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Biography (hindi)

पी. टी. उषा जीवनी - Biography of P. T. Usha in Hindi Jivani

 पिलावुळ्ळकण्टि तेक्केपरम्पिल् उषा जो आमतौर पर पी॰ टी॰ उषा के नाम से जानी जाती हैं, भारत के केरल राज्य की खिलाड़ी हैं। "भारतीय ट्रैक ऍण्ड फ़ील्ड की रानी" माने जानी वाली पी॰ टी॰ उषा भारतीय खेलकूद में १९७९ से हैं। वे भारत के अब तक के सबसे अच्छे खिलाड़ियों में से हैं। केरल के कई हिस्सों में परंपरा के अनुसार ही उनके नाम के पहले उनके परिवार/घर का नाम है। उन्हें "पय्योली एक्स्प्रेस" नामक उपनाम दिया गया था।

        1979 में पी.टी. उषा ने राष्ट्रिय शालेय खेलो में भाग लिया था, जहाँ ओ.एम. नम्बिअर को उन्होंने अपने खेल प्रदर्शन से काफी प्रभावित किया था, बाद में वही उनके कोच बने और उन्होंने उषा को प्रशिक्षण भी दिया। 1980 के मास्को ओलंपिक्स में उन्होंने खेलो में अपना पर्दापण किया था। 1982 में नयी दिल्ली के एशियन खेलो में उषा ने 100 मीटर और 200 मीटर में सिल्वर मेडल जीता था लेकिन इसके एक साल बाद ही कुवैत में एशियन ट्रैक एंड फील्ड चैंपियनशिप में उषा ने 400 मीटर में गोल्ड मेडल अपने नाम किया था और यह एक एशियन रिकॉर्ड भी था। एशियन ट्रैक एंड फील्ड चैंपियनशिप में उषा ने कुल 13 गोल्ड अर्जित किये थे।

प्रारंभिक जीवन :

        ‘उड़न परी’, ‘पायोली एक्सप्रेस’, ‘स्वर्ण परी’ आदि नामों से उसे जाना जाता है । ‘पी. टी. उषा’ यानी पिलावुल्लकन्डी थेकापराम्विल उषा ने खेलों के इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराया है । अनेक महिला खिलाड़ी पी. टी. उषा को अपनी प्रेरणास्रोत मानती हैं। पी. टी. उषा अपने पिता पैठल, जो कपड़े के एक व्यापारी हैं और मां लक्ष्मी की छह संतानों में से एक हैं । उन्हें बचपन से ही कठिन काम करके आनन्द आता था जैसे ऊंची चारदीवारी फांदना । खेलों में उनकी रुचि तब जागृत हुई जब वह कक्षा 4 में पढ़ती थीं और उनके व्यायाम के अध्यापक बालाकृष्णन ने एक दिन उषा को 7वीं कक्षा की चैंपियन छात्रा के साथ दौड़ा दिया और उषा उस दौड़ में जीत गई।

        जब उषा 7वीं कक्षा में पढ़ती थी, तब उसने उप जिला एथलेटिक्स में औपचारिक रूप से खेलों की शुरुआत की और जिले की चैंपियन बनकर उभरीं । उन्होंने 4 स्पर्धाओं में प्रथम व एक स्पर्धा में द्वितीय स्थान प्राप्त किया । तब जी.वी. रजा खेल विद्यालय की केरल में स्थापना की गई जिसमें लड़कियों के लिए खेल विभाग बनाया गया । उषा अनेक विरोधों के बावजूद 1976 में कन्नूर के खेल विभाग में शामिल हो गईं | उसके बाद ओ.एम. नाम्बियार ने उनके कोच के रूप में उनको चैंपियन बनाने के लिए कड़ी म्हणत की | उषा को यदि जिन्दगी भर अफसोस रहेगा तो केवल ओलंपिक मैडल न जीत पाने का | एक मिनट के सौवें हिस्से अर्थात् .001 में क्या कुछ हो सकता है इसके बारे में पी.टी. उषा से बेहतर कोई नहीं जान सकता । यह ओलंपिक मैडल जीतने और हारने का फर्क है|

        १९७९ में उन्होंने राष्ट्रीय विद्यालय खेलों में भाग लिया, जहाँ ओ॰ ऍम॰ नम्बियार का उनकी ओर ध्यानाकर्षित हुआ, वे अंत तक उनके प्रशिक्षक रहे। १९८० के मास्को ओलम्पिक में उनकी शुरुआत कुछ खास नहीं रही। १९८२ के नई दिल्ली एशियाड में उन्हें १००मी व २००मी में रजत पदक मिला, लेकिन एक वर्ष बाद कुवैत में एशियाई ट्रैक और फ़ील्ड प्रतियोगिता में एक नए एशियाई कीर्तिमान के साथ उन्होंने ४००मी में स्वर्ण पदक जीता।

        १९८३-८९ के बीच में उषा ने एटीऍफ़ खेलों में १३ स्वर्ण जीते। १९८४ के लॉस ऍञ्जेलेस ओलम्पिक की ४०० मी बाधा दौड़ के सेमी फ़ाइनल में वे प्रथम थीं, पर फ़ाइनल में पीछे रह गईं। मिलखा सिंह के साथ जो १९६० में हुआ, लगभग वैसे ही तीसरे स्थान के लिए दाँतों तले उँगली दबवा देने वाला फ़ोटो फ़िनिश हुआ। उषा ने १/१०० सेकिंड की वजह से कांस्य पदक गँवा दिया। ४००मी बाधा दौड़ का सेमी फ़ाइनल जीत के वे किसी भी ओलम्पिक प्रतियोगिता के फ़ाइनल में पहुँचने वाली पहली महिला और पाँचवी भारतीय बनीं।

        1984 में लोस एंजेल ओलंपिक्स में 400 मीटर की बाधा दौड़ में सेमी फाइनल प्रथम स्थान पर रहते हुए जीत लिया लेकिन फाइनल में वह मेडल जीतने से थोड़े से अंतर से चुक गयी थी, यह पल 1960 में मिल्खा सिंह की हार की याद दिलाने वाला था। लेकिन फिर भी उषा तीसरे पायदान पर स्थान बनाने में सफल रही थी। लेकिन उषा ने 1/100 सेकंड के अंतर से ब्रोंज मेडल खो दिया था। 1986 में सीओल में आयोजित 10 वे एशियन खेलो में ट्रैक एंड फील्ड खेलो में पी.टी. उषा ने 4 गोल्ड मेडल और 1 सिल्वर मेडल जीते। इसके साथ ही 1985 में जकार्ता में आयोजित छठे एशियन ट्रैक एंड फील्ड चैंपियनशिप में उषा ने 5 गोल्ड मेडल अपने नाम किये थे। किसी भी एक इंटरनेशनल चैंपियनशिप में इतने मेडल जीतना भी किसी एकल एथलिट का रिकॉर्ड ही है।

        इसके बाद इन्होने अपनी परफॉरमेंस में और अधिक सुधार के लिए और प्रयास किया, और 1984 में होने वाले ओलंपिक की तैयारी जमकर करने लगी. 1984 में लॉसएंजिल्स में हुए ओलंपिक में पी टी उषा ने सेमी फाइनल के पहले राउंड की 400 मीटर बढ़ा दौड़ को अच्छे से समाप्त कर लिया, लेकिन इसके फाइनल में वे 1/100 मार्जिन ने हार गई, और उनको ब्रोंज मैडल नहीं मिल पाया. यह मैच बहुत रोमांच से भरा रहा, जिसने 1960 में ‘मिल्खा सिंह’ की एक रेस याद दिला दी थी. इस मैच का आखिरी समय ऐसा था, की लोग अपने दांतों तले उंगलियाँ चबा जाएँ.

