ट्रंप और पुतिन

किसी और चीज़ की तुलना में अगर किसी एक बात से हमारी दुनिया बदल जाती है, तो वो युद्ध है.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान साल 1945 की आठ मई यानी 'यूरोप में जीत का दिन', यक़ीनन वो दिन युद्ध का अंतिम अध्याय नहीं था.

जापान बुरी तरह से हार गया था, नाज़ी जर्मनी की फ़ौज ने मित्र देशों की गठबंधन सेना के सामने बिना किसी शर्त के हथियार डाल दिए थे.

और इतिहास एक नए युग में दाखिल हुआ, महाशक्तियों के बीच ताक़त के संतुलन के आधार पर एक नई विश्व व्यवस्था की दिशा में दुनिया ने ज़रूरी क़दम बढ़ाया.

लड़ाई ख़त्म होने के बाद अमरीका एक सैन्य सुपरपावर की तरह उभरा. परमाणु हथियारों के विकास के मामले में अमरीका रूस से आगे निकल गया

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Image captionसंयुक्त राष्ट्र का गठन 1945 में हुआ था, अब इसके 193 ज़िले हैं

नेटो का गठन

इसके बाद परमाणु शक्ति को ही दुनिया में ताक़तवर होने का पैमाने माना जाने लगा. रूस भी जल्द ही इस रेस में शामिल हो गया.

पूर्वी यूरोप पर अपने दबदबे को फिर से हासिल करने की रूस की चाहत ने कम विवादों वाली नई विश्व व्यवस्था के महत्वाकांक्षी सपने को चूर-चूर कर दिया.

इसी वजह से नेटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन) का गठन हुआ और अमरीका और पश्चिमी यूरोप के बीच सैन्य और कूटनीतिक मामलों को लेकर स्थायी जुड़ाव बन गया.

इसी हफ़्ते रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टिट्यूट (आरयूएसआई) की ओर से आयोजित वेबिनार (ऑनलाइन सेमीनार) में पत्रकार और इतिहासकार एनी एप्पलेबॉम ने ध्यान दिलाया कि "इस घटनाक्रम ने पश्चिम की अवधारणा को जन्म दिया. मूल्यों पर आधारित ये ऐसा गठबंधन था जो केवल सीमाओं को लेकर नहीं था बल्कि विचारों के बारे में भी था."

ट्रंप प्रशासन के दौर में अमरीका और चीन के बीच का तनाव बढ़ा हैइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image captionट्रंप प्रशासन के दौर में अमरीका और चीन के बीच का तनाव बढ़ा है

शून्य से शुरुआत

लेकिन ऐसा केवल नेटो को लेकर नहीं कहा जा सकता है. जैसा कि प्रोफ़ेसर माइकल क्लार्क अंडरलाइंस याद दिलाते हैं कि संगठनों का एक पूरा नेटवर्क हुआ करता था.

प्रोफ़ेसर माइकल क्लार्क कहते हैं, "युद्ध के पहले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का जो ढांचा हुआ करता था, उसका अब बहुत थोड़ा हिस्सा बचा हुआ है. इस बात को लेकर साल 1919 से भी ज़्यादा समझदारी थी कि एक नई विश्व व्यवस्था के निर्माण के लिए शून्य से शुरुआत करनी होगी."

"संयुक्त राष्ट्र इस दिशा में एक प्रमुख उपलब्धि थी. फिर आया ब्रेटन वुड्स इकनॉमिक सिस्टम (अमरीका, कनाडा, पश्चिम यूरोप के देश, ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच कारोबार समझौता), विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष. ब्रिटेन इस पूरी प्रक्रिया में काफ़ी असरदार रहा लेकिन अमरीका की ताक़त निर्णायक थी."

"तकरीबन सभी अंतरराष्ट्रीय संगठन इस बात पर निर्भर थे कि अमरीका उनकी स्थापना में कितनी दिलचस्पी लेता है और उन्हें कितना समर्थन देता है. पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले संगठन के दायरे से बाहर पचास और साठ के दशक में एक बहुत अलग किस्म की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था वजूद में आई. ये अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब दबाव में है क्योंकि इसकी राजनीतिक बुनियाद तेज़ी से बदल रही है."

कोरोना वायरस नक्शे पर

 
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12,00,000
गोले प्रत्येक देश में कोरोना वायरस के पुष्ट मामलों की संख्या दर्शाते हैं.

स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 7 मई 2020, 11:53 अपराह्न IST

एशिया में आर्थिक सत्ता

इसकी वजह भी है और आजकल ये हर रोज़ न्यूज़ के एजेंडे का हिस्सा है. वो उभरता हुआ चीन था. सुदूर पूर्व और एशिया में आर्थिक सत्ता की धुरी बदल रही थी.

यहां तक कि पश्चिमी देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी लोकप्रिय राजनीतिक धाराओं का उभार हो रहा था. उदाहरण के लिए नेटो के अंदरूनी संघर्ष को देखिए.

राष्ट्रपति ट्रंप अमरीका के लिए नेटो की अहमियत पर सवाल उठा चुके हैं और तुर्की और हंगरी जैसे सहयोगी देश पहले से ज़्यादा अधिकारवादी रवैया दिखा रहे हैं.

