Biography (hindi)
एलन रीव मस्क एक दक्षिण अफ्रीकी-कनाडाई-अमेरिकी दिग्गज व्यापारी, निवेशक, इंजीनियर, और आविष्कारक है। एलन स्पेसएक्स के संस्थापक, सीईओ और मुख्य डिजाइनर; टेस्ला कंपनी के सह-संस्थापक, सीईओ और उत्पाद के वास्तुकार; ओपनएआई के सह-अध्यक्ष; न्यूरालिंक के संस्थापक और सीईओ और द बोरिंग कंपनी के संस्थापक हैं। इसके अलावा वे सोलरसिटी के सह-संस्थापक और पूर्व अध्यक्ष, ज़िप2 के सह-संस्थापक और एक्स.कॉम के संस्थापक हैं, जोकि बाद में कॉन्फ़िनिटी के साथ विलय हो गया और उसे नया नाम पेपैल मिला।
दिसंबर 2016 में, एलन को फ़ोर्ब्स पत्रिका की दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोगों की सूची में 21वाँ स्थान प्राप्त हुआ। जनवरी 2018 तक, एलन की कुल संपत्ति 20.9 अरब अमेरिकी डॉलर है, और फोर्ब्स द्वारा दुनिया के 53वें सबसे अमीर व्यक्ति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
एलन ने कहा है कि सोलरसिटी, टेस्ला और स्पेसएक्स का लक्ष्य, विश्व और मानवता को बदलने के लिए उनके दृष्टिकोण के चारों ओर घूमता हैं। उनके लक्ष्यों में संधारणीय ऊर्जा उत्पादन और उपयोग के माध्यम से भूमंडलीय ऊष्मीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) को कम करना और मंगल ग्रह पर मानव बस्ती की स्थापना के द्वारा "मानव विलुप्त होने के खतरे" को कम करना शामिल है।
जन्म 28 जून 1971 को साउथ अफ्रीका के प्रिटोरिया सहर में हुआ था उनके पिताजी एक इंजिनियर और माँ एक मॉडल थी जब एलोन 9 साल के थे तब इनके माता-पिता तलाक लेकर अलग हो गये और एलन अपने पिता के साथ प्रिटोरिया में रहने लगे उनके 2 छोटे भाई बहिन भी थे जिनपर उनके पिता बिलकुल भी ध्यान नहीं देते थे
एलोन बचपन से ही शर्मीले और किताबो में घुसे रहने वाले लड़के थे और १० साल की आयु तक उन्होंने ऐसी किताबे पढ़ ली थी जो कॉलेज स्टूडेंट भी नहीं पढ़ते थे और 12 साल की उम्र में एलोन ने अपने घर पर ही रखे कंप्यूटर पर कुछ बुक्स की मदद से कंप्यूटर प्रोग्रामिंग सीखकर लास्ट r गेम ड़ेवेलोप कर लिया
बेसिक लैंग्वेज में बने इस विडियो गेम को ड़ेवेलोप कर लिया और उन्होंने इस गेम को 500 डॉलर में एक कंपनी को बेच दिया उन्होंने अपने स्कूल की फीस इन्ही पैसो से भरी स्कूल में फीस तो भर दी लेकिन स्कूल में कुछ बदमास बच्चे उनसे मार पिट करते थे एक बार उन बदमास बचू ने मिलकर एलोन को इतना मार की वो बेहोश हो गए
और इसके बाद उन्होंने एलोन को सीढियों से निचे फेक दिया उन्हें होस्पिटल में एडमिट करवाया गया और काफी दिनों बाद उनकी यादास्त आई इस घटना के बाद एलोन को आज भी सांस लेने में तकलीफ होती है जैसे-तैसे 17 साल की उम्र में साउथ अफ्रीका से ओने हाई स्कूल की पढाई पूरी कर ली
करिअर
1988 में वो कनाडा चले गए और एक अमेरिकन नागरिक बन गए। फिलहाल वो टेस्ला मोटर्स, सोलर सिटी के सीईओ और मुख्य उत्पाद के शिल्पकार है साथ ही वो स्पेस एक्स के भी सीईओ और सीटीओ है।
फाल्कन हैवी राकेट की डिजाईन में और उसे बनाने में इलोन मस्क का बहुत ही बड़ा योगदान है, इसी वजह से अधिकतर लोग उन्हें फाल्कन राकेट के लिए भी जानते है।
इलोन मस्क और उनके भाई ने मिलकर सन 1995 में ज़िप2 नाम की एक सॉफ्टवेयर कंपनी खोल दी थी। लेकिन 1999 में उन्होंने इस कंपनी को बेच दिया और करोड़पति गए। उसके बाद में उन्होंने एक्स डॉट कॉम नाम की कंपनी खोली लेकिन कुछ समय के बाद ही उन्होंने इसे कांफिनिटी कंपनी के साथ में जोड़ दिया और जब यह दोनों कंपनिया साथ में मिल गयी तो उनमेसे पेपाल नाम की नयी कंपनी बनायीं गयी।