        हार के बाद भी पी टी उषा की यह उपलब्धि बहुत बड़ी थी, यह भारत के इतिहास में पहली बार हुआ था, जब कोई महिला एथलीट ओलंपिक के किसी फाइनल राउंड में पहुंची थी. इन्होने 55.42 सेकंड में रेस पूरी की थी, जो आज भी भारत के इवेंट में एक नेशनल रिकॉर्ड है. इसके बाद इन्होने अपनी परफॉरमेंस में और अधिक सुधार के लिए और प्रयास किया, और 1984 में होने वाले ओलंपिक की तैयारी जमकर करने लगी. 1984 में लॉसएंजिल्स में हुए ओलंपिक में पी टी उषा ने सेमी फाइनल के पहले राउंड की 400 मीटर बढ़ा दौड़ को अच्छे से समाप्त कर लिया, लेकिन इसके फाइनल में वे 1/100 मार्जिन ने हार गई, और उनको ब्रोंज मैडल नहीं मिल पाया. यह मैच बहुत रोमांच से भरा रहा, जिसने 1960 में ‘मिल्खा सिंह’ की एक रेस याद दिला दी थी. 

        उषा को बचपन से ही थोड़ा तेज चलने का शौक था। उन्हें जहाँ जाना होता बस तपाक से पहुंच जाती फिर चाहे वो गाँव की दुकान हो या स्कूल तक जाना। बात उन दिनों की है जब उषा मात्र 13 साल की थीं और उनके स्कूल में कुछ कार्यक्रम चल रहे थे जिसमें एक दौड़ की प्रतियोगिता भी थी। पी. टी. उषा के मामा ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि तू दिन भर इधर से उधर भागती रहती है, दौड़ प्रतियोगिता में भाग क्यों नहीं लेती? बस मामा की बात से प्रेरित होकर उषा ने दौड़ में भाग ले लिया। ये जानकर आपको हैरानी होगी कि उस दौड़ में 13 लड़कियों ने भाग लिया था जिनमें उषा सबसे छोटी थीं।

        जब दौड़ की शुरुआत हुई तो पी. टी. उषा इतनी तेज दौड़ी कि बाकि लड़कियाँ देखती ही रह गयीं और पी. टी. उषा ने कुछ ही सेकेंड में दौड़ जीत ली। वो दिन उषा के चमकते करियर का पहला पड़ाव था। इसके बाद उषा को 250 रुपये मासिक छात्रवृति मिलने लगी जिससे वो अपना गुजारा चलाती। वो दौड़ तो पी. टी. उषा ने आसानी से जीत ली लेकिन उस प्रतियोगिता में एक रिकॉर्ड बना जिसे कोई नहीं जानता था और ना ही किसी से उम्मीद की थी। यहाँ तक कि उषा खुद नहीं जानती थीं कि अनजाने में ही उन्होंने नेशनल रिकॉर्ड तोड़ दिया है। मात्र 13 वर्ष की आयु में उषा ने नेशनल रिकॉर्ड तोड़ डाला, जरा सोचिये कितना जोश रहा होगा उस लड़की में, कितना उत्साह भरा होगा उसकी रगों को, ये सोचकर ही मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं।

उपलब्धियाँ :

• कराची अंतर्राष्ट्रीय आमंत्रण खेलों में ४ स्वर्ण पदक 1981.
• पुणे अंतर्राष्ट्रीय आमंत्रण खेलों में २ स्वर्ण पदक
• हिसार अंतर्राष्ट्रीय आमंत्रण खेलों में १ स्वर्ण पदक.
• लुधियाना अंतर्राष्ट्रीय आमंत्रण खेलों में २ स्वर्ण पदक 1982
• सियोल में १ स्वर्ण व एक रजत जीता.
• नई दिल्ली एशियाई खेलों में २ रजत पदक 1983.
• कुवैत में एशियाई दौड़कूद प्रतियोगिता में १ स्वर्ण व १ रजत.
• नई दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय आमंत्रण खेलों में २ स्वर्ण पदक प्राप्त किए 1984.
• इंगल्वुड संयुक्त राज्य में अंतर्राष्ट्रीय आमंत्रण खेलों में २ स्वर्ण पदक.
• सिंगापुर में 8 देशीय अंतर्राष्ट्रीय आमंत्रण खेलों में ३ स्वर्ण पदक.
• टोक्यो अंतर्राष्ट्रीय आमंत्रण खेलों में ४००मी बाधा दौड़ में चौथा स्थान प्राप्त किया 1985.
• चेक गणराज्य में ओलोमोग में विश्व रेलवे खेलों में २ स्वर्ण व २ रजत पदक जीते, उन्हें सर्वोत्तम रेलवे खिलाड़ी घोषित किया गया।
• प्राग के विश्व ग्रां प्री खेल में ४००मी बाधा दौड़ में ५वाँ स्थान लंदन के विश्व ग्रां प्री खेल में ४००मी बाधा दौड़ में कांस्य पदक ब्रित्स्लावा के विश्व ग्रां प्री खेल में ४००मी बाधा दौड़ में रजत पदक पेरिस के विश्व ग्रां प्री खेल में ४००मी बाधा दौड़ में ४था स्थान बुडापेस्ट के विश्व ग्रां प्री खेल में ४००मी दौड़ में कांस्य पदक लंदन के विश्व ग्रां प्री खेल में रजत पदक ओस्त्रावा के विश्व ग्रां प्री खेल में रजत पदक कैनबरा के विश्व कप खेलों में ४००मी बाधा दौड़ में ५वाँ स्थान व ४००मी में ४था स्थान जकार्ता की एशियाई दौड़-कूद प्रतियोगिता में ५ स्वर्ण व १ कांस्य पदक 1986.
• मास्को के गुडविल खेलों में ४००मी में ६ठा स्थान.
• सिंगापुर की एशियाई दौड़ कूद प्रतियोगिता में ३ स्वर्ण व २ रजत पदक
• सिंगापुर मुक्त दौड़ प्रतियोगिता में ३ स्वर्ण पदक।

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Read more: पी. टी. उषा जीवनी - Biography of P. T. Usha in Hindi Jivani

ध्यानचंद सिंह जीवनी - Biography of Dhyan Chand in Hindi Jivani

 मेजर ध्यानचंद सिंह भारतीय फील्ड हॉकी के भूतपूर्व खिलाडी एवं कप्तान थे। उन्हें भारत एवं विश्व हॉकी के क्षेत्र में सबसे बेहतरीन खिलाडियों में शुमार किया जाता है। वे तीन बार ओलम्पिक के स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे हैं जिनमें १९२८ का एम्सटर्डम ओलोम्पिक, १९३२ का लॉस एंजेल्स ओलोम्पिक एवं १९३६ का बर्लिन ओलम्पिक शामिल है। उनकी जन्म तिथि को भारत में "राष्ट्रीय खेल दिवस" के तौर पर मनाया जाता है |

प्रारंभिक जीवन :

        मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त सन्‌ 1905 ई. को इलाहाबाद में हुआ था। उनके बाल्य-जीवन में खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी। साधारण शिक्षा प्राप्त करने के बाद 16 वर्ष की अवस्था में 1922 ई. में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से भरती हो गए।

        जब 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट' में भरती हुए उस समय तक उनके मन में हॉकी के प्रति कोई विशेष दिलचस्पी या रूचि नहीं थी। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी को है। मेजर तिवारी स्वंय भी प्रेमी और खिलाड़ी थे। उनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे देखते ही देखते वह दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए। सन्‌ 1927 ई. में लांस नायक बना दिए गए। सन्‌ 1932 ई. में लॉस ऐंजल्स जाने पर नायक नियुक्त हुए। सन्‌ 1937 ई. में जब भारतीय हाकी दल के कप्तान थे तो उन्हें सूबेदार बना दिया गया।

        ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समतुल्य माना जाता है। गेंद इस कदर उनकी स्टिक से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहाँ तक हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी गई। जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई।

        ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों। उनकी हॉकी की कलाकारी देखकर हॉकी के मुरीद तो वाह-वाह कह ही उठते थे बल्कि प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ी भी अपनी सुधबुध खोकर उनकी कलाकारी को देखने में मशगूल हो जाते थे। उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर सरीखे जिद्दी सम्राट ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश कर दी थी। लेकिन ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा।

        1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके साथ खेले और बाद में पाकिस्तान के कप्तान बने आईएनएस दारा ने वर्ल्ड हॉकी मैगज़ीन के एक अंक में लिखा था, "ध्यान के पास कभी भी तेज़ गति नहीं थी बल्कि वो धीमा ही दौड़ते थे. लेकिन उनके पास गैप को पहचानने की गज़ब की क्षमता थी. बाएं फ्लैंक में उनके भाई रूप सिंह और दाएं फ़्लैंक में मुझे उनके बॉल डिस्ट्रीब्यूशन का बहुत फ़ायदा मिला. डी में घुसने के बाद वो इतनी तेज़ी और ताकत से शॉट लगाते थे कि दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन गोलकीपर के लिए भी कोई मौका नहीं रहता था." दो बार के ओलंपिक चैंपियन केशव दत्त ने हमें बताया कि बहुत से लोग उनकी मज़बूत कलाईयों ओर ड्रिब्लिंग के कायल थे.

        "लेकिन उनकी असली प्रतिभा उनके दिमाग़ में थी. वो उस ढ़ंग से हॉकी के मैदान को देख सकते थे जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है. उनको बिना देखे ही पता होता था कि मैदान के किस हिस्से में उनकी टीम के खिलाड़ी और प्रतिद्वंदी मूव कर रहे हैं." 1947 के पूर्वी अफ़्रीका के दौरे के दौरान उन्होंने केडी सिंह बाबू को गेंद पास करने के बाद अपने ही गोल की तरफ़ अपना मुंह मोड़ लिया और बाबू की तरफ़ देखा तक नहीं. जब उनसे बाद में उनकी इस अजीब सी हरकत का कारण पूछा गया तो उनका जवाब था, "अगर उस पास पर भी बाबू गोल नहीं मार पाते तो उन्हें मेरी टीम में रहने का कोई हक़ नहीं था."

        मेजर ध्यानचंद को तेजी से गोल करने और 3 बार Olympic से Gold Medal लाने के लिए जाना जाता हैं. ध्यानचंद का असली नाम ध्यान सिंह था लेकिन वह रात को चन्द्रमा की रोशनी में प्रैक्टिस करते थे इसलिए इनके साथियों इनके नाम का पीछे चंद लगा दिया. ध्यानचंद 16 साल की उम्र में “फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट” में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हुए थे. लेकिन वे भारतीय सेना में मेजर के पद तक गए. एक बार कुछ ऐसा हुआ कि नीदरलैंड में एक मैच के दौरान उनकी हॉकी स्टिक तोड़कर देखी गई, इस शक के साथ कहीं स्टिक में कोई चुम्बक तो नहीं लगी. लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा क्योंकि जादू हॉकी स्टिक में नहीं ध्यानचंद के हाथों में था.

        एक बार मेजर साहब ने शाॅट मारा तो वह पोल पर जाकर लगा तो उन्होनें रेफरी से कहा की गोल पोस्ट की चौड़ाई कम है. जब गोलपोस्ट की चौड़ाई मापी गई तो सभी हैरान रह गए वह वाकई कम थी. ऑस्ट्रेलिया के महान क्रिकेटर सर डोनाल्ड ब्रैडमैन ने 1935 में एडिलेड में एक हॉकी मैच देखने के बाद कहा था, “ध्यानचंद ऐसे गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बनता है।” ब्रैडमैन हॉकी के जादूगर से उम्र में तीन साल छोटे थे। अपने-अपने खेल में माहिर ये दोनों हस्तियां केवल एक बार एक-दूसरे से मिलें. 1936 में जर्मन के गोलकीपर ने ध्यानचंद को जानबूझ कर गिरा दिया था. इससे मेजर का एक दाँत टूट गया था.

        1933 में एक बार वह रावलपिण्डी में मैच खेलने गए। इस घटना का उल्लेख यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि आज हॉकी के खेल में खिलाड़ियों में अनुशासनहीनता की भावना बढ़ती जा रही है और खेल के मैदान में खिलाड़ियों के बीच काफ़ी तेज़ी आ जाती है। 14 पंजाब रेजिमेंट (जिसमें ध्यानचंद भी सम्मिलित थे) और सैपर्स एण्ड माइनर्स टीम के बीच मैच खेला जा रहा था। ध्यानचंद उस समय ख्याति की चरम सीमा पर पहुँच चुके थे। उन्होंने अपने शानदार खेल से विरोधियों की रक्षापंक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

        इस पर विरोधी टीम का सेंटर-हाफ अपना संतुलन खो बैठा और असावधानी में उसके हाथों ध्यानचंद की नाक पर चोट लग गई। खेल तुरंत रोक दिया गया। प्राथमिक चिकित्सा के बाद ध्यानचंद अपनी नाक पर पट्टी बंधवाकर मैदान में लौटे। उन्होंने चोट मारने वाले प्रतिद्वंदी की पीठ थपथपाई और मुस्कराकर कहा-"सावधानी से खेलो ताकि मुझे दोबारा चोट न लगे।" उसके बाद ध्यानचंद प्रतिशोध पर उतर आए। उनका प्रतिशोध कितना आर्दश है, इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है। उन्होंने एक साथ 6 गोल कर दिए। ये सचमुच एक महान खिलाड़ी का गुण है। इससे खेल-खिलाड़ी का स्तर और प्रतिष्ठा ऊँची होती है।

स्वर्ण पदक :

        ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए।

रोचक तथ्य :

• ध्यान चंद ने 16 साल की उम्र में भारतीय सेना जॉइन की। भर्ती होने के बाद उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया। ध्यान चंद को काफी प्रैक्टिस किया करते थे। रात को उनके प्रैक्टिस सेशन को चांद निकलने से जोड़कर देखा जाता। इसलिए उनके साथी खिलाड़ियों ने उन्हें 'चांद' नाम दे दिया।
• 1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलिंपिक खेलों में वह भारत की ओर से सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी रहे। उस टूर्नमेंट में ध्यानचंद ने 14 गोल किए। एक स्थानीय समाचार पत्र में लिखा था, 'यह हॉकी नहीं बल्कि जादू था। और ध्यान चंद हॉकी के जादूगर हैं।'
• हालांकि ध्यानचंद ने कई यादगार मैच खेले, लेकिन क्या आप जानते हैं कि व्यक्तिगत रूप से कौन सा मैच उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था। ध्यान चंद ने बताया कि 1933 में कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच खेला गया बिगटन क्लब फाइनल उनका सबसे ज्यादा पसंदीदा मुकाबला था।
• 1932 के ओलिंपिक फाइनल में भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका को 24-1 से हराया था। उस मैच में ध्यानचंद ने 8 गोल किए थे। उनके भाई रूप सिंह ने 10 गोल किए थे। उस टूर्नमेंट में भारत की ओर से किए गए 35 गोलों में से 25 ध्यानचंद और उनके भाई ने किए थे।
• हिटलर ने स्वयं ध्यानचंद को जर्मन सेना में शामिल कर एक बड़ा पद देने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने भारत में ही रहना पसंद किया।
• अपनी आत्मकथा 'गोल' में उन्होंने लिखा था, आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूं।
• एक मुकाबले में ध्यानचंद गोल नहीं कर पा रहे थे तो उन्होंने मैच रेफरी से गोल पोस्ट के आकार के बारे में शिकायत की। हैरानी की बात है कि पोस्ट की चौड़ाई अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुपात में कम थी।

मृत्यु :

        हॉकी के क्षेत्र में प्रतिष्ठित सेंटर-फॉरवर्ड खिलाड़ी ध्यानचंद ने 42 वर्ष की आयु तक हॉकी खेलने के बाद वर्ष 1948 में हॉकी से संन्यास ग्रहण कर लिया. कैंसर जैसी लंबी बीमारी को झेलते हुए वर्ष 1979 में मेजर ध्यान चंद का देहांत हो गया |

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Read more: ध्यानचंद सिंह जीवनी - Biography of Dhyan Chand in Hindi Jivani

पेले जीवनी - Biography of Pelé in Hindi Jivani


 

नाम : एडिसन “एडसन” अरांटिस डो नैसिमेंटो.
जन्म : 23 अक्टूबर, 1940. ट्रेस कोराकोस.
पिता : जो रैमोस डो नैसिमैंटो.
माता : सेलेस्टे अरांटिस.
पत्नी : रोजमेरी डोस के साथ.

