जल प्रबंधन की नीतियों और नियमों के समूहों के तहत जल संसाधनों का प्रबंधन शामिल है। जल,पहले एक प्रचुर प्राकृतिक संसाधन हुआ करता था, पर सूखे और अत्यधिक उपयोग के कारण अब यह अधिक मूल्यवान वस्तु बनता जा रहा है। भारत में कई जगहों पर भूमिगत जल को औद्योगिक और नगरीय अपशिष्टों, उत्सर्जन, सीवेज चैनलों और कृषि/खेतों से बहकर आये जालों से होने वाले क्षरण के कारण संक्रमण का खतरा है | उदहारण के लिए पेय जल में नाइट्रेट की अत्यधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है |
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भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक प्रकार के वन पाये जाते हैं। मुख्यत: छ: प्रकार के वन समूह हैं जैसे आर्द्र उष्णकटिबंधीय वन, शुष्क उष्णकटिबंधीय, पर्वतीय उप-उष्णकटिबंधीय, उप-अल्पाइन, उप शीतोष्ण तथा शीतोष्ण जिन्हें 16 मुख्य वन प्रकारों में उपविभाजित किया गया है। प्रामाणिक रूप से भारत में अनेकानेक प्रकार के वन हैं- दक्षिण में केरल के वर्षा वनों से लेकर लद्दाख (उत्तर)में एल्पाइन वन, पश्चिम में राजस्थान के मरूस्थल से लेकर पूर्वोत्तर के सदाबहार वन।
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हमारा वातावरण हमें रोजमर्रा के जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की एक किस्म प्रदान करता है। इन प्राकृतिक संसाधनों में हवा, पानी, मिट्टी, खनिज के साथ-साथ जलवायु और सौर ऊर्जा शामिल हैं जो प्रकृति के निर्जीव या अजैविक भाग का निर्माण करते हैं। 'जैविक' या प्रकृति के सजीव भाग पौधों, जानवरों और रोगाणुओं से मिलकर बनते हैं। भौतिक भूगोल की दृष्टि से, पृथ्वी चार प्रमुख घटकों से बनती है: वायुमंडल, जीवमंडल, स्थलमंडल, और जलमण्डल।
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