भारत, संरक्षण और वन्य जीवन प्रबंधन से संबंधित कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का हस्ताक्षरी रहा है। इनमें से कुछ जैव विविधता सम्मेलन, वन्य जीव और वनस्पति की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर आधारित सम्मेलन (सीआईटीईएस) आदि रहे हैं। भारत दुनिया के 17 बिशाल विविधतापूर्ण देशों में से एक है। लेकिन कई पौधों और जानवरों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। गंभीर खतरे और अन्य विलुप्तप्राय पौधों तथा पशु प्रजातियों की रक्षा करने के लिए भारत सरकार ने कई कदम, कानून और नीतिगत पहलों को अपनाया है।
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कृषि, वन तथा मत्स्यिकी उत्पाद, स्थायी प्राकृतिक जलीय चक्र, उपजाऊ मृदा, संतुलित जलवायु तथा अनेक अन्य विस्तृत पारिस्थितिक तंत्र जैव विविधता के संरक्षण पर निर्भर करते हैं। खाद्य पदार्थों का उत्पादन जैव विविधता के लिए विभिन्न प्रकार के खाद्य पौधों, परागण की प्रक्रिया, कीट नाशक, पौषक तत्वों, तथा बीमारियों से सुरक्षा एवं बचाव पर निर्भर करता है। औषधीय पौधों तथा उत्पादित औषधियाँ दोनों ही जैव-विविधता पर निर्भर करती हैं।
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एक “दबाव वाले द्रव्य (pressurized fluid.)” द्वारा एक चट्टानी परत में दरार को चौड़ा करना या फैलाना जलीय विभंजन है। निश्चित छेद और बांध कुछ प्राकृतिक जलीय विभंजन के कुछ उदाहरण हैं और ये नलिका का निर्माण कर सकते हैं जिसके साथ चट्टानों के स्त्रोतों से गैस ,पेट्रोलियम और जल चट्टानों में चला जाता हैं। सामान्यत: जल विभंजन को फ्रेकिंग के रूप में जाना जाता है, जो एक तकनीक है जिसमे पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस का प्रय़ोग (शेल गैस, तंग गैस और कोयले की सतही गैस सहित) फ्रेकिंग के लिए किया जाता है।

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