        पेले एक इनसाइड सेकंड फार्वर्ड के रूप में खेलते थे, जिसे प्लेमेकर का नाम भी दिया जाता है. पेले की तकनीक और प्राकृतिक जोशीलेपन की विश्वभर में प्रशंसा की गई है और उनके खेल के वर्षों में वे अपनी श्रेष्ठ ड्रिबिंग और पासिंग, अपनी रफ्तार, शक्तिशाली शाट, असाधारण सिर से मारने की क्षमता और गोल बनाने की उर्वरता के लिये मशहूर थे.

        1959 में उन्होंने Santos क्लब की ओर से पहला मैच खेला और पहला गोल भी किया और फिर सफलताओं के शिखर की ओर बढ़ते गए. मात्र 16 वर्ष  की आयु में पेले अपने देश की राष्ट्रीय टीम के सदस्य बने  और शीघ्र  ही सफलाताओं के शिखर पर पहुंच गये. 1969 में उन्होंने अपना 1000 वां  गोल किया, जब वे अपना 909वां प्रथम श्रेणी मैच खेल रहे थे.पेले के नेतृत्व में ब्राजील ने फुटबाल में कई उल्लेखनीय सफतायें प्राप्त कीं. उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में 1363 मैच खेले और 1281 गोल किये.

आरंभिक जीवन :

        पेले का जन्म ट्रेस कोराकोस, ब्राजील में एक फ्लुमिनेंस फुटबॉल खिलाड़ी डोन्डीन्हो (जन्म नाम जो रैमोस डो नैसिमैंटो) और डोना सेलेस्टी अरांटिस के पुत्र के रूप में हुआ. उनका नाम अमरीकी अन्वेषक थामस एडीसन के नाम पर एडीसन रखा गया. लेकिन उनके माता-पिता ने नाम में से अंग्रेजी अक्षर 'i' को निकाल कर 'एडसन' ऱखने का निश्चय किया, लेकिन उसके जन्म के प्रमाणपत्र में एक त्रुटि रह गई जिससे कई कागजातों में उनका नाम एडसन न होकर एडीसन ही रहा. उसके परिवार ने मूल रूप से उन्हें उपनाम डिको दिया था.

        उनका उपनाम ‘पेले’ उन्हें स्कूल के दिनों में प्राप्त हुआ, जो यह दावा किया जाता है कि उन्हें उनके पसंदीदा खिलाड़ी, स्थानीय वास्को दा गामा के गोलकीपर बिले के नाम का गलत उच्चारण करने के कारण दिया गया था – लेकिन जितना वे मना करते थे यह नाम उतना ही उनसे जुड़ता गया. अपनी आत्मकथा में, पेले ने कहा है कि उन्हें और न ही उनके मित्रों को पता था कि इस नाम का क्या अर्थ था. इस दावे के सिवाय कि यह नाम बिले से उत्पन्न हुआ है और यह चमत्कार के लिये हिब्रू शब्द है, पुर्तगाली भाषा में इस शब्द का कोई ज्ञात अर्थ नहीं है.

        पेले अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत ही खुले विचारों वाले थे. उनकी 3 शादियाँ हुई. उनकी पहली शादी रोज़मेरी डोस रईस चोल्बी के साथ सन 1966 में हुई. इससे उन्हें 2 बेटियां भी हुई, किन्तु सन 1982 में उनका तलाक़ हो गया. सन 1981 से 1986 तक वे उनकी दोस्त क्सुक्सा के साथ रोमांटिकली इन्वोलव्ड थे, जिससे उन्हें एक मॉडल बनने के लिए सहायता प्राप्त हुई. क्सुक्सा सिर्फ 17 वर्ष की थीं, जब पेले ने उनके साथ डेट शुरू की. इसके बाद सन 1994 में, उन्होंने मनोवैज्ञानिक और सुसमाचार गायक अस्सिरिया लेमोस सेइक्सास के साथ शादी की. उन्होंने 2 जुड़वाँ बच्चों को जन्म दिया. इसके बाद वे अलग – अलग हो गए. हालही में सन 2016 को पेले ने मर्सिया ओकी से शादी की है. यह उनका अब तक का व्यक्तिगत जीवन रहा.

करियर :

        सैंटोस सन 1959 में उनके पौलिस्ता के ख़िताब को बरकरार रखने में असमर्थ थे, जिससे उनकी सफलता के सपने की दोड़ पर रोक लग गई थी. लेकिन सन 1960 में उन्होंने अपनी पूरी ताकत के साथ खेल को जारी रखा और खेल के मैदान में अपना आसाधारण प्रदर्शन दिखाया, जिससे सैंटोस को यह खिताब वापस पाने में मदद मिली. क्लब ने एक टॉप स्कोरर के रूप में उनके साथ टाका ब्रासील जीता. यह वह जीत थी जिसमे सैंटोस को कोपा लीबरताडोरेस, दक्षिण अमेरिका के प्रमुख क्लब फुटबॉल टूर्नामेंट खेलने में मदद मिली थी. वर्ष 1962 उनके कैरियर का सबसे अच्छा क्लब वर्ष था. उन्होंने न केवल सैंटोस को कोपा लीबरताडोरेस प्रतियोगिता में एक रोमांचक जीत दर्ज करने के लिए निर्देशित किया, बल्कि उन्होंने क्लब की सन 1962 इंटरकांटिनेंटल कप और कम्पेओनटो ब्रसिलिएरो पर जीत दिलाने में मदद की.

        घरेलू लीग में पेले सैंटोस के लिए अपने कैरियर की शुरुआत सिर्फ 16. वह जब तक 1972-73 सत्र से ब्राजील लीग सांटोस के लिये खेला आयु वर्ग बना दिया | पेले लाभप्रद अमेरिकी लीग में अपने कैरियर समाप्त हो गया। 1975 में, वह न्यूयॉर्क Cosmos के लिए हस्ताक्षर किए और तीन सत्रों निभाई। उनकी सेवानिवृत्ति के वर्ष – वह 1977 में अमेरिका खिताब के लिए न्यू यॉर्क में Cosmos का नेतृत्व किया।

        1992 में, पेले पारिस्थितिकी और पर्यावरण के लिए एक संयुक्त राष्ट्र के राजदूत नियुक्त किया गया। उन्होंने यह भी एक यूनेस्को के सद्भावना राजदूत नियुक्त किया गया। उन्होंने न केवल अपनी पीढ़ी के सबसे प्रतिभाशाली फुटबॉल खिलाड़ी में से एक यह भी एक सौम्य व्यवहार आदमी है जो एक सकारात्मक प्रभाव के लिए उनकी ख्याति और प्रतिष्ठा का इस्तेमाल किया है.