एक्स डॉट कॉम को ही आगे चलकर पेपाल नाम दिया गया और नाम देने के बाद इलोन मस्क ने इस कंपनी को ओर बड़ा करने पर जोर दिया। उसके बाद में उन्होंने स्पेसएक्स कंपनी खोली और टेस्ला के सीईओ बन गए।
मगर वहापर पहुचने पर केवल दो दिन के बाद ही उन्हें इस कोर्स को छोड़ना पड़ा क्यों की वो इन्टरनेट, नविकरनिय उर्जा और अवकाश के क्षेत्र में बिज़नस करना चाहते थे। वो 2002 में अमेरिका के नागरिक बन गए।
इलोन मस्क ने बचपने से ही अविश्वसनीय काम करने शुरू कर दिए थे। उनका इस तरह के अद्भुत काम करने का दौर आगे भी चलता रहा। उनके कई सारे कार्य में एक फाल्कन राकेट को लेकर है। इस राकेट की डिजाईन बनाने का काम खुद इलोन मस्क ने ही किया है और साथ ही इस बड़ी मुहीम को कामयाब बनाने में सबसे अधिक योगदान उनका ही रहा है।
इंस्पायरिंग थॉट्स
o यहाँ फेलियर एक विकल्प है. अगर चीजें फेल नहीं हो रहे हैं, तो आप उतना इनोवेट नहीं कर रहे
o अगर कुछ बेहद ज़रूरी है, तो भले चीजें आपके खिलाफ हों, फिर भी आपको वो करना चाहिए.
o पे-पाल से जाते वक़्त, मैंने सोचा: ‘ अच्छा! और कौन सी समस्याएं हैं जिनकी मानवता के भविष्य को प्रभावित करने की सबसे अधिक सम्भावना है?’ मैंने इस नज़रिए से नहीं सोचा कि, ‘पैसा बनाने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
o पहला कदम ये स्थित करना है कि कोई चीज संभव है; उसके संभावना घटित होगी
o आप जो सबसे अच्छी चीज बना सकते हैं उसे बनाने को लेकर अधिक कठोर होना चाहते हैं. उसमे वो हर एक चीज खोजिये जो गलत है और उसे ठीक करिए. नेगटिव फीडबैक लीजिये, खासकर मित्रों से.
o एक ही टोकरी में सारे अंडे रखना ठीक है जब तक की आप ये कंट्रोल कर सकें कि टोकरी का क्या होता है.
o दृढ़ता बहुत ज़रूरी है. आपको तब तक हार नहीं माननी चाहिए जबतक की आपको हार मानने के लिए मजबूर ना किया जाए.
o बिजनेस शुरू करना और उसे ग्रो करना उतना ही उसे करने वाले लोगों की इन्नोवेशन, ड्राइव और डिटरर्मिनेशन के बारे में है जितना कि जो वो प्रोडक्ट बेचते हैं उसके बारे में है.
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Read more: एलन मस्क जीवनी - Biography of Elon Musk in Hindi Jivani Published By : Jivani.org
नाम :– जिद्दू कृष्णमूर्ति।
जन्म :– 12 मई, 1895, तमिलनाडु।
पिता : ।
माता : ।
पत्नी/पति :– ।
प्रारम्भिक जीवन :
जे. कृष्णमूर्ति का जन्म तमिलनाडु के एक छोटे-से नगर में निर्धन ब्राह्मण परिवार में 12 मई, 1895 को हुआ था। अपने माता-पिता की आठवीं संतान के रूप में उनका जन्म हुआ था इसीलिए उनका नाम कृष्णमूर्ति रखा गया। कृष्ण भी वासुदेव की आठवीं संतान थे। इनके पिता 'जिद्दू नारायनिया' ब्रिटिश प्रशासन में सरकारी कर्मचारी थे। जब कृष्णमूर्ति केवल दस साल के ही थे, तभी इनकी माता 'संजीवामा' का निधन हो गया। बचपन से ही इनमें कुछ असाधारणता थी।
थियोसोफ़िकल सोसाइटी के सदस्य पहले ही किसी विश्वगुरु के आगमन की भविष्यवाणी कर चुके थे। श्रीमती एनी बेसेंट और थियोसोफ़िकल सोसाइटी के प्रमुखों को जे. कृष्णमूर्ति में वह विशिष्ट लक्षण दिखाई दिये, जो कि एक विश्वगुरु में होते हैं। एनी बेसेंट ने जे. कृष्णमूर्ति की किशोरावस्था में ही उन्हें गोद ले लिया और उनकी परवरिश पूर्णतया धर्म और आध्यात्म से ओत-प्रोत वातावरण में हुई।
