मेरा देश ओर पश्चिमी सभ्यता - ​नीरज ​शर्मा  | Incredible Poem About Our Country And Western Culture

 

हिंदी  साहित्य मार्गदर्शन[HSM] में हमने हमेशा से छुपे हुए कवियों की प्रतिभा को सराहने की कोशिश की है, इसी कोशिश को आगे बढ़ाते हुए हम आज नीरज शर्मा जी की कविता को प्रकाशित कर रहे हैं।

अगर आपके अन्दर भी कोई लेखक या कवि छुपा है तो उसे बाहर लाने में हम आपकी मदद करेंगे। अगर आप चाहें तो आपके लिखे हुए आर्टिकल्स आप हमारे माध्यम से हजारों लोगों तक पहुंचा सकते हैं। अपनी रचनाएँ यहाँ प्रकाशित करने के लिए आप इस लिंक पर  दिए गए निर्देशों का अनुशरण कर सकते हैं।  


मेरा देश ओर पश्चिमी सभ्यता



 
देश से पूछ लिया मैंने तू पश्चिम को क्यु जाता है 

 

क्या है वहाँ पर ऐसा जो तुझको लुभाता है

 

जवाब मिला मुझे ऐसा मैं सच कहते शर्माता हूँ 

 

पर थोड़ी हिम्मत करके वो नज़ारा तुम्हें दिखाता हूँ

 

 

 

कहने लगा के :

विकाशसील होते हुए भी मेरे बच्चे भूखे रहते हैं

 

सोने की चिड़िया था जो अब उसे गरीब क्यु कहते हैं

 

संसद मे जाकर गुंडे क्यु नेता कहलाते हैं 

 

रोता है दिल मेरा जब मेरे बाशिंदे बिखलाते हैं

 

सीमा पर तो जवान गोली खा कर मर जाते हैं
पर सत्ता के गलियारे वहाँ भी रंग दिखते हैं
शहीदों की इज्जत नहीं इन्हें ये ताबूतों से भी खाते हैं
वोटों को पाने की खातिर मगरमच्छ के आँसू बहते हैं
औरत की ईज्जत थी यहाँ अब उसके जिस्म से रोटी खाते हैं
देवी को भी बखसा नहीं अबला पर बल आजमाते हैं
मेरे अपने ही बच्चे मुझपर तलवार चलाते हैं
जात-धर्म का नाम ले दंगे यहाँ करवाते हैं
हिन्दू या सिक्ख हो चाहे कोई पर मेरा ही खून बहते हैं
बाप के कंधे पर बेटे की अर्थी उठवाते हैं
 
दूध की नदियां थी जहां , वहाँ शराब कहाँ से आई है
माँ क्यु बेटे को बेटा कहते शर्मायी है
ससुराल से बहू की डोली वापस घर क्यु आई है
बचा कर क्या रखा है तुमने मेरी संस्कृति क्यु ठुकराई है
राम – लखन के इस देश मे दुश्मन क्यु भाई भाई हैं
मर्यादा को गए हैं भूल कुछ संत भी बने कसाई हैं
अब ओर न पूछो कुछ मुझसे मेरी आंखे ही भर आई हैं
ऐसा लगता है तुमने मेरी तबाही की कसमें खाई हैं
 
मुझे अपने ही लूट रहे हैं गैर तो घबराते हैं
घर मे रहते हैं क्यु विभीषण, जयचंद कहाँ से आते हैं
जगतगुरु रहे हैं हम अब जगवाले हमें सिखाते हैं
हालत देखकर ऐसी अपनी आँसू खुद ही आते हैं
इज्जत लूट रहे हैं अपने तभी तो हम घबराते हैं
इतने गिर गए हैं हम के अब खुद से ही शर्माते हैं
अब ओर न पूछो कुछ मुझसे वो पिछले दिन याद आते हैं
क्या अब भी मुझसे पूछोगे हम पश्चिम को क्यु जाते हैं............?
जय हिन्द ।
 
-नीरज  शर्मा 

 

Author Bio

Name : Neeraj Sharma
Father's name : Sh. Dharambir Singh
Mother's name: Smt. Rajbala Devi
D.O.B: 18/4/1984
Address: Rohtak
Email id: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.