        1964 में अर्जेन्टाइना के विरुद्ध खेलते हुए इन्हें विपक्षी टीम का खिलाडी बार-बार किक मारता था । रैफरी ने उस खिलाडी को निकालने की बजाय पैले को निकालकर यह साबित करना चाहा कि लोग उरो पैले को निकालने वाले रैफरी के रूप में पहचानें । पैले में देशप्रेम की भावना कूट-कूटकर भरी थी । इनका खेल देखकर इटली के एक क्लब ने इन्हें साल-नुार के लिए 25 लाख रुपये देने का प्र२त्ताव रखा । एक अल्लीयर्स क्लब ने तो इन्हें पेट्रोल और कोयले से पास एक जहाज देने का प्रलोभन भी दिखाया ।

        पैले ने 14 वर्षो तक अपने देश का नेतृत्व किया । अपने खेल जीवन में पैले ने 1959 में 126 गोल किये । 1969 को इन्होंने 1 हजार 131 गोल करके फुटबाल से संन्यास लेने की घोषणा की । इनकी इस घोषणा से ब्राजीलवासी फूट-फूटकर रो पड़े थे । इनके देश में तो फुटबाल की ऐसी दीवानगी है कि लोग हारने पर आत्महत्या तक कर लेते हैं और जीतने पर नाचते, गाते, हुडदंग, करते सड़क पर नजर आते हैं । फुटबाल तो वहा का राष्ट्रीय खेल है ।  बचपन से निर्धन पैले ने फुटबाल खेलकर अपार धन कमाया । इनके दीवाने प्रशंसकों ने इन्हें 1 लाख 12 हजार 500 का मुकुट 1970 में पहनाकर सम्मानित किया । इनके उपस्थित होने मात्र से ही ब्राजील की टीम ने 3 यार विश्व विजेता होने का गौरव हासिल किया ।

विचार :

• खेल कुछ ऐसा है जो युवाओं के लिए बेहद प्रेरणादायक है।
• ब्राज़ील फुटबॉल खाता, सोता और पीता है। यह फुटबॉल जीता है।
• बहुत से लोग सोचते हैं कि जो बहुत सारे गोल करता है, “वह एक महान खिलाड़ी है ” , क्योंकि गोल बहुत ज़रूरी है , लेकिन एक महान खिलाड़ी वो है जो मैदान में हर एक चीज कर सके।  वह साथी खिलाड़ियों की सहायता कर सके , उनका हौंसला बढ़ा सके , उनके अंदर आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दे सके।  वो कोई ऐसा होता है , जो टीम के अच्छा ना करने पर , उसका लीडर बन सके।
• हमेशा से मेरी एक फिलोसोफी रही है जो मुझे मेरे पिता से मिली थी।  वो कहा करते थे , सुनो।  भगवान ने तुम्हे फुटबॉल खेलने का उपहार दिया है। ये भगवान की तरफ से तुम्हारा गिफ्ट है , अगर तुम अपनी सेहत का ध्यान रखो , अगर तुम हमेशा अच्छे शेप में रहो , तो भगवान के उपहार के साथ कोई तुम्हे रोक नहीं पायेगा, लेकिन तुम्हे तैयार रहना होगा।
• पृथ्वी पर हर एक चीज एक खेल है। एक खत्म हो जाने वाली चीज। हम सभी एक दिन मर जाते हैं। हम सभी का एक ही अंत है , नहीं ?
• आपको लोगों का सम्मान करना चाहिए और शेप में रहने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए।  और मैं बहुत मेहनत से प्रशिक्षण लिया करता था।  जब बाकि खिलाड़ी ट्रेनिंग के बाद बीच पर चले जाया करते थे , तब भी मैं वहां बॉल किक किया करता था।
• उत्साह सबकुछ है। ये गिटार के तार की तरह कसा और वाइब्रेट करता हुआ होना चाहिए।
• मुझे नहीं लगता की मैं एक बहुत अच्छा बिजनेसमैन हूँ। मैं बहुत अधिक अपने दिल से काम करता हूँ
• अगर मैं एक दिन मर जाऊं तो मैं ख़ुशी से जाऊँगा क्योंकि मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश की।
• हमेशा से मेरी एक फिलोसोफी रही है जो मुझे मेरे पिता से मिली थी। वो कहा करते थे , सुनो। भगवान ने तुम्हे फुटबॉल खेलने का उपहार दिया है। ये भगवान की तरफ से तुम्हारा गिफ्ट है , अगर तुम अपनी सेहत का ध्यान रखो , अगर तुम हमेशा अच्छे शेप में रहो , तो भगवान के उपहार के साथ कोई तुम्हे रोक नहीं पायेगा, लेकिन तुम्हे तैयार रहना होगा।
• अभ्यास ही सबकुछ है।
• इसमें कोई शक नहीं कि मैंने कभी जितना पैसा फुटबॉल खेल के नहीं कमाया उससे अधिक विज्ञापन कर के कमा रहा हूँ।
• मैं कभी-कभी रात में लेटे-लेटे सोचता हूँ कि मैं अभी भी इतना प्रसिद्ध क्यों हूँ और ईमानदारी से कहूँ तो मूझे नहीं पता।
• मुझसे लगातार व्यक्ति विशेष के बारे में पूछा जाता है। जीतने का एक ही तरीका है टीम के रूप में जीतो। फुटबॉल एक दो या तीन स्टार खिलाडियों के बारे में नहीं है।

        “ब्लैक डायमण्ड” तथा ”फुटबाल किंग” के नाम से विभूषित किये जाने वाले पैले इतना धन, प्रसिद्धि पाकर भी अत्यन्त विनम्र, सहृदय व सहज हैं । विज्ञापनों, शराब तथा तम्बाकू सेवन से जीवन-भर दूर रहने वाले पैले ने जब संन्यास लिया, तो यूगोस्लोवाकिया के राष्ट्रपति टीटो ने इन्हें राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया ।


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iography : मुहम्मद अली जीवनी - Biography of Muhammad Ali in Hindi Jivani

 मुहम्मद अली पूर्व अमेरिकी पेशेवर मुक्केबाज थे,जिन्हें खेल इतिहास में दुनिया का सबसे बड़ा हेवीवेट मुक्केबाज कहा जाता है। अली 3 बार हेवीवेट चैम्पियन रहे हैं। उन्हें बीबीसी से स्पोर्ट्स पर्सनैलिटी ऑफ द सेंचुरी तथा स्पोर्ट्स इलस्ट्रेटेड द्वारा स्पोर्ट्समैन ऑफ द सेंचुरी का सम्मान मिल चुका है। अखाड़े में अली अपने फुटवर्क और मुक्के के लिए जाने जाते थे। अली तीन बार लेनियल चैंपियनशिप जीतने वाले इकलौते विश्व हैवीवेट चैंपियन हैं इन्होंने ये ख़िताब 1964, 1974, और 1978 में खिताब जीता।

        25 फरवरी, 1964, और 19 सितम्बर, 1964 के बीच, अली ने हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन के रूप में शासन किया। इन्हें "महानतम" उपनाम दिया गया। ये अनेक ऐतिहासिक बॉक्सिंग मैचों में शामिल रहे। इनमें से सबसे उल्लेखनीय "फाइट ऑफ़ द सेंचुरी (सदी की लड़ाई)", "सुपर फाइट 2 (सुपर लड़ाई द्वितीय)" और " थ्रिला इन मनीला (मनीला में रोमांच)" बनाम अपने प्रतिद्वंद्वी जो फ्रेज़ियर, " रंबल इन द जंगल" बनाम जॉर्ज फोरमैन आदि हैं। अली ने 1981 में मुक्केबाजी से संन्यास ले लिया.‍

आरंभिक जीवन :