विचार :
कृष्णमूर्ति के विचारों के जन्म को उसी तरह माना जाता है जिस तरह की एटम बम का अविष्कार के होने को। कृष्णमूर्ति अनेकों बुद्धिजीवियों के लिए रहस्यमय व्यक्ति तो थे ही साथ ही उनके कारण विश्व में जो बौद्धिक विस्फोट हुआ है उसने अनेकों विचारकों, साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों को अपनी जद में ले लिया। उनके बाद विचारों का अंत होता है। उनके बाद सिर्फ विस्तार की ही बातें हैं। 1927 में एनी बेसेंट ने उन्हें 'विश्व गुरु' घोषित किया। किन्तु दो वर्ष बाद ही कृष्णमूर्ति ने थियोसोफ़िकल विचारधारा से नाता तोड़कर अपने नये दृष्टिकोण का प्रतिपादन आरम्भ कर दिया।
अब उन्होंने अपने स्वतंत्र विचार देने शुरू कर दिये। उनका कहना था कि व्यक्तित्व के पूर्ण रूपान्तरण से ही विश्व से संघर्ष और पीड़ा को मिटाया जा सकता है। हम अन्दर से अतीत का बोझ और भविष्य का भय हटा दें और अपने मस्तिष्क को मुक्त रखें। उन्होंने 'आर्डर ऑफ़ द स्टार' को भंग करते हुए कहा कि 'अब से कृपा करके याद रखें कि मेरा कोई शिष्य नहीं हैं, क्योंकि गुरु तो सच को दबाते हैं। सच तो स्वयं तुम्हारे भीतर है।...सच को ढूँढने के लिए मनुष्य को सभी बंधनों से स्वतंत्र होना आवश्यक है।'
उन्होंने सत्य के मित्र और प्रेमी की भूमिका निभायी लेकिन स्वयं को कभी भी गुरू के रूप में नहीं रखा। उन्होंने जो भी कहा वह उनकी अन्तर्दृष्टि का संप्रेषण था। उन्होनंे दर्शनशास्त्र की किसी नई पद्धति या प्रणाली की व्याख्या नहीं की, बल्कि मनुष्य की रोज़मर्रा की जिन्दगी से ही - भ्रष्ट और हिंसापूर्ण समाज की चुनौतियों, मनुष्य की सुरक्षा और सुख की खोज, भय, दुख, क्रोध जैसे विषयों पर कहा। बारीकी से मानव मन की गुत्थियों को सुलझा कर लोगों के सामने रखा।
दैनिक जीवन में ध्यान के यथार्थ स्वरूप, धार्मिकता की महत्ता के बारे में बताया। उन्होनंे विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में उस आमूलचूल परिवर्तन की बात कही जिससे मानवता की वास्तविक प्रगति की ओर उन्मुख हुआ जा सके।
अपने कार्य के बारे में उन्होंने कहा ”यहां किसी विश्वास की कोई मांग या अपेक्षा नहीं है, यहां अनुयायी नहीं है, पंथ संप्रदाय नहीं है, व किसी भी दिशा में उन्मुख करने के लिए किसी तरह का फुसलाना प्रेरित करना नहीं है, और इसलिए हम एक ही तल पर, एक ही आधार पर और एक ही स्तर पर मिल पाते हैं, क्योंकि तभी हम सब एक साथ मिलकर मानव जीवन के अद्भुत घटनाक्रम का अवलोकन कर सकते हैं।”
१९८६ में ९० वर्ष की आयु में कृष्णमूर्ति की मृत्यु हुई, मेरी लट्यंस द्वारालिखित उनकी वृहदाकार जीवनी के दो खंड 'थे यिअर्ज़ अॉफ अवेकनिंग, (१९७५) तथा 'द यीअर्ज अॉफ फुलफिलमेंट' (१९८३) प्रकाशित हो चुके थे। तीसरा खंड 'द ओपन डोर' १९८८ में प्रकाशित हुआ। इन तीनों खण्डों को मेरी लटयंस ने 'द लाइफ एंड डेथ अॉफ जे.कृष्णमूर्ति' नाम से एक पुस्तक में समेटा है।
कृष्णमूर्ति की शिक्षाओ को समझने के लिए उनके जीवन की, उनके मृत्यु की विशदता को जानना-समझना महत्वपूर्ण है। “शिक्षा का सबसे बड़ा कार्य एक ऐसे समग्र व्यक्ति का विकास है जो जीवन की समग्रता को पहचान सके। आदर्शवादी और विशेषज्ञ दोनों ही समग्र से नहीं खण्ड से जुड़े हुए होते हैं। जब तक हम किसी एक ही प्रकार की कार्यप्रणाली का आग्रह नहीं छोड़ते तब तक समग्रता का बोध सम्भव नहीं है।”
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