Water Pollution in Hindi) | जल प्रदूषणः एक गम्भीर समस्या

जल प्रदूषणः एक गम्भीर समस्या

(Water Pollution in Hindi)

 

प्राकृतिक संसाधनों में प्राणियों के अस्तित्व के लिए जल सबसे आवश्यक तत्व है, जल से ही धरती पर जीवन का निर्वहन होता है, परन्तु दूसरी ओर मनुष्य इसे विकारग्रस्त करके प्रदूषित करने के प्रति उत्तरदायी भी है।

 

जल प्रदूषण क्या है?

जल के अवयवों में बाहरी तत्व प्रवेश कर जाते है तो उनका मौलिक संतुलन बिगड़ जाता है। इस प्रकार जल के दूषित होने की प्रक्रिया या जल में हानिकारक तत्वों की मात्रा का बढ़ना जल प्रदूषण कहलाता है तथा ऐसे पदार्थ जो जल को प्रदूषित करते हैं जल प्रदूषक (water pollutant) कहलाते हैं।

 

जल प्रदूषण को मुख्यतः मनुष्य द्वारा अपने क्रियाकलापों से उसके प्राकृतिक, रासायनिक और जैविक घटकों में धीरे-धीरे कमी पैदा करने वाले कार्यों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जल अवयवों की गुणवत्ता का कम होना पिछले कुछ दशकों से लगातार बढ़ रहा है तथा औद्योगिक एवं कृषि क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों की वृद्धि से जल प्रदूषण की समस्या अधिक विषम और गंभीर हो गई है। जल प्रदूषिण जैसी पर्यावरण संबंधी समस्या, जल स्रोतों में औद्योगिक इकाइयों द्वारा अनियंत्रित अपशिष्ट के बहाने के कारण उत्पन्न हुआ है।

 

जल प्रदूषण के मानदंड (Criteria of Water Polution)

जल प्रदूषण के प्रकार और सीमा के लिए निम्नलिखित मानदंड सुनिश्चित किए जाते हैं –

 

(1.) प्राकृतिक मानदंड: पानी का रंग, गंध, घनत्व और तापमान प्राकृतिक रूप से जल प्रदूषण के बारे में सही जानकारी देते हैं।

 

(2.) रसायनिक मानदंडपी एच, टी.डी.एस. आयनिक साम्य, छोड़े गये सघन तत्व, विलीन ऑक्सीजन (डी.ओ.), रेडियो सक्रिय पदार्थ, जैव रसायन, जैविक क्रिया विधि को कम एवं ज्यादा करने वाले जैविक पदार्थ, भारी तत्वों सहित धात्विक आयरन ऑक्साइड तथा औद्योगिक उप-उत्पाद इत्यादि।

 

जल प्रदूषकों के मुख्य स्रोत (Source of Water Pollutants)

जल प्रदूषण निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक स्रोतों से होता है-

 

निश्चित स्रोत

इस प्रकार के जल प्रदूषक स्रोतों को किसी स्थान विशेष पर तुरन्त पहचाना जा सकता है एवं ये पूर्व परिचित स्रोत होते हैं, जैसे –

  • औद्योगिक अपशिष्ट विसर्जन
  • शोधन संयंत्र, डेयरी उद्योग से बहाया हुआ पदार्थ
  • नगर मल का रिसाव, संयुक्त तथा अपरिष्कृत मल विसर्जन

 

अनिश्चित स्रोत

  • कृषि सिंचाई एवं कृषि कार्य
  • भूमंडलीय जनित प्राकृतिक लवणता एवं वनीकरण
  • भूतलीय जल का प्राकृतिक पर्यावरण के माध्यम से बहना
  • तेल क्षेत्रों से लवण जल का विसर्जन तथा शहरी क्षेत्रों से तेल एवं ग्रीस युक्त प्रवाह
  • घरेलू कूड़ा-करकट, निर्माण संबंधी गतिविधियां एवं रेडियो सक्रिय तत्व

 