        मुहम्मद अली का जन्म केतुंडी प्रान्त के लौइस्विले नामक स्थान पर 17 जनवरी 1942 में हुआ था | बचपन में उनका नाम मार्सीलस क्ले जूनियर था | मुक्केबाजी के इतिहास में महानतम मुक्केबाजो में Muhammad Ali  अली ने बचपन में ही अपनी निर्भीकता का परिचय देना शुरू कर दिया था | उनका लालन पालन देश के जिस दक्षिणी हिस्से में हुआ था वहा उन्हें अश्वेत होने के नाते नस्लीय भेदभाव का शिकार होना पड़ा था और उनके मन में मुक्केबाज बनने का संकल्प दृढ़ होता गया था |

        बारह साल की उम्र में मुहम्मद अली के साथ एक घटना घटी जिसकी वजह से उनका मुक्केबाज बनना निश्चित हो गया | उनकी साइकिल चोरी हो गयी और उन्होंने पुलिस अधिकारी जो मार्टिन को बताया कि वो वो छोर को घूंसा मारना चाहते है | मार्टिन ने उनसे कहा “किसी को लड़ने से पहले तुम्हे अच्छी तरह लड़ना सीखना होगा ” | पुलिस अधिकारी होने के साथ साथ मार्टिन स्थानीय जिम में लडको को मुक्केबाजी का प्रशिक्ष्ण देते थे , जहा अली भी मुक्केबाजी सीखने लगे. अली निजी जिन्दगी में आध्यात्मिक शान्ति की तलाश कर रहे थे | 1964 में उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और अपना नाम मुहम्मद अली रख लिया |

करियर :

        1954 में Muhammad Ali ने अपनी पहली लड़ाई लड़ी और उसमे जीत हासिल की। 1956 में उन्होंने light heavyweight division में Golden Gloves tournament में जीत  हासिल की। 1959 में उन्होंने  light-heavyweight division में National Golden Gloves Tournament of Champions और  Amateur Athletic Union’s national title में जीत हासिल की।

        1960 में उन्होंने ओलिंपिक खेलों में light-heavyweight division का स्वर्ण पदक जीता। 1971 में लड़ी गई fight of the century, Ali और Joe Frazier के बीच 8 मार्च, 1971 को हुई ये लड़ाई 15 round तक गई और कड़े संघर्ष के बाद Joe Frazier को इसमें विजेता घोषित किया गया और इस हार के साथ Muhammad Ali ने अपने boxing Career में पहली बार हार का सामना किया।

        कम IQ  के चलते अली को आर्मी से दो बार reject किया गया। हालाँकि बाद में आर्मी ने अली को fit घोषित कर दिया और उन्हें सेना में शामिल करने के लिए ड्राफ्ट तैयार किया लेकिन अब अली ने सेना में जाने से मना  कर दिया। उसी समय अमेरिका ने वियतनाम से युद्ध घोषित कर दिया और सेना ने अली को युद्ध में शामिल होने को कहा।

        अली ने यह कहकर मना कर दिया कि मेरी वियतनाम के लोगों से कोई लड़ाई नहीं है और ना ही किसी वियतनामी ने मेरे खिलाफ ख़राब शब्दों का इस्तमाल किया है। अली को सेना का ड्राफ्ट नहीं मानने के कारण 5 साल की सजा सुनाई गई और उन पर 10 हज़ार डॉलर का जुर्माना लगाया गया। बाद  में अपील करने पर supreme court ने इस सजा को गलत बताया, जिससे अली को 10 दिन ही जेल में रहना पड़ा।

        8 मार्च 1971 में न्यूयोर्क के एक रिंग में एक तरफ लगातार 26 मैच जीतने वाला जोसेफ विलियम फ्रेज़र था, वहीं दूसरी ओर दुनियाँ का सबसे अच्छा बॉक्सर और लगातार 31 मैच जीतने वाला मुहम्मद अली थे। मुक़ाबला स्टार्ट हुआ। उस समय लोगों के दिलों और जवां पर दो ही नाम थे, फ्रेज़र और अली। सबक़ों यकीन था, अली फ्रेज़र को हरा देगा। मैच पहला राउंड…. 14 वीं राउंड तक ठीक था, पर 15 वीं राउंड में फ्रेज़र ने दुनियाँ को चौकाते हुए हेवीवेट चैम्पियन को मात दे दिया। इस तरह 10 सालों तक अजेय रहे अली को पहली मात मिली।

रोम ओलंपिक :

        1960 में अली अमेरिका की बॉक्सिंग कोटे से रॉम ओलिम्पिक के लिए क्वालिफाई कर गए। जहां उन्होंने अपनी बॉक्सिंग की अलग ही रणनीति पेश की, जिसे देख दुनियाँ भोचक्की ही रह गई। अली ने अपनी तेज स्पीड और फेंसी कदमों से लगातार तीन बाउट्स जीतकर पोलेंड के बॉक्सर जिगनी पिटकोव्स्की को फ़ाइनल में हराकर गोल्ड मेडल पर अपनी मुहर लगाई। अब अली अमेरिका के हीरो बन चुके थे और उन्होंने प्रोफेसनल बॉक्सिंग जाने का निर्णय लिया।

        पर इसी समय उनके शहर लुईसविले के रेस्त्रा में उन पर किसी ने नस्ल भेदी टिप्पणी कर दिया, जिसके कारण वे गुस्से में आकर अपना गोल्ड मेडल ओहियो नदी में फेंक दिया। पर स्वभाव के जिद्दी अली ने प्रोफेशनल बॉक्सिंग का निर्णय नहीं बदला। और उन्होंने 1963 में अपने पहले ही प्रोफेशनल मुक़ाबले में ब्रिटिश हेवी वेट चैंपियन हेनरी कूपर को धूल चटाकर दुनियाँ को अपना दम दिखाया। 1964 में वे सोनी लिसन को हराकर पहली बार दुनियाँ का हेवी वेट चैंपियन बने। लोग उन्हें उनके जीत के लिए “The Greatest” कहते थे।


विचार :

• दोस्ती कुछ ऐसा नहीं है जो आप स्कूल में सीखते है। लेकिन यदि आपने दोस्ती का मतलब नहीं सीखा तो दरअसल आपने कुछ नहीं सीखा।
• दोस्ती कुछ ऐसा नहीं है जो आप स्कूल में सीखते है। लेकिन यदि आपने दोस्ती का मतलब नहीं सीखा तो दरअसल आपने कुछ नहीं सीखा।
• मुझे पता है मैं कहाँ जा रहा हूँ और मुझे सच पता है, और मुझे वो नहीं होना है जो तुम चाहते हो। मैं वो होने के लिए स्वतंत्र हूँ जो मैं चाहता हूँ।
• मैं सबसे महान हूँ, मैंने ये तब कहा जब मुझे पता भी नहीं था कि मैं हूँ।
• एक महान चैंपियन बन्ने के लिए आपको इस बात में यकीन करना होगा कि आप सर्वश्रेस्ठ हैं . अगर नहीं हैं तो होने का दिखावा करिये कि आप हैं .
• अपने सपनो को सच करने का सबसे अच्छा तरीका है जाग जाओ .
• बुद्धिमत्ता ये जानना है कि कब आप बुद्धिमान नहीं हो सकते .
• बिना डर के हम बहादुर नहीं हो सकते .
• इतिहास में सच्चे महान लोग कभी अपने लिए महान नहीं होना चाहते थे . वो बस इतना चाहते थे कि दूसरों का भला करें और ईश्वर के करीब हो जाएं .
• अब मैं स्वर्ण पदक जीत चुका था . लेकिन इसका कोई मतलब नहीं था क्योंकि मेरी त्वचा का रंग सही नहीं था .
• चैंपियंस जिम में नहीं बनाये जाते . चैंपियंस किसी ऐसी चीज से बनाये जाते हैं जो उनके भीतर कहीं होती है – एक इच्छा , एक सपना , एक विज़न . उनके पास कौशल और इच्छाशक्ति होनी चाहिए . लेकिन इच्छाशक्ति कौशल से ताकतवर होनी चाहिए .
• आप पहाड़ पर चढाई से नहीं थकते; जबकि जूते में पड़ा एक कंकड़ आपको थका देगा.
• आपको धरती पर रहने के किराये का चुकारा, दूसरों की सेवा के रूप में करना चाहिये.
• आप दिनों को मत गिनों, ऐसा कुछ करों लोग आपके दिनों को याद करें.
• जो आदमी 50 की उम्र में दुनिया को वैसे ही देखता है जैसे 20 की उम्र में देखता था तो उसने जिन्दगी 30 वर्ष बर्बाद ही किये.
• असंभव एक बड़ा शब्द मात्र है जो छोटे लोगों की देन है जो इस संसार में जिन्दगी को आराम से जीना चाहते है जबकि उनके पास दुनिया बदने की क्षमता है. असंभव शब्द तथ्यहीन है. यह एक राय मात्र है. असंभव कोई घोषित तथ्य नहीं है. यह हिम्मत का काम है. असंभव एक क्षमता का माप है. असंभव अस्थायी है. असंभव कुछ भी नहीं है.
• जीवन एक जुआ है. आपको चोट लग सकती है, बल्कि लोग हवाई जहाज दुर्घटना में मर भी जाते है, कार एक्सीडेंट में हाथ-पैर गवां देते हैं; लोग हर रोज मरते हैं. ऐसा ही फाइटर्स के साथ होता है, कुछ मर जाते हैं, कुछ के चोट लगती है, कुछ चल जाते है. मगर आप स्वयं यह मानकर कि ऐसा ही हमारे साथ होगा, मैदान मत छोड़ो.
• यह मात्र कार्य ही है. घास को उगना है, व पक्षियों को उड़ना है, हवा को घूल उड़ानी है. मुझे लोगों को बॉक्सिंग में हराना है.
• जिस व्यक्ति के पास कल्पना शक्ति नहीं है, उसके पास उड़ान के लिये पंख नहीं होते.
• जब आपको अच्छा जवाब नहीं सूझे तो खामोशी ही श्रेष्ठ है.


