक साल का इंतजार करना पड़ा.

        2002 में नेटवेस्ट सीरीज के दौरान युवराज सिंह ने मोहम्मद कैफ के साथ मिलकर फाइनल में भारत की जीत में अहम रोल निभाया था. यह मैच युवराज के कॅरियर के लिए एक टर्निंग प्वॉंइट की तरह साबित हुआ. साल 2002 से लेकर 2005 तक कई अहम मौकों पर युवी ने राहुल द्रविड़ और कैफ के साथ मिलकर भारत को कई जीतें दिलाईं.

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धनराज पिल्लै जीवनी - Biography of Dhanraj Pillay in Hindi Jivani

भारतीय हॉकी के इस महान सितारे का जन्म पुणे के निकट खिड़की में 16 जुलाई, 1968 को हुआ था। धनराज बहुत ही सामान्य परिवार से हैं, उनके माता-पिता मूलतः तमिलनाडू से थे लेकिन रोजी-रोटी की तलाश वे खिड़की आ गए थे| माता-पिता ने पैसों के अभाव में जन्मे अपने चौथे पुत्र का नाम इस उम्मीद में “धनराज” रखा कि वो उनकी किस्मत बदल सके…और जैसा कि हम जानते हैं; आगे चलकर हुआ भी यही।
पिता ने पैसों के अभाव में जन्मे अपने चौथे पुत्र का नाम इस उम्मीद में “धनराज” रखा कि वो उनकी किस्मत बदल सके…और जैसा कि हम जानते हैं; आगे चलकर हुआ भी यही।

        धनराज का बचपन Ordinance Factory Staff Colony में बीता, जहां उनके पिता बतौर ग्राउंड्समैन काम करते थे। बड़ा परिवार और सीमित आय के कारण धनराज का परिवार सुख-सुविधाओं के अभाव में ही रहता था। खुद धनराज टूटी हुई हॉकी और फेंकी हुई बॉल से खेला करते थे और ऐसे करने की प्रेरणा उन्हें उनकी माँ से मिलती थी। तमाम तकलीफों के बीच भी उनकी माँ हमेशा अपने पाँचों बेटों को हुई खेलने के लिए प्रोत्साहित किया करती थीं।

        जब धनराज छोटे थे तब भारत में हॉकी ही सबसे लोकप्रिय खेल था और अक्सर बच्चे यही खेल खेला करते थे। भारतीय खेल जगत में हॉकी खिलाड़ी धनराज पिल्लै का नाम बहुत गर्व से लिया जाता है । हॉकी के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ सेन्टर फारवर्ड खिलाड़ी समझे जाने वाले धनराज की तुलना क्रिकेट के सचिन तेंदुलकर से की जाती है । जैसे क्रिकेट में सचिन का कोई सानी नहीं है, इसी प्रकार धनराज पिल्लै भी हॉकी के खेल में सर्वश्रेष्ठ समझे जाते हैं ।

        धनराज पिल्लै की कहानी एक ऐसे सामान्य दर्जे के लड़के की कहानी है जो गरीब परिवार से निकलकर कड़ी मेहनत करके अपना मुकाम हासिल करता है । पुणे की हथियारों की फैक्टरियों की गलियों में खेल-खेलकर उनका बचपन बीता । पांच बहन-भाइयों के बीच धनराज के यहां धन की कमी होते हुए भी उसे खेल के लिए पूरा नैतिक समर्थन प्राप्त हुआ । धन की कमी के कारण धनराज व उसका भाई हॉकी खरीदने में पैसे खर्च करने में असमर्थ थे । अत: वे इसके स्थान पर टूटी हुई हॉकी को रस्सी से बांध कर उससे खेला करते थे ।

        धनराज को बचपन से आज तक अपनी माँ से बेहद लगाव है । धनराज का कहना है- ‘यह कल्पना करना कठिन है कि घर में इतने कम साधन होते हुए भी माँ ने हमें पाल-पोसकर बड़ा किया और हम सब को एक अच्छा इंसान बनाया ।
 अपने लम्बे लहराते बालो की वजह से टीम में पहचाने जाने वाले धनराज पिल्लै Golden Boy ही नही है बल्कि अपने खेल के कौशल द्वारा ये विपक्षी रक्षा पंक्ति के खिलाडियों को चकमा देकर बॉल को गोल पोस्ट के भीतर पहुचाकर ही दम लेते है |