जल प्रदूषक

ऐसे अवांछित तत्व जो जल में मिलकर उसकी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक संरचना में परिवर्तन कर देते हैं, जल प्रदूषक कहलाते है। प्रदूषकों का प्रकार, घनत्व, स्रोत तथा उनकी प्राकृतिक एवं रासायनिक अवस्था चारों ओर के वातावरण के साथ उनकी अभिक्रियाशीलता पर निर्भर करती है।

 

(1.) जैव प्रदूषक: जैव प्रदूषकों में विघटनशील एवं अविघटनशील दोनों ही प्रकार के उत्पाद सम्मिलित है। जैव प्रदूषकों में पादप पोषक मल, अच्छी तरह से मिले हुए जैविक उत्पाद एवं तेल इत्यादि रोग उत्पादक कारक सम्मिलित हैं। किसी भी जल संसाधन में पादप एवं सूक्ष्म जैविक समष्टि के रूप में विद्यमान विलीन ऑक्सीजन जलीय जीवन का एक अनिवार्य आवश्यकता है तथा पानी में विलय ऑक्सीजन (डी.ओ.) का स्तर 4-6 पीपीएम (प्रति दस लाख) अंश तक रहना चाहिए। जैव प्रदूषण मुख्य रूप से कृषि भूमि से बहने वाले पानी, अस्पतालों के जैव कचरे, एवं अन्य सड़े-गले अवांछित पदार्थों के शुद्ध जल में मिलने से होता है।

 

(2.) अजैव प्रदूषण: इस प्रकार के प्रदूषक तत्वों में अजैव लवण, अघुलनशील और घुलनशील पूर्ण रूप से विभाजित धातु या धात्विक संयोजन, सूक्ष्म मात्रिक तत्व, जैव असंयुक्त धातुओं का मिश्रण, जैव-धात्विक मिश्र एवं खनिज अम्ल इत्यादि सम्मिलित हैं।

 

(3.) तलछट: तलछट मृदा में अघुलनशील अज्ञात सूक्ष्म अणुओं का मिश्रण होता है जो मृदा अपरदन से जल जल स्रोतों में प्रवेश कर जाता है। वास्तव में सतही जल प्रदूषण में व्यापक प्रदूषण तत्व तलछट होते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया है कि प्राकृतिक जल में पहुंचने वाले निलंबित कणों का घनत्व स्राव के घनत्व से लगभग 700 गुणा अधिक है। क्षेत्र विशेष में होने वाली कृषि क्रियायें, भवन निर्माण एवं खनन संबंधी गतिविधियों मृदा अपरदन को अधिक प्रभावित करते है जिससे सूक्ष्म तत्व पानी में पहुंचकर तलछट के रूप में जमा होते रहते हैं।

 

(4.) रेडियो सक्रिय तत्व: मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे घातक प्रदूषकों में इन प्रदूषकों को शामिल किया जाता है। पर्यावरण से सम्बन्धित विकिरण समस्थानिक स्रोतों को प्राकृतिक एवं कृत्रिम वर्गों में विभाजित किया जाता है। रेडियो आइसोटोप काॅस्मिक किरणों से उत्पन्न होकर वर्षा या हिमपात तथा वायु के माध्यम से मृदा एवं जल धाराओं में पहुंच जाते हैं। दूसरी ओर मानव निर्मित रेडियो समस्थानिकों में मुख्यतः परमाणु परीक्षणों से होने वाले अवघात विस्फोट, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से निकलने वाला रेडियो सक्रिय अपशिष्ट, परमाणु संस्थानों और आयुर्विज्ञान प्रतिष्ठानों की विभिन्न प्रकार की गतिविधियों से निकलने वाले रेडियो विकिरण सम्मिलित हैं।