मृत्यु :

        1984 से ये पार्किंसन रोग से पीड़ित थे। इससे पहले पेशाब की नली में संक्रमण की शिकायत की वजह से दिसंबर 2014 में भी ये अस्पताल में भर्ती हुए थे. 2 जून 2016 को इन्हें साँस की समस्या के कारण अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। हालाँकि इनकी स्थिति को अच्छा बताया गया, पर इनकी हालात ख़राब होती चली गयी। इनकी मौत का कारण सेप्टिक शॉक को बताया गया। 3 जून 2016 को इन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

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Biography : द ग्रेट खली जीवनी - Biography of The Great Khali in Hindi Jivani

 द ग्रेट खली के नाम से जाने जाने वाले दलीप सिंह राणा हिमाचल के सिरमोर जिले के एक छोटे से गाँव घिरईना के रहने वाले है और  retired professional wrestler के तौर पर इन्हें लोग जानते है | khali अपने करियर को एक WWE में professional  wrestler के तौर पर अजमाने से पहले वो पंजाब पुलिस में एक अफसर के तौर पर काम किया करते थे | हालाँकि khali अब एक जाना पहचाना नाम है लेकिन यह सब यूँ ही नहीं हुआ इसके पीछे एक लम्बी संघर्ष भरी कहानी है तो चलिए इसे जानते है कि कैसे एक छोटे से गाँव से निकलकर खली ने अपनीय इ पहचान बनाई.

प्रारंभिक जीवन :

        जन्म August 27, 1972 को हुआ खली के पारिवारिक पृष्ठभूमी की बात करें तो खली के समेत कुल सात भाई बहन थे जिनमे से khali बचपन से अच्छे शरीर के साथ साथ सेहत भी शानदार थी और इसकी बदौलत ही वो परिवार में सबसे अलग दिखते थे | खली के पिता एक किसान थे जाहिर है किसान होने के नाते आमदनी केवल इतनी ही होती है कि वो बस अपने परिवार को पाल पाते |

        चूँकि पिता किसान थे इसलिए परिवार में बच्चो के बड़े होने के साथ साथ आर्थिक हालत अनुकूल नहीं थे इसलिए khali यानि दलीप को भी अपने दूसरे भाइयों के साथ मजदूरी का काम करना पड़ता था और वैसे शरीर फिट और दूसरे लोगो से अधिक क्षमता के कारण खली के लिए यह कोई मुश्किल काम तो नहीं था लेकिन फिर भी मजदूरी मजदूरी ही है और इन्हें शिमला में भी बहुत दिन मजदूरी का काम करना पड़ा |

        आज खली भले ही इंटरनेशनल स्तर पर ख्याति प्राप्त डब्ल्यूडब्ल्यूई स्टार हैं, लेकिन वे कभी 'रोड परियोजना' के लिए पत्थर तोड़ने का काम करते थे। खली के गांव धिराना की औरतें उन्हें भारी भरकम काम, जैसे जानवरों को उठाकर एक जगह से दूसरी जगह रखना, सामान उठवाना जैसे काम करवाती थीं। इसी दौरान खली पंजाब पुलिस में एएसआई (असिस्टेंट पुलिस सब इंस्पेक्टर) पद के लिए क्वालिफाइ किया।

        खेली के लिए उनके दोस्त अमित स्वामी काफी लकी हैं। खली अपने दोस्त अमित स्वामी के साथ दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर अपने पसंदीदा पहलवान डोरियन येट्स से मिलने गए। येट्स खली का डीलडौल देखकर बेहद प्रभावित हुए और उन्हें रेसलिंग में किस्मत आजमाने का सुझाव दिया। येट्स का यही सुझाव खली को जापान ले गया।

        इसके बाद खली ने ‌पीछे मुड़कर नहीं देखा और अमेरिका जाकर 'डब्ल्यूडब्ल्यूई' में अपना अलग मुकाम बनाया। दुनियाभर में मशहूर डब्ल्यूडब्ल्यूई योद्धा 'हल्क होगन' और 'द रॉक' के साथ काम करते हैं। 'डब्ल्यूडब्ल्यूई' कार्यक्रम वालों को राणा का नया नाम ढूढ़ने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी। किसी ने उन्हें 'जायंट सिंह' कहा तो किसी ने उन्हें 'भीम' नाम से संबोधित किया।

        खली का शरीर उनके साथ के उम्र के बच्चों से काफी अधिक बड़ा था. तथा उन्हें अपने पैर के साइज के जूते नहीं मिल पाते थे. और उन्हें जूते बनवाने के लिए अपने गांव से बाहर जाकर दूसरे मोची से बनवाने पड़ते थे. द ग्रेट खली बहुत अधिक ताकतवर थे. जिसके कारण गांव की महिलाएं किसी भी प्रकार का भारी भरकम काम खली से ही करवाया करती थी. और वह सब का काम किया करता था. द ग्रेट खली बड़े होने के बाद शिमला में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी की. और जब शिमला पर अपनी ड्यूटी कर रहे थे.

        और उसी वक्त पंजाब पुलिस के एक बड़े अफसर की नजर खली की ओर पड़ी. जिनका नाम एसएस भुल्लर था. और उन्होंने उसे पुलिस में नौकरी करने का ऑफर दिया और khali जब पंजाब आए तो उनका पूरा खर्च भुल्लर साहब ने उठाया. जब khali पंजाब पुलिस में नौकरी कर रहे थे. तब उनके एक दोस्त बने. जिनका नाम अमित स्वामी था. और उनसे दोस्ती करने के बाद उसकी किस्मत ही बदल गई. फिर वह दोनों एक साथ दिल्ली एयरपोर्ट गए.