        धनराज (Dhanraj Pillay) को बॉल मिली नही कि इनका एकमात्र लक्ष्य उसे गोल पोस्ट तक पहचाना ही रहता था | विपक्षी खिलाड़ी धनराज को किसी तरह रोकने में सफल हो , उनकी कोशिश यही रहती थी | ये अब तक विश्व कप  , ओलम्पिक , एशिया कप ,एशो-अफ्रीका हॉकी खेल चुके है | अब तक सर्वाधिक गोल बनाने भारतीय टीम में इनका रिकॉर्ड रहा है | धनराज पिल्लै (Dhanraj Pillay) निसंदेह ही भारतीय हॉकी के सिरमौर है तथापि ये काफी विवादों में बने रहते है जिसका खामियाजा उन्हें व्यक्तिगत तौर पर योग्यताओं के बावजूद टीम के बाहर रहने पर मजबूर करता है जिसके कारण इनका खेल प्रभावित होता है |

करियर की शुरूआत :
 
        धनराज पिल्लै ने अंतराष्ट्रीय हॉकी में 1989 में कदम रखा जब उन्होंने नई दिल्ली में ऑलवेन एसिया कप खेला। 
   
अंतराष्ट्रीय करियर :
 
        धनराज पिल्लै जिनका करियर दिसंबर 1989 से अगस्त 2004 के बीच चला, ने कुल 339 अंतराष्ट्रीय मैचों में हिस्सा लिया। भारतीय हॉकी फेडरेशन ने उनके द्वारा किए गए गोल्स का रिकॉर्ड नहीं रखा यही वजह है कि धनराज पिल्लै द्वारा लगाए गए गोल्स की सही संख्या के विषय में नहीं कहा जा सकता। उन्होंने करीब 170 गोल्स किए हैं ऐसा अनुमान धनराज पिल्लै का है।   

अचीवमेंट :
 
        वह अकेले ऐसे हॉकी खिलाड़ी हैं जिन्होंने चार ओलंपिक में हिस्सा लिया है। 1992, 1996, 2000 और  2004 के ओलपिंक में धनराज पिल्लै खेले। 995, 1996, 2002, और 2003 में हुई चैंपियंस ट्रॉफी का भी   हिस्सा रहे। 1990, 1994, 1998, और 2002 में हुए एशियन गेम्स में भी धनराज पिल्लै खेले। भारत ने 1998 में और 2003 में एशियन गेम्स और एशिया कप धनराज पिल्लै की कप्तानी में जीता।   साथ ही वह बैंकाक एशियन गेम्स में सबसे अधिक गोल करने वाले खिलाड़ी बने।   

क्लब हॉकी :
 
        धनराज पिल्लै विदेशी क्लब जैसे द इंडियाना जिमखाना (लंदन), एचसी ल्योन (फ्रांस), बीएसएन एचसी एंड टेलेकॉम मलेशिया एच सी (मलेशिया), अबाहानी लिमिटेड (ढाका), एचटीसी स्टुटगार्ट किकर्स (जर्मनी) और  खाल्सा स्पोर्टस क्लब (हांगकांग) के लिए खेला है।   ’

पुरस्कार :

        वर्ष 1999-2000 में उन्हें भारत के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया गया। वर्ष 2000 में उन्हें नागरिक सम्मान पद्म श्री प्रदान किया गया। छोटी कद-काठी और लहराते बालों वाले धनराज अपने युग के सबसे प्रतिभाशाली फॉरवर्ड खिलाड़ी रहे हैं जो विरोधियों के गढ़ में कहर बरपाने की क्षमता रखते थे। वे 2002 एशियाई खेलों की विजेता हॉकी टीम के सफल कप्तान थे कोलोन, जर्मनी में आयोजित 2002 चैंपियंस ट्रॉफी में उन्हें टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी पुरस्कार प्रदान किया गया।

