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Biography (hindi)

बिपिनचंद्र पाल जीवनी - Biography of Bipin Chandra Pal in Hindi Jivani Published By : Jivani.org

नाम : बिपीनचंद्र रामचंद्र पाल।
जन्म : 7 नवंबर 1858।
पिता : रामचंद्र।
माता : नारायनीदेवी।
विवाह : पहली पत्नी की मौत होने के बाद विधवा के साथ पुनर्विवा।

        बिपिन चंद्र पाल एक भारतीय क्रांतिकारी, शिक्षक, पत्रकार व लेखक थे। पाल उन महान विभूतियों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की बुनियाद तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई। वे मशहूर लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक एवं विपिनचन्द्र पाल) तिकड़ी का हिस्सा थे। इस तिकड़ी ने अपने तीखे प्रहार से अंग्रेजी हुकुमत की चूलें हिला दी थी। विपिनचंद्र पाल राष्ट्रवादी नेता होने के साथ-साथ एक शिक्षक, पत्रकार, लेखक व बेहतरीन वक्ता भी थे। उन्हें भारत में क्रांतिकारी विचारों का जनक भी माना जाता है।

आरंभीक जीवन:

        16 साल की उम्र मे बिपिनचंद्र ने ब्राम्हण समाज मे प्रवेश किया. 1876 मे शिवनाथ शास्त्रीने पाल इनको ब्राम्हण समाज की दिक्षा दी. मूरत पूजा न मानने वाले ब्राम्हण समाज के अनुयायी होना मतलब आधा ख्रिश्चन होना ऐसा पुराने विचारों के लोगों का मानना था. ये सब रामचंद्र पाल इनको मालूम हुवा तब उनको बहोत गुस्सा आया. उन्होंने बेटे के साथ नाता तोड दिया. ब्राम्हण समाज के काम वो बहोत निष्टा से करते थे। कटक, म्हैसुर और सिल्हेट इस जगह उन्होंने शिक्षक की नोकरी की थी. भारतीय समाज की प्रगती शिक्षा की वजह से होंगी, ऐसा उनका मानना था।

        1880 मे बिपिनचंद्रने सिल्हेट इस जगह ‘परिदर्शक’ इस नाम का बंगाली साप्ताहिक प्रकाशीत किया, वैसे ही कोलकता आने के बाद उनको वहा के ‘बंगाल पब्लिक ओपिनियन’ के संपादक मंडल मे लिया गया. 1887 में बिपिनचंद्र ने राष्ट्रीय कॉग्रेस के मद्रास अधिवेशन मे पहली बार हिस्सा लिया. ‘शस्त्रबंदी कानुन के खिलाफ’ उस जगह का भाषण उत्तेजनापूर्ण और प्रेरक रहा। 1887 – 88 में उन्होंने लाहोर के ‘ट्रिब्युन’ का संपादन किया।

        1900 मे बिपिनचंद्र पाल पाश्चात्त्य और भारतीय तत्वज्ञान का तुलनात्मक अभ्यास करने के लिये इंग्लंड गये. वहा के भारतीयो के लिये ‘स्वराज्य’ नाम का मासीक उन्होंने निकाला। 1905 मे इंग्लंड से कोलकता आने के बाद वो ‘न्यु इंडिया’ नामका अंग्रेजी साप्ताहिक चलाने लगे। 1905 मे गव्हर्नर जनरल लॉर्ड कर्झन ने बंगाल का विभाजन किया. लोकमान्य तिलक , लाला लाजपत राय जहाल नेताओ के साथ उन्होंने इस विभाजन का विरोध किया. देश मे जागृती कि. ब्रिटिश सरकार के खिलाफ पुरे देश मे आंदोलन शुरु हुये. उस मे से भारतीय राजकारण में लाल – बाल – पाल इन त्रिमूर्तीओं का उदय हुवा।

राजनैतिक जीवन :