(5.) औद्योगिक रसायन जनित प्रदूषण: जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि के कारण प्रदूषण तेज गति से बढ़ रहा है, प्रदूषण का प्रभाव औद्योगिक क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि एंटार्कटिक, आर्कटिक और सुदूर स्थित प्रकृति संरक्षित क्षेत्रों सहित समस्त भूमण्डल पर देखा गया है। इस प्रकार प्रदूषकों की बढ़ती सघनता के परिणामस्वरूप कुछ पदार्थों की सान्द्रता के बढ़ने से पारिस्थितिक तंत्र पर विषैले प्रभाव पड़ रहे हैं। एक करोड़ दस लाख ज्ञात रसायनों में से लगभग 60000-70000 रसायन नियमित प्रयोग में आते हैं। पर्यावरण को विषाक्त बनाने वाले इन रसायनों के प्रभाव का आंकड़ा धीमा है लेकिन फिर भी कुछ ऐसे मामले सामने आये हैं जिनसे सिद्ध होता है कि भारी धातु, उपधातु, कीटनाशक, कपड़े धोने वाले साबुन, डिटर्जेंट युक्त यौगिक तथा अग्निशमन रसायन जल स्रोतों में मिलकर उनको विषाक्त बना रहे हैं।

 

(6.) तेलीय जल प्रदूषण: कमोबेश तेल प्रदूषण तेल भण्डारण रिसाव, जीवाश्म ईंधन उपयोग, ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि एवं तेल टैंकरों से रिसाव आदि से होता है जिससे तैलीय प्रदूषण भूमंडलीय जलवायु में परिवर्तन उत्पन्न करते हैं। इसके अलावा जलयानों एवं तेल पाइप लाइनों से रिस कर निकलने वाला तेल तथा तलघरों में बनाये गये तेल भण्डारों से तेलीय हाइड्रोकार्बन विभिन्न माध्यमों द्वारा ताजे पानी में मिलकर उसे प्रदूषित करते रहते हैं। तेलीय प्रदूषण से मछलियों एवं अन्य जलीय जीवों पर घातक प्रभाव देखे गये हैं।

 

जल प्रदूषण नियंत्रण के उपाय (Solution of Water Pollution)

जल प्रदूषण नियंत्रण के निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं-

 

  • कीटनाशकों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाना चाहिए, इनकी जगह जैवनाशकों जैसे बैसिलस या ऐसे विषाणुओं का प्रयोग करना चाहिए जो सिर्फ कीटाणुओं का नाश करें। इसके अतिरिक्त जैव उत्प्रेरकों जैसे राइजोबियम, नीलहरित शैवाल, एजोटोबैक्टर, माइकोराइजा का प्रयोग करना चाहिए।
  • कूड़े-करकट को जलाशयों एवं नदियों में न डालकर शहर से बाहर किसी गड्ढे में डालना चाहिए।
  • उर्वरक एवं विद्धयुत संयंत्रों से सल्फर तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने अम्लीय वर्षा को रोका जा सकता है।
  • मृत जीव-जन्तुओं को नदियों में प्रभावित न करने के साथ चिता की राख नदियों में नहीं डालनी चाहिए।
  • चमड़ा उद्योग में चमड़ी से बाल निकालने तथा उसे नरम करने की प्रक्रिया में प्रोटियस एंजाइम को व्यवहार में लाना चाहिए। इस प्रक्रिया में अल्प जल के साथ-साथ सल्फेट, टैनिन, अमोनिया, क्रोमियम आदि रसायनों का भी अल्प मात्रा में उपयोग होता है।
  • कपड़ा तथा अन्य उद्योग जिनमें रंगों का प्रयोग होता है उनके रंगीन जल में रंगों का शोषण करने के लिए लिग्निन का प्रयोग करना चाहिए जो कागज उत्पाद के अवशिष्ट जल में पाया जाता है।
  • सीवर लाइनों का जल शहर से बाहर शोधन करके नदियों में डालना चाहिए।
  • तैलीय पदार्थों से बने कीचड़ को बायोरेमिडियेशन तकनीक द्वारा शुद्ध करना चाहिए तथा मिट्टी के साथ कीचड़ को मिलाकर उसकी सांद्रता एवं तापमान बनाये रखते हुए उसमें यूरिया एवं फास्फेट आदि डालकर उसे खाद में बदल देना चाहिए।

जल प्रदूषणः एक गम्भीर समस्या

(Water Pollution in Hindi)

 

प्राकृतिक संसाधनों में प्राणियों के अस्तित्व के लिए जल सबसे आवश्यक तत्व है, जल से ही धरती पर जीवन का निर्वहन होता है, परन्तु दूसरी ओर मनुष्य इसे विकारग्रस्त करके प्रदूषित करने के प्रति उत्तरदायी भी है।

 

जल प्रदूषण क्या है?