        पिल्लै वर्तमान में मुंबई में एक हॉकी अकादमी शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी अकादमी हेतु धन जुटाने के लिए, वे एक अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं जिसके तहत मुंबई में खाली प्रिंटर कार्ट्रिज एकत्र करके एक यूरोपीय रीसाइक्लिंग कंपनी को बेच दिया जाता है।

विवाद :

        धनराज को अक्सर तेज-तर्रार के रूप में वर्णित किया जाता है और वे कई विवादों का हिस्सा रह चुके हैं। हॉकी प्रबंधन के खिलाफ वे कई बार अपना रोष प्रकट कर चुके हैं। बैंकाक एशियाई खेलों के बाद भारतीय टीम के लिए उनका चयन नहीं किया गया था। आधिकारिक कारण यह दिया गया कि धनराज और 6 अन्य वरिष्ठ खिलाड़ियों को विश्राम दिया गया है। लेकिन इसे काफी हद तक, अनुचित स्वागत और मैच फीस का भुगतान न किये जाने के कारण उनके द्वारा प्रबंधन के खिलाफ नाराजगी जाहिर करने के लिए एक प्रतिशोध के रूप में देखा गया।

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वीरेंद्र सहवाग जीवनी - Biography of Virendra Sehwag in Hindi Jivani

विश्व क्रिकेट के सबसे बेहतरीन बल्लेबाजो में से एक सहवाग का जन्म 20 अक्टूबर 1978 को अनाज व्यापारी के घर में नयी दिल्ली में हुआ था। उन्होंने अपना बचपन में संयुक्त परिवार में अपने भाई-बहन, अंकल, आंटी और 16 भाइयो के साथ बिताया। उनका परिवार हरियाणा से है और बाद में वे दिल्ली चले गये थे। अपने पिता कृष्णा और माँ कृष्णा सहवाग के चार बच्चो में सहवाग तीसरे है। उनके पिता ने बचपन में ही सहवाग की क्रिकेट के प्रति रूचि को भाँप लिया था और सात महीनो के सहवाग को ही उन्होंने खिलौने वाली बैट लाकर दी थी। 

        बाद में सहवाग पढने के लिए नयी दिल्ली के अरोरा विद्या स्कूल जाने लगे और सहवाग अपने माता-पिता को हमेशा क्रिकेट खेलने के लिए सताया करते थे। इसी आधार पर उन्होंने अपने क्रिकेट करियर के शुरुवाती दौर में अपनी पहचान एक आक्रामक बल्लेबाज के रूप में बनायी और उस समय उनके कोच अमर नाथ शर्मा थे। 1990 में क्रिकेट खेलते समय जब उनका दांत टुटा था तभी उनके पिता ने उनके करियर को खत्म करने का निर्णय ले लिया था लेकिन सहवाग ने अपनी माँ की सहायता से इस बंदी को टाल दिया। बाद में सहवाग ने जामिया मिलिया इस्लामिया से ग्रेजुएशन पूरा किया।

        साल 2008 में सहवाग टेस्ट मैच में सबसे तेज ट्रिपल सेंचुरी बनाने वाले बल्लेबाज बन गए. यह मैच उन्होंने चेन्नई में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेला था. सहवाग के नाम 2009 में एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय (ओडीआई) मैच में सबसे तेज शतक का रिकॉर्ड भी बना, जिसे चार साल बाद विराट कोहली ने तोड़ा. 2005 में श्रीलंका के खिलाफ खेला गया सहवाग का यह ओवर भला कौन भूल सकता है जब उन्होंने ओवर की छह गेंदों पर 4,4,6,4,4,4 रन दिए थे.