        सन 1886 में वे कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। सन 1887 में कांग्रेस के मद्रास सत्र में उन्होंने अंग्रेजी सरकार द्वारा लागू किये गए ‘शस्त्र अधिनियम’ तत्काल हटाने की मांग की क्योंकि यह अधिनियम भेदभावपूर्ण था। वे मशहूर लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक एवं विपिनचन्द्र पाल) तिकड़ी का हिस्सा थे। इन तीनों ने क्रांतिकारी भावनाओं को हवा दी और खुद भी क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। पाल और अरविंदो घोष ने एक ऐसे राष्ट्रवाद का प्रवर्तन किया जिसके आदर्श थे पूर्ण स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा।

        पाल ने क्रांतिकारी पत्रिका ‘बन्दे मातरम’ की स्थापना भी की थी। तिलक की गरफ्तारी और स्वदेशी आन्दोलन के बाद अंग्रेजों की दमनकारी निति के बाद वे इंग्लैंड चले गए। वहाँ जाकर वे क्रान्तिकारी विधार धारा वाले ‘इंडिया हाउस’ (जिसकी स्थापना श्यामजी कृष्ण वर्मा ने की थी) से जुड़ गए और ‘स्वराज’ पत्रिका  का प्रकाशन प्रारंभ किया। जब क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा ने सन 1909 में कर्ज़न वाइली की हत्या कर दी तब ‘स्वराज’ का प्रकाशन बंद कर दिया गया और लंदन में उन्हें बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस घटना के बाद बिपिन चन्द्र पाल ने अपने आप को उग्र विचारधारा से अलग कर लिया।

        लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक एवं विपिनचन्द्र पाल (लाल-बाल-पाल) की इस तिकड़ी ने 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन किया जिसे बड़े पैमाने पर जनता का समर्थन मिला। 'गरम' विचारों के लिए मशहूर इन नेताओं ने अपनी बात तत्कालीन विदेशी शासक तक पहुँचाने के लिए कई ऐसे तरीके इजाद किए जो एकदम नए थे। इन तरीकों में ब्रिटेन में तैयार उत्पादों का बहिष्कार, मैनचेस्टर की मिलों में बने कपड़ों से परहेज, औद्योगिक तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में हड़ताल आदि शामिल हैं।

        उन्होंने महसूस किया कि विदेशी उत्पादों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हो रही है और यहाँ के लोगों का काम भी छिन रहा है। उन्होंने अपने आंदोलन में इस विचार को भी सामने रखा। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान 'गरम धड़े' के अभ्युदय को महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे आंदोलन को एक नई दिशा मिली और इससे लोगों के बीच जागरुकता बढ़ी।

        1905 में बंग-भंग के समय कई सभाओं को सम्बोधित किया । विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते हुए तीव्र आन्दोलन चलाया । 1907 में वन्देमातरम् पत्र के माध्यम से अंग्रेज विरोधी जनमत तैयार करने पर उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाकर जेल में ठूंस दिया गया । रिहा होते ही अपना आन्दोलन और तेज कर दिया । 1908 में इंग्लैण्ड से स्वराज्य पत्रिका निकाली । इस पर प्रतिबन्ध लगने पर वे भारत लौट आये । यहां हिन्दू रिव्यू पत्र प्रारम्भ किया । वे ब्रिटिश सरकार के सामने गिड़गिड़ाने में विश्वास नहीं रखते थे । उनके क्रान्तिकारी विचारों से बंगाल की पीढ़ी उनके साथ हो ली थी । ऐसे क्रान्तिकारी का देहावसान 1932 में हुआ।

        'वंदे मातरम्' पत्रिका के संस्थापक रहे पाल एक बड़े समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने परिवार के विरोध के बावज़ूद एक विधवा से शादी की। बाल गंगाधर तिलक की गिरफ़्तारी और 1907 में ब्रितानिया हुकूमत द्वारा चलाए गए दमन के समय पाल इंग्लैंण्ड गए। वह वहाँ क्रान्तिकारी विधार धारा वाले 'इंडिया हाउस' से जुड़ गए और 'स्वराज पत्रिका' की शुरुआत की। मदन लाल ढींगरा के द्वारा 1909 में कर्ज़न वाइली की हत्या कर दिये जाने के कारण उनकी इस पत्रिका का प्रकाशन बंद हो गया और लंदन में उन्हें काफ़ी मानसिक तनाव से गुज़रना पड़ा। इस घटना के बाद वह उग्र विचारधारा से अलग हो गए और स्वतंत्र देशों के संघ की परिकल्पना पेश की। पाल ने कई मौक़ों पर महात्मा गांधी की आलोचना भी की।