जल के अवयवों में बाहरी तत्व प्रवेश कर जाते है तो उनका मौलिक संतुलन बिगड़ जाता है। इस प्रकार जल के दूषित होने की प्रक्रिया या जल में हानिकारक तत्वों की मात्रा का बढ़ना जल प्रदूषण कहलाता है तथा ऐसे पदार्थ जो जल को प्रदूषित करते हैं जल प्रदूषक (water pollutant) कहलाते हैं।

 

जल प्रदूषण को मुख्यतः मनुष्य द्वारा अपने क्रियाकलापों से उसके प्राकृतिक, रासायनिक और जैविक घटकों में धीरे-धीरे कमी पैदा करने वाले कार्यों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जल अवयवों की गुणवत्ता का कम होना पिछले कुछ दशकों से लगातार बढ़ रहा है तथा औद्योगिक एवं कृषि क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों की वृद्धि से जल प्रदूषण की समस्या अधिक विषम और गंभीर हो गई है। जल प्रदूषिण जैसी पर्यावरण संबंधी समस्या, जल स्रोतों में औद्योगिक इकाइयों द्वारा अनियंत्रित अपशिष्ट के बहाने के कारण उत्पन्न हुआ है।

 

जल प्रदूषण के मानदंड (Criteria of Water Polution)

जल प्रदूषण के प्रकार और सीमा के लिए निम्नलिखित मानदंड सुनिश्चित किए जाते हैं –

 

(1.) प्राकृतिक मानदंड: पानी का रंग, गंध, घनत्व और तापमान प्राकृतिक रूप से जल प्रदूषण के बारे में सही जानकारी देते हैं।

 

(2.) रसायनिक मानदंडपी एच, टी.डी.एस. आयनिक साम्य, छोड़े गये सघन तत्व, विलीन ऑक्सीजन (डी.ओ.), रेडियो सक्रिय पदार्थ, जैव रसायन, जैविक क्रिया विधि को कम एवं ज्यादा करने वाले जैविक पदार्थ, भारी तत्वों सहित धात्विक आयरन ऑक्साइड तथा औद्योगिक उप-उत्पाद इत्यादि।

 

जल प्रदूषकों के मुख्य स्रोत (Source of Water Pollutants)

जल प्रदूषण निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक स्रोतों से होता है-

 

निश्चित स्रोत

इस प्रकार के जल प्रदूषक स्रोतों को किसी स्थान विशेष पर तुरन्त पहचाना जा सकता है एवं ये पूर्व परिचित स्रोत होते हैं, जैसे –

  • औद्योगिक अपशिष्ट विसर्जन
  • शोधन संयंत्र, डेयरी उद्योग से बहाया हुआ पदार्थ
  • नगर मल का रिसाव, संयुक्त तथा अपरिष्कृत मल विसर्जन

 

अनिश्चित स्रोत

  • कृषि सिंचाई एवं कृषि कार्य
  • भूमंडलीय जनित प्राकृतिक लवणता एवं वनीकरण
  • भूतलीय जल का प्राकृतिक पर्यावरण के माध्यम से बहना
  • तेल क्षेत्रों से लवण जल का विसर्जन तथा शहरी क्षेत्रों से तेल एवं ग्रीस युक्त प्रवाह
  • घरेलू कूड़ा-करकट, निर्माण संबंधी गतिविधियां एवं रेडियो सक्रिय तत्व

 