        सहवाग ने टेस्ट क्रिकेट में 23 शतक बनाए हैं और टेस्ट के इतिहास में दो तिहरे शतक बनाने वाले दुनिया के चार बल्लेबाजों में से एक हैं. सहवाग के अलावा ऐसी उपलब्धि सर डॉन ब्रैडमैन, ब्रायन लारा और क्रिस गेल ने हासिल की है. अपने 37वें जन्मदिन पर हर प्रकार के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट और आईपीएल से सन्यास की घोषणा करने वाले सहवाग ने अपने करियर में कुल 104 टेस्ट, 251 ओडीआई और 19 टी20 मैच खेले हैं. वीरू के खाते में 17,000 से भी अधिक अंतरराष्ट्रीय रन हैं.

        इस परिपेक्ष्य में सहवाग उस कड़ी के पहले पडाव है | वे दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्र नजफगढ़ के निवासी है और परिवार अनाज व्यापार से जुड़ा हुआ है | “वीरू” के नाम से जाने जानेवाले इस युवक ने सन 1999 में एकदिवसीय और दो साल बाद टेस्ट मैचो में भारत का प्रतिनिधित्व किया | वे एक धुँआधार मध्यम क्रम के बल्लेबाज तथा एक उपयोगी “ऑफ़ स्पिनर” के रूप में विकसित हुए परन्तु बाद में उन्हें सलामी बल्लेबाज का दायित्व सौंपा गया | 

        यह भूमिका उन्होंने इतनी बखूबी निभाई कि टेस्ट क्रिकेट में दो तिहरे शतक जमानेवाले एकमात्र भारतीय बल्लेबाज बने \ उनकी अद्वितीय सफलताओं को उन्हें भारतीय टीम की उप-कप्तानी सौंपकर मान्यता प्रदान की गयी परन्तु बीच में उनके प्रदर्शन में गिरावट भी आई | यही नही उनके टीम में स्थान पर भी प्रश्न-चिन्ह लग गया था |

        चपल प्रतिक्रियाओं तथा आँख और हाथ का सही तालमेल से उन्हें पराक्रम प्रदान किया कि उन्होंने विश्व विख्यात गेंदबाजों की धज्जियाँ उड़ाकर उनकी औसत तथा मान-मर्यादा को मिटटी में मिला दिया | उनकी आक्रमक बल्लेबाजी का कोई सानी नही है | न्यूजीलैंड के गेंदबाजों को उनकी विद्युतीय बल्लेबाजी का आभास हुआ , जब उन्होंने 79 गेंदों में ही शतक बना दिया | उधर दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध पहले ही टेस्ट में सैंकड़ा ठोककर अपने आगमन का खूब डंका बजाय | अपनी नई जिम्मेदारी को सहवाग ने बड़ी कुशलता से निभाया | चुनौतीपूर्ण परिस्थितिया भी उनके पक्के इरादों को विचलित नही कर पाई |

         “वीरेन्द्र सहवाग (Virendra Sehwag) भारत का ऐसा बल्लेबाज़ जिससे दुनिया का हर गेंदबाज खौफ खाता है” यह मानना है इमरान ख़ान से लेकर रिचर्ड हेडली और बॉब विलिस के दिल में खौफ पैदा करने वाले विवियन रिचर्डस का। अभी हाल ही में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ युसूफ पठान ने यादगार तूफानी पारी खेलने के बाद पत्रकारों से कहा था “वीरेंद्र सहवाग (Virendra Sehwag) के बेखौफ अंदाज ने उन्हें इस कदर खेलने के लिए प्रेरित किया।”

        सहवाग भारतीय टीम को बहुत तेज शुरुआत देते हैं और गेंदबाजों पर शुरू से ही हावी हो जाते हैं। सहवाग (Virendra Sehwag) अगर अपने फॉर्म में हों तो किसी भी आक्रमण को ध्वस्त करने की क्षमता रखते हैं। सहवाग जब तक क्रीज पर रहते हैं तब तक विरोधियों के माथे पर उनकी क्रीज पर मौजूदगी का खौफ साफ-साफ देखा जा सकता है।

        वीरेन्द्र सहवाग (Virendra Sehwag) को भारत सरकार ने 2002 में अर्जुन पुरस्कार देकर सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें 2008 में अपने शानदार प्रदर्शन के लिये “विजडन लीडिंग क्रिकेटर इन द वर्ल्ड” के सम्मान से नवाजा गया। सहवाग (Virendra Sehwag) ने इस पुरस्कार को 2009 में दोबारा अपने नाम किया। 2011 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर के नाते “ईएसपीएन क्रिकीन्फो अवार्ड” भी दिया गया।