विचार :

        श्री विपिनचन्द्र पाल उग्रवादी राष्ट्रीयता के प्रबल पक्षधर थे । 1907 में जब अरविन्द पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें गवाही के लिए बुलाया गया, तो उन्होंने इनकार करते हुए 6 मास का कारावास भोग लिया । निर्भीकता उनके विचारों की शक्ति थी । वे कहते थे- ”दासता मानवीय आत्मा के विरुद्ध है । ईश्वर ने सभी प्राणियों को स्वतन्त्र बनाया है ।”

        वे स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर बल देते थे । प्राचीन भारतीय गौरव के समर्थक थे । ब्रह्म समाज के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने भी विधवा विवाह का समर्थन किया । स्वयं एक बाल विधवा से विवाह कर एक आदर्श प्रस्तुत किया । वे जाति, वर्ग, धर्म, सम्प्रदाय से विहीन समाज की कल्पना करते थे, जो समस्त नागरिकों को समान अधिकार व सुविधाएं प्रदान करे ।

        उन्होंने महसूस किया कि विदेशी उत्पादों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हो रही है और यहाँ तक कि लोगों का काम-काज भी छिन रहा है, अतः अपने आंदोलन में उन्होंने इस विचार को भी सामने रखा। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ‘गरम धड़े’ के अभ्युदय को महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे आंदोलन को एक नई दिशा मिली और भारतीय जनमानस में जागरूकता बढ़ी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महर्षि अरविंद के खिलाफ गवाही देने से इनकार करने पर बिपिनचंद्र पाल को छह महीने की सजा हुई। जीवन भर राष्ट्र-हित के लिए काम करनेवाले बिपिनचंद्र पाल 20 मई, 1932 को भारत माँ के चरणों में अपना सर्वस्व त्यागकर परलोक सिधार गए।

लेखन:

• परिदर्शक 1880
• Bengal Public Opinion 1882
• Tribune in Lahore 1887
• The New India 1892
• The Independent ,
• India 1901
• बन्देमातरम 1906, 1907
• स्वराज 1908 -1911,
• The Hindu Review 1913
• The Democrat 1919, 1920,
• Bengali 1924, 1925

मृत्यु:

        20 मई 1932 को इस महान क्रन्तिकारी का कोलकाता में निधन हो गया। वे लगभग 1922 के आस-पास राजनीति से अलग हो गए थे और अपनी मृत्यु तक अलग ही रहे।

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बिल गेट्स जीवनी - Biography of Bill Gates in Hindi Jivani Published By : Jivani.org

नाम : विलियम हेनरी गेट्स 
जन्म : 28 अक्टूबर 1955 सीऐटल, वाशिंगटन
पिता : विलियम एच. गेट्स
माता : मैरी मैक्सवेल गेट्स
पत्नी : मेलिण्डा गेट्स

        पर्सनल कंप्यूटर की क्रांति में गेट्स एक जाने-माने और बहुप्रचलित उद्योगपति है. उनके व्यापर संबंधी नियमो की वजह से कई बार उनकी आलोचनाएं भी की गयी, बल्कि कई बार तो मार्केट नियमो के विरुद्ध जाने पर उनपर क़ानूनी करवाई भी की गयी थी. लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने अपने करियर को बहोत मजबूत और विश्वप्रसिद्ध बनाया, उन्होंने अपने सॉफ्टवेयर प्रोग्राम से कई विश्व रिकॉर्ड कायम किये और बहोत सी समाजसेवी संस्थाओ को बहोत बड़ा दान भी दिया. उन्होंने गेट्स और मेलिंडा द्वारा 2000 में स्थापित साइंटिफिक रिसर्च सेंटर को भी अपनी संपत्ति का कुछ भाग दान स्वरुप दिया.