जल प्रदूषक

ऐसे अवांछित तत्व जो जल में मिलकर उसकी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक संरचना में परिवर्तन कर देते हैं, जल प्रदूषक कहलाते है। प्रदूषकों का प्रकार, घनत्व, स्रोत तथा उनकी प्राकृतिक एवं रासायनिक अवस्था चारों ओर के वातावरण के साथ उनकी अभिक्रियाशीलता पर निर्भर करती है।

 

(1.) जैव प्रदूषक: जैव प्रदूषकों में विघटनशील एवं अविघटनशील दोनों ही प्रकार के उत्पाद सम्मिलित है। जैव प्रदूषकों में पादप पोषक मल, अच्छी तरह से मिले हुए जैविक उत्पाद एवं तेल इत्यादि रोग उत्पादक कारक सम्मिलित हैं। किसी भी जल संसाधन में पादप एवं सूक्ष्म जैविक समष्टि के रूप में विद्यमान विलीन ऑक्सीजन जलीय जीवन का एक अनिवार्य आवश्यकता है तथा पानी में विलय ऑक्सीजन (डी.ओ.) का स्तर 4-6 पीपीएम (प्रति दस लाख) अंश तक रहना चाहिए। जैव प्रदूषण मुख्य रूप से कृषि भूमि से बहने वाले पानी, अस्पतालों के जैव कचरे, एवं अन्य सड़े-गले अवांछित पदार्थों के शुद्ध जल में मिलने से होता है।

 

(2.) अजैव प्रदूषण: इस प्रकार के प्रदूषक तत्वों में अजैव लवण, अघुलनशील और घुलनशील पूर्ण रूप से विभाजित धातु या धात्विक संयोजन, सूक्ष्म मात्रिक तत्व, जैव असंयुक्त धातुओं का मिश्रण, जैव-धात्विक मिश्र एवं खनिज अम्ल इत्यादि सम्मिलित हैं।

 

(3.) तलछट: तलछट मृदा में अघुलनशील अज्ञात सूक्ष्म अणुओं का मिश्रण होता है जो मृदा अपरदन से जल जल स्रोतों में प्रवेश कर जाता है। वास्तव में सतही जल प्रदूषण में व्यापक प्रदूषण तत्व तलछट होते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया है कि प्राकृतिक जल में पहुंचने वाले निलंबित कणों का घनत्व स्राव के घनत्व से लगभग 700 गुणा अधिक है। क्षेत्र विशेष में होने वाली कृषि क्रियायें, भवन निर्माण एवं खनन संबंधी गतिविधियों मृदा अपरदन को अधिक प्रभावित करते है जिससे सूक्ष्म तत्व पानी में पहुंचकर तलछट के रूप में जमा होते रहते हैं।

 

(4.) रेडियो सक्रिय तत्व: मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे घातक प्रदूषकों में इन प्रदूषकों को शामिल किया जाता है। पर्यावरण से सम्बन्धित विकिरण समस्थानिक स्रोतों को प्राकृतिक एवं कृत्रिम वर्गों में विभाजित किया जाता है। रेडियो आइसोटोप काॅस्मिक किरणों से उत्पन्न होकर वर्षा या हिमपात तथा वायु के माध्यम से मृदा एवं जल धाराओं में पहुंच जाते हैं। दूसरी ओर मानव निर्मित रेडियो समस्थानिकों में मुख्यतः परमाणु परीक्षणों से होने वाले अवघात विस्फोट, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से निकलने वाला रेडियो सक्रिय अपशिष्ट, परमाणु संस्थानों और आयुर्विज्ञान प्रतिष्ठानों की विभिन्न प्रकार की गतिविधियों से निकलने वाले रेडियो विकिरण सम्मिलित हैं।