        जहां उनके मनपसंद पहलवान डोरियन येट्स से उनकी मुलाकात हुई. और डूरियन येट्स ने जब खली का शरीर देखा. तो वह काफी प्रभावित हुए और उन्होंने खली को सुझाव दिया. कि वह रेसलिंग में अपना किस्मत आजमाएं. और उसके बाद से ही खली रेसलिंग में अपनी किस्मत आजमाने लगा. और बहुत ही जल्दी खली जापान चले गए और उसके बाद तो उनकी किस्मत ही बदल गई.

        अमेरिका के अटलांटा शहर में रहने वाले 'खली' डब्ल्यूडब्ल्यूई स्टार होने के अलावा हॉलीवुड अभिनेता भी हैं। वर्ष 2005 की हॉलीवुड फिल्म 'द लॉन्गेस्ट यार्ड', 'गेट स्मार्ट' , 'मैकग्रबर' जैसी फिल्मों में खली अभिनय कर चुके हैं। इसके साथ ही खली बॉलीवुड फिल्म 'कुश्ती' और 'रामा द सेवियर' में भी अपनी चमक बिखेर चुके हैं। अजगर से भी नहीं डरते आपको बता दें, 190 किलो वजन वाले खली भारत के जंगल में घूमते हैं और उन्हें अजगरों से डर नहीं लगता है। शाकाहार के प्रबल समर्थक खली तंबाकू और शराब से भी दूर रहते हैं।

        2006 में वर्ल्ड रेसलिंग से जुड़े ग्रेट खली उर्फ दलीप सिंह राणा ने साल 2006 में रेसलिंग की दुनिया डब्ल्यूडब्ल्यूई में कदम रखा था। 2 जनवरी 2006 को डब्ल्यूडब्ल्यूई में प्रवेश करने के बाद खली की पहली फाइट 7 अप्रैल 2006 को टीवी पर प्रसारित की गई थी। 7 फुट 3 इंच लंबे खली ने शुरुआती दौर में एक के बाद एक फाइट में अंडर टेकर सरीखे पहलवानों को पटखनी दी। 2008 में खली पूरी दुनिया में मशहूर हो गए। इंटरनेशनल लेवल पर नाम कमाने के बाद 2008 में ही खली पहली बार स्वदेश लौटे।

        उस दौरान खली ने भारत में भी काफी सुर्खियां बटोरी थी। ग्रेट खली ने 7 अक्टूबर, 2000 में WWE (वर्ल्ड रेसलिंग इंटरटेनमेंट) में डेब्यू किया। इस दौरान वे न्यू जापान प्रो रेसलिंग चैम्पियनशिप का खिताब जीतने वाले पहले भारतीय पहलवान बने। अंडरटेकर के करियर का सबसे खतरनाक मैच 2006 में अंडरटेकर के साथ रहा। इस फाइट के लिए ग्रेट खली ने अंडरटेकर को चैलेंज कर पीटा था। 2007-08 में खली ने वर्ल्ड हैविवेट चैम्पियनशिप का खिताब जीता। इस दौरान उन्होंने शॉन माइकल सहित कई पहलवानों को हराया।

        बाद में वह पेशेवर कुश्ती की आधुनिक कला सीखने के लिए विदश चले गए। वास्तव में हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय से स्नातक होने पर भी 100% प्लेसमेंट गारंटी नहिं मिलती। लेकिन फिर भी खली ने जोखिम लेने का फैसला किया और 'ऑल प्रो रेसलिंग बूट कैंप' नामक एक छोटे कुश्ती विद्यालय (एपीडब्ल्यू) में शामिल हो गए और विभिन्न प्रकार के स्लैम और तकनीकों को सीखना शुरू कर दिया, जो इस पर हावी करने के लिए उपयोगी थे।

         विरोधियों से उसके साथ एक बहुत ही अजीब घटना हुई जो उसके शक्तिशाली शक्ति के कारण 'उनके प्रतिद्वंद्वियों की कोई कुशलता या तकनीक नहीं थी, जहां उन्हें पकड़ने में सक्षम थे, उन्होंने अपने साथी छात्रों की पूरी सेना को लगभग नंगे हाथ से तबाह कर दिया और यहां तक कि स्वामी भी थे। अपने गुणों के साथ चकित ' 1996 के साल में उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में ऑल प्रो रेसलिंग के क्षेत्र में प्रवेश किया. जहां उन्होंने ऑल प्रो रेसलिंग में कई महान पहलवानों को घायल किया और पराजित किया। अपने पहले मैच के लिए उन्होंने टोनी जोन्स के साथ वेस्ट साइड प्लेज़ा में साथ मिलकर काम किया।

        कैलिफोर्निया के एपीडब्ल्यू में अपना प्रशिक्षण पूरा करने के बाद, खली एनजेपीडब्ल्यू (न्यू जापान प्रो रेसलिंग) में चले गए। अगस्त 2001 के दौरान ईस सिंह ने मसाहिरो चोंओ के द्वारा नए चरण में प्रवेश किया और विशालकाय सिल्वा के साथ एनजेपीडब्ल्यू के इतिहास में सबसे ज्यादा टैग टीम भागीदारों में से एक बनाकर 7.2 की अधिक ऊंचाई और 805 पौंड का संयुक्त टीम बनाई। यह संयोजन टोक्यो डोम में एक हस्तकला मैच के दौरान सबसे महत्वपूर्ण मैच में दोनों ने विशाल 4 कुस्तीकारों को हराया।

        अगले विश्व कुश्ती मनोरंजन (डब्ल्यूडब्ल्यूई) के ग्लैमर की ओर उनकी यात्रा हुई। 2005 के अंत के दौरान डब्ल्यूडब्ल्यूई का प्रबंधन जापान में कंपनी के प्रभाव को फैलाने की योजना बना रहा था और इसलिए डब्ल्यूडब्ल्यूईई के कई उच्च कार्यकारी योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जापान गए थे। जब उन्होंनेविशालकाय विशाल सिंह को देखा तो वे उन्हें अमेरिका ले जाने के लिए बहुत उत्सुक थे।

तथ्य :

• ग्रेट खली ने "बोलो" के रूप में अपनी भूमिका के लिए 2012 में फ्रांसीसी फिल्म सुर ला पिस्टे डु मार्सुपिल्मा में काम किया था।
• अन्य प्रसिद्ध पहलवानों के विपरीत, खली बहुत धार्मिक है। तो, वह मांस, शराब, ड्रग्स, कैफीन, तंबाकू का उपभोग नहीं करता।
• नाम "द ग्रेट खली" हिंदू देवी काली से ली गई है जो शाश्वत ऊर्जा से जुड़ा हुआ है।
• खली ने 7 अक्टूबर, 2000 नाम विशाल सिंह के तहत पेशेवर कुश्ती में अपना पहला प्रदर्शन किया।
• उनके माता-पिता यानी दलिप सिंह (या खली) के विपरीत सामान्य आकार के हैं। लेकिन, खली के दादा 6 फुट 6 इंच लंबे थे।
• खली के 6 भाई हैं। उनके पिता का नाम ज्वाला राम है और मां का नाम तांदी देवी है।
• 7 अप्रैल, 2006 को अंडरटेकर को पिटाई करके उन्होंने स्मैकडाउन में शुरुआत की
• खली ने 1 99 7 और 1 99 1 में बॉडीबिल्डिंग Mr. India खिताब जीता था।
• पेशेवर कुश्ती में प्रवेश करने से पहले, दलीप सिंह पंजाब राज्य पुलिस में पुलिस अधिकारी थे।
• 2012 तक, उन्होंने 4 हॉलीवुड फिल्मों, 2 बॉलीवुड फिल्मों और 1 फ्रांसीसी फिल्म में अभिनय किया है।
• 28 मई, 2001 को, ब्रायन ओन्ग की खली से एक फ्लैपजैक प्राप्त करने के बाद मृत्यु हो गई।
• 26 जुलाई, 2012 को, खली ने अपनी पिट्यूटरी ग्रंथि पर ट्यूमर के कारण मस्तिष्क की सर्जरी की।

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