आरंभिक जीवन :

        गेट्स का जन्म सिएटल, वॉशिंगटन में, विलियम एच। गेट्स, सीनियर और मरी मैक्सवेल गेट्स के यहाँ हुआ। उनका परिवार धनी था, उनके पिता एक प्रमुख वकील थे, उनकी माँ प्रथम इंटरस्टेट बैंक सिस्टम और यूनाइटेड वे के निदेशक मंडल मे सेवारत थीं और उनकी पिता, जे. डब्ल्यू. मैक्सवेल, एक राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष थे। गेट्स की एक बड़ी बहन, क्रिस्टी (क्रिस्तिंने) और एक छोटी बहन, लिब्बी है। वे अपने परिवार में सम नाम के चौथे व्यक्ति थे, लेकिन विलियम गेट्स I या "ट्रे" के नाम से जाने जाते थे क्योंकि उनके पिता ने अपने नामांत में I जोड़ना छोड़ दिया था। उनके जीवन के प्रारंभिक काल में उनके माता पिता के मन में उनके लिए कानून का कैरियर था।

        उनके माता – पिता उनके लिए क़ानून में करियर बनाने का स्वप्न लेकर बैठे थे परन्तु उन्हें बचपन से ही कंप्यूटर विज्ञान तथा उसकी प्रोग्रामिंग भाषाओं में रूचि थी | उनकी प्रारंभिक शिक्षा लेकसाइड स्कूल में हुई | जब वह आठवीं कक्षा के छात्र थे तब उनके विद्यालय ने  ऐएसआर – 33 दूरटंकण टर्मिनल तथा जनरल इलेक्ट्रिक कंप्यूटर पर एक कंप्यूटर प्रोग्राम खरीदा जिसमें गेट्स ने रूचि दिखाई | तत्पश्चात मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला कंप्यूटर प्रोग्राम लिखा जिसका नाम “टिक-टैक-टो”तथा इसका प्रयोग कंप्यूटर से खेल खेलने हेतु किया जाता था | बिल गेट्स इस मशीन से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा जानने को उत्सुक थे कि यह सॉफटवेअर कोडस किस प्रकार कार्य करते हैं |

        मात्र 17 वर्ष कि उम्र में उन्होंने अपने मित्र एलन के साथ मिलकर ट्राफ़- ओ- डाटा नामक एक उपक्रम बनाया जो इंटेल 8008 प्रोसेसर पर आधारित  यातायात काउनटर (Traffic Counter) बनाने के लिए प्रयोग में लाया गया | उसके पश्चात उन्होंने चिप बनाया तथा यह उस समय का व्यक्तिगत कंप्यूटर (Personal Computer) के अन्दर चलने वाला सबसे वहनयोग्य चिप था, जिसके पश्चात बिल गेट्स को यह एहसास हुआ कि समय द्वारा दिया गया यह सबसे उत्तम अवसर है जब उन्हें अपनी स्वयं कि कंपनी का आरम्भ करना चाहिए |

        गेट्स की शादी फ्रांसीसी मेलिंडा (Melinda French) के साथ डलास, टेक्सास में जून 1, 1994 को हुआ उनके तीन बच्चे हैं: जेनिफर कैथेराइन गेट्स (1996), रोरी जॉन गेट्स (1999) एवं फोएबे अदेले गेट्स (2002). बिल गेट्स का घर|बिल गेट्स का घर लेक वॉशिंगटन (Lake Washington) की ओर झांकती हुई, एक पहाड़ी के पास धरती पर आश्रय|जो मेडीना (Medina), वॉशिंगटनमें है,21 वीं सदी की एक भू आश्रित मकान है।