(5.) औद्योगिक रसायन जनित प्रदूषण: जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि के कारण प्रदूषण तेज गति से बढ़ रहा है, प्रदूषण का प्रभाव औद्योगिक क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि एंटार्कटिक, आर्कटिक और सुदूर स्थित प्रकृति संरक्षित क्षेत्रों सहित समस्त भूमण्डल पर देखा गया है। इस प्रकार प्रदूषकों की बढ़ती सघनता के परिणामस्वरूप कुछ पदार्थों की सान्द्रता के बढ़ने से पारिस्थितिक तंत्र पर विषैले प्रभाव पड़ रहे हैं। एक करोड़ दस लाख ज्ञात रसायनों में से लगभग 60000-70000 रसायन नियमित प्रयोग में आते हैं। पर्यावरण को विषाक्त बनाने वाले इन रसायनों के प्रभाव का आंकड़ा धीमा है लेकिन फिर भी कुछ ऐसे मामले सामने आये हैं जिनसे सिद्ध होता है कि भारी धातु, उपधातु, कीटनाशक, कपड़े धोने वाले साबुन, डिटर्जेंट युक्त यौगिक तथा अग्निशमन रसायन जल स्रोतों में मिलकर उनको विषाक्त बना रहे हैं।

 

(6.) तेलीय जल प्रदूषण: कमोबेश तेल प्रदूषण तेल भण्डारण रिसाव, जीवाश्म ईंधन उपयोग, ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि एवं तेल टैंकरों से रिसाव आदि से होता है जिससे तैलीय प्रदूषण भूमंडलीय जलवायु में परिवर्तन उत्पन्न करते हैं। इसके अलावा जलयानों एवं तेल पाइप लाइनों से रिस कर निकलने वाला तेल तथा तलघरों में बनाये गये तेल भण्डारों से तेलीय हाइड्रोकार्बन विभिन्न माध्यमों द्वारा ताजे पानी में मिलकर उसे प्रदूषित करते रहते हैं। तेलीय प्रदूषण से मछलियों एवं अन्य जलीय जीवों पर घातक प्रभाव देखे गये हैं।

 

जल प्रदूषण नियंत्रण के उपाय (Solution of Water Pollution)

जल प्रदूषण नियंत्रण के निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं-

 

  • कीटनाशकों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाना चाहिए, इनकी जगह जैवनाशकों जैसे बैसिलस या ऐसे विषाणुओं का प्रयोग करना चाहिए जो सिर्फ कीटाणुओं का नाश करें। इसके अतिरिक्त जैव उत्प्रेरकों जैसे राइजोबियम, नीलहरित शैवाल, एजोटोबैक्टर, माइकोराइजा का प्रयोग करना चाहिए।
  • कूड़े-करकट को जलाशयों एवं नदियों में न डालकर शहर से बाहर किसी गड्ढे में डालना चाहिए।
  • उर्वरक एवं विद्धयुत संयंत्रों से सल्फर तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने अम्लीय वर्षा को रोका जा सकता है।
  • मृत जीव-जन्तुओं को नदियों में प्रभावित न करने के साथ चिता की राख नदियों में नहीं डालनी चाहिए।
  • चमड़ा उद्योग में चमड़ी से बाल निकालने तथा उसे नरम करने की प्रक्रिया में प्रोटियस एंजाइम को व्यवहार में लाना चाहिए। इस प्रक्रिया में अल्प जल के साथ-साथ सल्फेट, टैनिन, अमोनिया, क्रोमियम आदि रसायनों का भी अल्प मात्रा में उपयोग होता है।
  • कपड़ा तथा अन्य उद्योग जिनमें रंगों का प्रयोग होता है उनके रंगीन जल में रंगों का शोषण करने के लिए लिग्निन का प्रयोग करना चाहिए जो कागज उत्पाद के अवशिष्ट जल में पाया जाता है।
  • सीवर लाइनों का जल शहर से बाहर शोधन करके नदियों में डालना चाहिए।
  • तैलीय पदार्थों से बने कीचड़ को बायोरेमिडियेशन तकनीक द्वारा शुद्ध करना चाहिए तथा मिट्टी के साथ कीचड़ को मिलाकर उसकी सांद्रता एवं तापमान बनाये रखते हुए उसमें यूरिया एवं फास्फेट आदि डालकर उसे खाद में बदल देना चाहिए।

-सतीश पाण्डेय

Blog – www.onlinegyani.com