कीर्तिमान :

        मार्च 2010 में उन्होंने हैमिल्टन में न्यूजीलैंड के खिलाफ सिर्फ 60 गेंदों पर शतक बनाया था। टेस्ट क्रिकेट में पहले विकेट के लिये सबसे बड़ी साझेदारी का रिकार्ड भी सहवाग के ही नाम है। राहुल द्रविड़ के साथ 410 रन की साझेदारी बना करके वीरू ने कीर्तिमान बनाया था। एकदिवसीय क्रिकेट मैच में उनका सर्वाधिक स्कोर 219 रन है। जो एक विश्व रिकॉर्ड था। जिसे बाद में रोहित शर्मा ने 264 रन बना कर तोड़ा।[5] सहवाग पहले भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्होंने टेस्ट मैच में तिहरा शतक जड़ा है। 

        सर डोनाल्ड ब्रेडमैन और ब्रायन लारा के बाद सहवाग दुनिया के तीसरे ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में दो बार तिहरा शतक बनाने का कीर्तिमान स्थापित किया है। अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में किसी बल्लेबाज द्वारा यह सबसे तेज गति से बनाया तिहरा शतक (319 रन) भी है। तीन सौ उन्निस रन बनाने के लिये उन्होंने सिर्फ़ 278 गेंद ही खेलीं। तीस से ज्यादा औसत के साथ सहवाग का स्ट्राइक रेट दुनिया में सबसे ज्यादा है। इसके अलावा वह दुनिया के एकमात्र ऐसे क्रिकेट खिलाड़ी हैं जिन्होंने टेस्ट मैचों में दो तिहरे शतक बनाने के साथ एक पारी में पाँच विकेट भी हासिल किये।

सहवाग के आदर्श :

        सहवाग क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर को अपना मार्गदर्शक मानते हैं। अपनी बैटिंग शैली के लिए सहवाग की तुलना सचिन तेंदुलकर से की जाती है। बड़े स्कोर बनाने के मामले में वह ऑस्ट्रेलिया के सर डॉन ब्रैडमैन और वेस्टइंडीज के ब्रायन लारा के समकक्ष ठहरते हैं। उनके आदर्श सचिन तेंदुलकर इस मामले में उनसे कहीं पीछे हैं।

उतार चढ़ाव :

        सहवाग का अच्छा समय रहा तो बुरा समय भी रहा। लंबे समय तक वे भारतीय टीम से अलग भी रहे। ख़ासकर 2007 के विश्व कप के बाद तो उनका वनवास कुछ लंबा ही रहा। लेकिन वापसी हुई तो ज़बरदस्त। सहवाग ने वनडे के साथ-साथ टेस्ट में भी सलामी बल्लेबाज़ी की है और ख़ूब चले भी हैं। बल्ले के साथ-साथ सहवाग उपयोगी गेंदबाज़ भी हैं और कई मौक़े पर उन्होंने भारत को अहम सफलताएँ दिलाई हैं।

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विश्वनाथन आनंद जीवनी - Biography of Viswanathan Anand in Hindi Jivani

विश्वनाथन आनंद भारत शतरंज खिलाड़ी, अंतरराष्ट्रीय ग्रैंडमास्टर एवं पूर्व विश्व चैंपियन हैं। विश्वनाथन आनंद क जन्म ११ दिसम्बर १९६९ में हुआ था। विश्वनाथन आनंद् एक भारतीय शतरंज खिलाड़ी और वह एक भूत्पुर्व शतर्र्ंज विजेता हैं। आनंद ने पाँन्च बार विश्व शतरंज प्रतियोगिता जीते हैं और वह निर्विवाद विजेता रहे हैं। विश्वनाथन आनंद २००३ में फीडे विश्व शतरंज चैंपियनशिप में विश्व शतरंज बने और वह अपने समय के ड्रीड खिलाड़ी माने जाते हैं।