        (earth-sheltered home)(Bill Gates' house)किंग काउंटी (King County) के अनुसार वर्ष 2006 में, इस संपत्ति (जमीन और घर) का सार्वजनिक मूल्यांकन $1250 लाख, और वार्षिक संपत्ति कर $991हज़ार है। इसके अलावे गेट्स के निजी संग्रह में है लियोनार्दो दा विन्ची द्वारा लिखित कोडेक्स लेस्टर (Codex Leicester), जो गेट्स ने वर्ष 1994 की एक नीलामी में $308 लाख में खरीदा था। गेट्स एक गहरा अध्यनकारी के रूप में भी जाने जाते हैं और उनके घर की विशाल पुस्तकालय के छत में, महान गाट्स्बी (The Great Gatsby) का एक उद्धरण खुदाई किया हुआ है।

मायक्रोसॉफट:

        1975 में, गेट्स और पॉल एलन के साथ मिलकर माइक्रोसॉफ्ट की स्थापना की, जो बाद में विश्व की सबसे बड़ी PC सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी बनी. माइक्रोसॉफ्ट में उनके करियर के दौरान, गेट्स ने कंपनी के अध्यक्ष, सीईओ और मुख्य सॉफ्टवेयर निर्माता का पद ग्रहण कर रखा था और मई 2014 तक वे विश्व के सबसे बड़े वैयक्तिक शेयरहोल्डर बने रहे. गेट्स बहोत सी किताबो के रचयिता और सह-रचयिता भी है.

        1987 की शुरुवात में ही, बिल गेट्स को विश्व में सर्वाधिक संपत्ति वाले लोगो की सूचि में भी शामिल किया गया और 2007-08 की आर्थिक मंदी को अगर छोड़ दिया जाये तो 1995 से 2014 तक वे उन सब में सबसे अमीर थे. तो 2009 और 2014 के बिच में, उनकी कुल संपत्ति US $40 बिलियन से बढ़कर सीधे US $ 82 बिलियन हो गयी. 2013 और 2014 के मध्य में उनकी संपत्ति फिर से US $ 15 बिलियन बढ़ी. और फिलहाल गेट्स विश्व के सबसे अमीर व्यक्ति है.

        Bill की कुशाग्रता न केवल Software बनाने में थी. उसके साथ-साथ Business को भी आगे बढाने और Company को टॉप पर ले जाने की थी. उन्होंने जो कहा उन्होंने वैसा काम भी किया. Company में Employees द्वारा बनाये गए Code को वे जरूरत पढने पर खुद चेक करते और Error को निकाल देने का काम स्वयं किया करते थे. Bill की मेहनत और लगन की वजह से Company की तरक्की दिन ब दिन Apple, Intel और IBM जैसी Hardware बनाने वाली Company की तरह बढती जा रही थी.

        Bill लगातार लोगों से Microsoft द्वारा बनाई गई Application के बारे में Feedback लिया करते और लोगों की जरुरतो के हिसाब से Apps में बदलाव किया करते. और इस काम में इनकी माँ भी कई बार उनके साथ चली जाया करती थी. उनकी माँ Mary बहुत ही इज्ज़तदार व्यक्तियों में से एक के साथ, उनके IBM Board के Members से संबंध बहुत अच्छे भी थे. Mary के ही कारण Bill IBM के CEO से मिल पाए.

        नवम्बर 1980 में IBM एक ऐसा Software चाहता था जिससे अपना Personal Computer चला सके और इस Software को बनाने के लिए उन्होंने Microsoft के सामने प्रस्ताव रखा. IBM के CEO से पहली मुलाक़ात के वक़्त किसी ने Bill को ऑफिस का एक कर्मचारी समज्ञ कर उन्हें सबको कॉफ़ी पिलाने को कहा उस वक़्त Bill काफी जवान दीखते थे और जल्दी ही IBM उनसे Impress हो गये. और Bill ने उन्हें Software बनाने के लिए राज़ी कर लिया, कि वे उनके Software से जुडी सारी जरूरते पूरी कर लेंगे. लेकिन परेशानी यह थी कि Microsoft Company IBM के लिए Basic Operating System नही बना पाया जो IBM के नए Computer को चला सके, लेकिन यह कोई अंत नहीं था.

