लेखक: अज्ञेय
मैं कोई कहानी नहीं कहता. कहानी कहने का मन भी नहीं होता, और सच पूछो तो मुझे कहानी कहना आता भी नहीं है. लेकिन जितना ही अधिक कहानी पढ़ता हूं या सुनता हूं उतना ही कौतूहल हुआ करता है कि कहानियां आख़िर बनती कैसे हैं! फिर यह भी सोचने लगता हूं कि अगर ऐसे न बनकर ऐसे बनतीं तो कैसा रहता? और यह प्रश्न हमेशा मुझे पुरानी या पौराणिक गाथाओं की ओर ले जाता है. कहते हैं कि पुराण-गाथाएं सब सर्वदा सच होती है, क्योंकि उनका सत्य काव्य-सत्य होता है, वस्तु-सत्य नहीं. उस प्रतीक सत्य को युग के परिवर्तन नहीं छू सकते.
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