        सन १९८८ में विश्वनाथन आनंद भारत के ग्रांडमास्टर बने। उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सबसे पहले सम्मानित किया गया जो कि भारत का सबसे माननीय खेल पुरस्कार है (सन १९९१-९२)। विश्वनाथन आनंद को सन २००७ में भारत का द्वितीय सबसे श्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण दिया गया, जिससे वे भारतीय इतिहास के सबसे पहले खिलाड़ी बने जिसे यह पुरस्कार मिला। आनंद ने शतरंज ऑस्कर ६ बार जीता है (सन १९९७, १९९८, २००३, २००७, २००८)।


        विश्वनाथन आनंद को यदि भारतीय शतरंज का बादशाह कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी । वह वर्ष 2000 में भारत के ही नहीं एशिया के प्रथम शतरंज विश्व-चैंपियन बने । यदि विश्व के प्रथम विजेता विल्हम स्टीन्ज से गणना करें जो 1886 में विजेता बने थे तो आनन्द 15वें विश्व-चैंपियन बने । 24 दिसम्बर, 2000 को उन्होंने तेहरान में हुई चैंपियनशिप में, रूस में जन्मे अपने स्पेनिश प्रतिद्वन्दी अलेक्सई शिरोव को छह खेलों के चौथे मुकाबले में हरा कर विश्व-चैंपियन का खिताब हासिल किया । ऐसी शानदार विजय सम्भवत: विश्व चैंपियनशिप के खेलों में दोबारा होनी मुश्किल है | इस मुकाबले में विजय प्राप्त करने पर आनंद को 6,60,000 डॉलर की राशि पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हुई ।

        वर्ष 2002 में विश्वनाथन आनंद ने विश्व स्तर की चौथी सफलता प्राप्त कर एक बार फिर नया इतिहास रच डाला । फ्रांस में होने वाले कोर्सिका ओपन चेस टूर्नामेंट के पहले खेल में हारने के बाद आनंद ने अन्तिम छठे खेल में रूस के अनोतोली कारपोस को हरा कर विजय प्राप्त की । वर्ष 2002 में ही आनंद ने मई में प्राग में यूरोटेल टाइटल जीता, जुलाई में ‘चेस क्लासिक’ का मैन्ज टाइटल जीता । फिर अक्टूबर में हैदराबाद में होने वाले विश्व कप शतरंज में पुन: अपनी प्रभुता साबित की और फिर विश्व कप विजेता साबित हुए । उन्हें पुरस्कार स्वरूप 46,000 डालर की राशि प्राप्त हुई ।


        जब विश्व चैंपियनशिप का बटवारा किया जा रहा था, उस समय उन्होंने 2000 से 2002 तक FIDE World Chess Championship का ख़िताब अपने नाम रखा. वह सन 2007 में निर्विवाद विश्व विजेता बने और सन 2008 में उन्होंने अपना ख़िताब व्लाडामीर क्राम्निक से बचाया, तब उन्होंने उसके बाद सफलता से 2010 में अपने विश्व विजेता प्रतियोगिता का ख़िताब हासिल किया जो की वेसेलिन तपोलाव के खिलाफ था और उन्होंने विश्व शतरंज प्रतियोगिता फिरसे 2012 में जीता जो बोरिस गल्फ के खिलाफ था. विश्व शतरंज प्रतियोगिता 2013 में वे मागनुस कार्सलेन के खिलाफ पराजित हुए.


        विश्वनाथन आनंद इतिहास के उन 9 खिलाडियों में से एक है जिन्होंने FIDE विश्व शतरंज चैंपियनशिप की सूचि में उसके पुराने रिकॉर्ड को तोडा और पुरे 21 महीनो तक विश्व के नंबर 1 खिलाडी बने रहे. और वे अपने जीवन में 6 दफा इस स्थान पर रहे. विश्वनाथन आनंद 1988 में भारत के पहिले ग्रेंडमास्टर बने. और 1991-92 में राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार मिलने वाले वे पहले खिलाडी बने, ये भारत का खेल की दुनिया में सबसे बड़ा पुरस्कार था. 2007 में, उन्हें भारत का दूसरा सबसे बड़ा सिविलियन पुरस्कार दिया गया, जिसे पद्म भूषण कहते है, और वे पहले खिलाडी थे जिन्होंने इस पुरस्कार को प्राप्त किया.