विचार :

• चाहे आपमें कितनी भी योग्यता क्यों न हो, केवल एकाग्रचित्त होकर ही आप महान कार्य कर सकते हैं।
• सफलता एक घटिया शिक्षक है। यह लोगों में यह सोच विकसित कर देता है कि वो असफल नहीं हो सकते।
• जब आपके हाथ में पैसा होता है तो केवल आप भूलते है की आप कौन है लेकिन जब आपके हाथ खाली होते है तो सम्पूर्ण संसार भूल जाता है की आप कौन है।
• यह सही हैं की सफलता का जश्न आप मनाये पर अपने पुराने बुरे समय को याद रखते हुए।
• मैं एक कठिन काम को करने के लिए एक आलसी इंसान को चुनुंगा क्योकि आलसी इंसान उस काम को करने का एक आसान तरीका खोज लेगा।
• बेवकूफ बनकरखुश रहिये और इसकी पूरी उम्मीद हैं की आप अंत में सफलता प्राप्त करेंगे।
• जीवन सेमेस्टर में विभाजित नहीं है। आपको गर्मियों में छुट्टी नहीं मिलती है और कुछ नियोक्ता आपको अपने आप को खोजने में मदद करने में रुचि रखते हैं।
• यदि   जनरल मोटर्स कम्प्यूटर  इंडस्ट्री  के  हिसाब  से  अपनी  टेक्नोलॉजी  का विकास  करता  तो  आज  हम  $25 की  कार  चला  रहे  होते  जो  1000 माईल्स पर गैलन के हिसाब  से  चलती।
• मेरा विश्वास है की यदि आप लोगो को समस्याएं दिखाओंगे और उनका हल सुझाओगे तो लोग उसको अपनाने के लिए आकर्षित होंगे।
• मैं परीक्षा में कुछ विषयो में फ़ैल हो गया। और मेरे सभी दोस्त पास हो गये !अब वे माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी में इंजीनियर है और मै माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी का मालिक हूँ।
• टेक्नोलॉजी केवल मात्र एक औजार है जो बच्चों को एक साथ काम करने के लिए पास लाते है पर जहां तक बात बच्चों को प्रेरित करने की है तो शिक्षक सबसे महत्तवपूर्ण है।

        1990 के दशक की सबसे प्रसिद्ध व्यापारी होने के अलावा, गेट्स भी खुद एक परोपकारी दान के लिए काम कर रहे किसी के रूप में प्रतिष्ठित है. वह और पत्नी मेलिंडा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की स्थापना की, जो स्वास्थ्य देखभाल और दुनिया भर के बच्चों के लिए शिक्षा में सुधार करने में मदद करने पर ध्यान केंद्रित. नींव 1996 में अपनी शुरुआत के बाद से 4 अरब डॉलर का दान दिया है.

        750 $ मिलियन पांच वर्षों में मदद करने के लिए बच्चों के टीके के लिए ग्लोबल फंड लॉन्च,, 50 $ मिलियन मदद करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रयासों को पोलियो, एक गंभीर रोग उन्मूलन के लिए हाल ही में प्रतिज्ञाओं एक $ अरब बीस साल से अधिक के लिए के बारे में एक हजार अल्पसंख्यक छात्रों के लिए कॉलेज छात्रवृत्ति निधि शामिल कि आम तौर पर बच्चों हमलों, और 3 मिलियन डॉलर अर्जित प्रतिरक्षा कमी सिंड्रोम (एड्स एक लाइलाज बीमारी है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को नष्ट कर देता है) के प्रसार को रोकने में मदद दक्षिण अफ्रीका में युवा लोगों के बीच. नवंबर 1998 में गेट्स और उनकी पत्नी भी सबसे बड़ा अमेरिकी सार्वजनिक पुस्तकालय के लिए एक उपहार दिया था, जब वे सिएटल सार्वजनिक पुस्तकालय के लिए 20 करोड़ डॉलर का दान दिया. गेट्स की धर्मार्थ दान का एक और $ 20 मिलियन कंप्यूटर विज्ञान के लिए अपनी