एनी एप्पलेबॉम का कहना है कि अमरीका की विदेश नीति में आए अलगाववादी रुख़ को रिपब्लिकन पार्टी के प्रभुत्व से जोड़कर देखा जा सकता है.

वो कहती हैं कि पश्चिमी मूल्यों पर आधारित व्यवस्था में दरार दिख रही है और इसे चलाने वाले राजनेताओं की नई पीढ़ी अब फ़ैसले कर रही है. अब शायद ही कोई ऐसा राजनेता बचा है जिसकी जड़ें युद्ध के तुरंत बाद वाले दौर से जुड़ी हुई हों.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 17974 3301 694
गुजरात 7012 1709 425
दिल्ली 5980 1931 66
तमिलनाडु 5409 1547 37
राजस्थान 3427 1596 97
मध्य प्रदेश 3252 1231 193
उत्तर प्रदेश 3071 1250 62
आंध्र प्रदेश 1847 780 38
पंजाब 1644 149 28
पश्चिम बंगाल 1548 364 151
तेलंगाना 1123 650 29
जम्मू और कश्मीर 793 335 9
कर्नाटक 705 366 30
हरियाणा 625 260 7
बिहार 550 246 5
केरल 503 474 4
ओडिशा 219 62 2
चंडीगढ़ 135 21 1
झारखंड 132 41 3
उत्तराखंड 61 39 1
छत्तीसगढ़ 59 38 0
असम 54 34 1
हिमाचल प्रदेश 46 38 2
लद्दाख 42 17 0
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 33 33 0
पुडुचेरी 9 6 0
गोवा 7 7 0
मणिपुर 2 2 0
मिज़ोरम 1 0 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 59 IST को अपडेट किया गया

समकालीन इतिहास से बेरुख़ी

ऐसा नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के फलक पर चीन का पदार्पण कोई अभी-अभी हुआ है. वो शुरू से ही संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य रहा है.

माइकल क्लार्क कहते हैं, "युद्ध से पहले भी और युद्ध के दौरान भी अमरीका के मन में चीन को लेकर विशेष चिंता रही थी. हालांकि अब उसका पहले की तरह ज़िक्र नहीं होता है. नई विश्व व्यवस्था में अमरीका ने चीन को साम्यवाद के उदय से पहले भी हमेशा एक महाशक्ति के तौर पर देखा था."

"उस ताक़त के रूप में जो ब्रिटेन और फ्रांस की पुरानी राजशाही के ख़िलाफ़ संतुलन साधने का माद्दा रखता हो. इसलिए अमरीका को उस समय बड़ा धक्का लगा जब 1949 में चीन का नियंत्रण साम्यवादियों के हाथ में चला गया. अमरीका की ये तकलीफ़ 1972 तक बनी रही. दुनिया में चीन की भूमिका को देखते हुए अमरीका अब दोबारा से मोहभंग का शिकार होता हुआ दिख रहा है."

 
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भारत, चीन जैसे देश

माइकल क्लार्क की बात से किंग्स कॉलेज के प्रोफ़ेसर लॉरेंस फ्रीडमैन सहमत दिखते हैं.

प्रोफ़ेसर लॉरेंस इस बात पर ज़ोर देते हैं कि शीत युद्ध के दौरान चीन का मुद्दा अलग था.

"आज की तरह 20वीं सदी के चीन को आर्थिक तकनीकी ख़तरे की तरह नहीं देखा जाता था. जंग के बाद की विश्व व्यवस्था का अंत का कारण अमरीका का कमज़ोर पड़ना नहीं है बल्कि वो तो इसका लक्षण है. अमरीका अब फिर से उसी मुकाम को हासिल करने की कोशिश कर रहा है."

"नई उभरती हुई विश्व व्यवस्था इस सीधी सी बात निर्भर करती है दुनिया की आधी से ज़्यादा आबादी भारत, चीन और दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों में रह रही है. इसी से विश्व का आर्थिक भूगोल तय होता है. उनकी ये ताक़त राष्ट्रीय राजनीतिक सत्ता में बदल जाती है और ये दुनिया के सियासी ढांचे में उसी हिसाब से जगह बना लेता है."

 
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कोविड-19 की महामारी

तो क्या कोविड-19 की महामारी के संकट से दुनिया में कुछ बदलने जा रहा है?

माइकल क्लार्क का कहना है कि महामारी के बाद की दुनिया 'एशिया की सदी' तक सिमट कर रहने वाली नहीं है. लेकिन इसका असर होगा और आने वाले दशकों में कुछ वास्तविक बदलाव दिखेंगे.

उनका कहना है, "चीन को लंबे समय के लिए नुक़सान होने जा रहा है. पहला ये कि उसने इस महामारी को जिस तरह से हैंडल किया, उसकी राजनीतिक आलोचना हो रही है और दूसरा ये कि सप्लाई चेन को लेकर उस पर दूसरों की निर्भता से चीन कैसे निपटता है."

हालांकि कोविड-19 के बाद के दौर की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कैसी होगी, फिलहाल ये कहना जल्दबाज़ी होगा.

हां, इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पब्लिक सर्विस और भाईचारे की भावना जिस तरह से बनी थी, वैसा कुछ हो तो बेहतर रहेगा लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं, ऐसा होने की संभावना कम ही है.