        विश्वनाथन आनन्द (Viswanathan Anand) ने ग्रैंडमास्टर बनकर भारत की खोई प्रतिष्ठा को पुन: वापस किया | इनका जन्म दक्षिण भारत में सन 1969 को हुआ | 17 वर्ष की अवस्था में इन्होने ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल किया | 27 वर्ष की अवस्था में विश्व के 2 नम्बर के खिलाड़ी बन गये | 1988 में इन्होने यह खिताब हासिल किया | लियेनेर्स अंतर्राष्ट्रीय शतरंज टूर्नामेंट में आनन्द को 7वा स्थान मिला | इसी प्रतियोगिता में इन्होने विश्व चैंपियन कारपोरोव तथा ब्रिटेन के जनाथन स्पीलमैन को पराजित किया |

        आनन्द (Viswanathan Anand) एक तेज तर्रार खिलाड़ी है | इनकी चाले बहुत गुप्त नही होती है फिर भी ये अपने प्रतिद्वंदी पर दबाव डालकर उसे गलती करने पर मजबूर कर देते है | अपनी चालो के लिए ये ज्यादा समय नही लेते | ये परम्परागत शैली से खेलते है | जिस प्रकार क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर है वैसे ही शतंरज में विश्वनाथन आनन्द |

        मुम्बई में “ए” राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतकर इन्होने अपनी प्रतिभा सिद्ध की | इस चैंपियनशिप में इन्होने फीड़ा से मान्यता प्रदान 15 खिलाडियों में फीडा रेटिंग 16 वर्ष की अवस्था में प्राप्त की | आनन्द (Viswanathan Anand) ने 5 वर्ष की उम्र से ही शतरंज खेलना शूरू कर दिया था | माता-पिता से बारिकिया सीखी | 1982 में इन्होने जूनियर चैंपियनशिप की राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीती |

खेल जीवन :

        वर्ष 2000 में उन्होंने फीडे विश्व शतरंज चैंपियनशिप जीती थी। वर्ष 2007 की विश्व चैंपियनशिप में विजय के बाद वे शतरंज के निर्विवाद बादशाह बन गये। 14 से 29 अक्टूबर 2008 के मध्य संपन्न विश्व शतरंज चैंपियनशिप में उन्होंने व्लादिमीर क्रैमनिक को हराकर अपना खिताब बरकरार रखा है। इस विजय के साथ ही वे चैंपियनशिप के तीन भिन्न प्रारूपों यानि नॉकआउट, टूर्नामेंट तथा मैच में जीतने वाले विश्व शतरंज इतिहास के पहले खिलाड़ी बन गये हैं। वाणिज्य में स्नातक विश्वनाथन आनंद पढ़ने के अलावा तैराकी और संगीत के बहुत शौक़ीन हैं।

खेल उपलब्धियाँ :

        1988 में भारत के पहले ग्रैंडमास्टर बने। 2000 में फीडे विश्व शतरंज चैम्पियनशिप जीतने वाले पहले भारतीय बने ।शतरंज ऑस्कर 6 बार जीता। 2007 और 2008 में विश्व शतरंज चैंपियन रहे।पाँच बार विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद अब तक पाँच बार विश्व शतरंज चैंपियन बन चुके हैं। वर्ष 2000 में पहली बार विश्व चैंपियन बने विश्वनाथन आनंद, वर्ष 2007 से अब तक (2012) लगातार चार बार विश्व चैंपियन हैं।

सम्मान और पुरस्कार :


        विश्वनाथन आनंद को भारत सरकार ने खेल क्षेत्र में अर्जुन अवॉर्ड (१९८५), पद्म श्री (१९८७), पद्म भूषण (२०००), पद्म विभूषण (२००७), राजीव गांधी खेल रत्न (१९९१-१९९२) से सम्मानित किया था।

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