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Read more: बिल गेट्स जीवनी - Biography of Bill Gates in Hindi Jivani Published By : Jivani.org

भगत सिंह जीवनी - Biography of Bhagat Singh in Hindi Jivani Published By : Jivani.org

नाम : सरदार भगतसिंग किशंसिंग
जन्म : २८ सितंबर १९०७ बंगा (जि. लायलपुर, अभी पाकिस्तान मे)
पिता : किशनसिंग
माता : विद्यावती

        भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़े आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च १९३१ को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया।

        सारे देश ने उनके बलिदान को बड़ी गम्भीरता से याद किया। पहले लाहौर में साण्डर्स-वध और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की। भगत सिंह को अराजकतावादी और मार्क्सवादी विचारधारा में रुचि थी।


आरंभिक जीवन:

        भगत सिंह का जन्म २७ सितंबर १९०७ को हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था। अमृतसर में १३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।

        उनका परिवार राजनितिक रूप से सक्रीय था। उनके दादा अर्जुन सिंह, हिंदु आर्य समाज की पुनर्निर्मिति के अभियान में दयानंद सरस्वती के अनुयायी थे। इसका भगत सिंह पर बहोत प्रभाव पड़ा। भगत सिंह के पिता और चाचा करतार सिंह और हर दयाल सिंह द्वारा चलाई जा रही ग़दर पार्टी के भी सदस्य थे। अरजित सिंह पर बहोत सारे क़ानूनी मुक़दमे होने के कारण उन्हें निर्वासित किया गया जबकि स्वरण सिंह की 1910 में लाहौर में ही जेल से रिहा होने बाद मृत्यु हो गयी।

        1919 में, जब वे केवल 12 साल के थे, सिंह जलियांवाला बाग़ में हजारो निःशस्त्र लोगो को मारा गया। जब वे 14 साल के थे वे उन लोगो में से थे जो अपनी रक्षा के लिए या देश की रक्षा के लिए ब्रिटिशो को मारते थे। भगत सिंह ने कभी महात्मा गांधी के अहिंसा के तत्व को नहीं अपनाया, उनका यही मानना था की स्वतंत्रता पाने के लिए हिंसक बनना बहोत जरुरी है। वे हमेशा से गांधीजी के अहिंसा के अभियान का विरोध करते थे, क्यू की उनके अनुसार 1922 के चौरी चौरा कांड में मारे गये ग्रामीण लोगो के पीछे का कारण अहिंसक होना ही था। तभी से भगत सिंह ने कुछ युवायो के साथ मिलकर क्रान्तिकारी अभियान की शुरुवात की जिसका मुख्य उद्देश हिसक रूप से ब्रिटिश राज को खत्म करना था।

        भगत सिंह में बचपन से ही देशसेवा की प्रेरणा थी। उन्होंने हमेशा ब्रिटिश राज का विरोध किया। और जो उम्र खेलने-कूदने की होती है उस उम्र में उन्होंने एक क्रांतिकारी आन्दोलन किया था। भगत सिंह की बहादुरी के कई किस्से हमें इतिहास में देखने मिलेंगे। वे खुद तो बहादुर थे ही लेकिन उन्होंने अपने साथियों को भी बहादुर बनाया था और ब्रिटिशो को अल्पायु में भी धुल चटाई थी। वे भारतीय युवायो के आदर्श है और आज के युवायो को भी उन्ही की तरह स्फुर्तिला बनने की कोशिश करनी चाहिये।

        भगत सिंह ने सबसे पहले नौजवान भारत सभा ज्वाइन की. जब उनके घर वालों ने उन्हें विश्वास दिला दिया कि वे अब उनकी शादी का नहीं सोचेंगे, तब भगत सिंह अपने घर लाहौर लौट गए. वहां उन्होंने कीर्ति किसान पार्टी के लोगों से मेल जोल बढ़ाया, और उनकी मैगजीन “कीर्ति” के लिए कार्य करने लगे. वे इसके द्वारा देश के नौजवानों को अपने सन्देश पहुंचाते थे, भगत जी बहुत अच्छे लेखक थे, जो पंजाबी उर्दू पेपर के लिए भी लिखा करते थे, 1926 में नौजवान भारत सभा में भगत सिंह को सेक्रेटरी बना दिया गया.

        इसके बाद 1928 में उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) ज्वाइन कर ली, जो एक मौलिक पार्टी थी, जिसे चन्द्रशेखर आजाद ने बनाया था. पूरी पार्टी ने साथ में मिलकर 30 अक्टूबर 1928 को भारत में आये सइमन कमीशन का विरोध किया, जिसमें उनके साथ लाला लाजपत राय भी थे. “साइमन वापस जाओ” का नारा लगाते हुए, वे लोग लाहौर रेलवे स्टेशन में ही खड़े रहे. जिसके बाद वहां लाठी चार्ज कर दिया गया, जिसमें लाला जी बुरी तरह घायल हुए और फिर उनकी म्रत्यु हो गई.

        लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिये क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को भागने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी। और उन्हें 116 दिनों की जेल भी हुई थी। भगत सिंह को महात्मा गांधी की अहिंसा पर भरोसा नही था। 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई। और मरते वक्त भी उन्हीने फाँसी के फंदे को चूमकर मौत का ख़ुशी से स्वागत किया था।

        8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय विधान सभा सत्र के दौरान विधान सभा भवन में बम फेंका। बम से किसी को भी नुकसान नहीं पहुचा। उन्होंने घटनास्थल से भागने के वजाए जानबूझ कर गिरफ़्तारी दे दी। अपनी सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने किसी भी बचाव पक्ष के वकील को नियुक्त करने से मना कर दिया। जेल में उन्होंने जेल अधिकारियों द्वारा साथी राजनैतिक कैदियों पर हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में भूख हड़ताल की। 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, सुख देव और राज गुरु को विशेष न्यायलय द्वारा मौत की सजा सुनाई गयी। भारत के तमाम राजनैतिक नेताओं द्वारा अत्यधिक दबाव और कई अपीलों के बावजूद भगत सिंह और उनके साथियों को 23 मार्च 1931 को प्रातःकाल फांसी दे दी गयी।

        1921 में जब महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन का आह्वान किया तब भगत सिंह ने अपनी पढाई छोड़ आंदोलन में सक्रिय हो गए। वर्ष 1922 में जब महात्मा गांधी ने गोरखपुर के चौरी-चौरा में हुई हिंसा के बाद असहयोग आंदोलन बंद कर दिया तब भगत सिंह बहुत निराश हुए। अहिंसा में उनका विश्वास कमजोर हो गया और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सशस्त्र क्रांति ही स्वतंत्रता दिलाने का एक मात्र उपयोगी रास्ता है। अपनी पढाई जारी रखने के लिए भगत सिंह ने लाहौर में लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित राष्ट्रीय विद्यालय में प्रवेश लिया। यह विधालय क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था और यहाँ पर वह भगवती चरण वर्मा, सुखदेव और दूसरे क्रांतिकारियों के संपर्क में आये।

        भगत सिंह ने अपने तकरीबन दो साल के जेल-कारावास के दौरान कई पत्र लिखे थे। और अपने कई लेख मे पूंजीपतियों की शोषण युक्त नितियों की कड़ी निंदा की थी। जेल मे कैदीयो  को कच्चे-पके खाने और अस्वछ निर्वास मे रखा जाता था। भगत सिंह और उनके साथियो ने इस अत्याचार के खिलाफ आमरण अनशन – भूख हड़ताल का आहवाहन किया। और तकरीबन दो महीनों (64 दिन) तक भूख हड़ताल जारी रखी। अंत मे अंग्रेज़ सरकार ने घुटने टेक दिये। और  उन्हे मजबूर हो कर भगत सिंह और उनके साथियो की मांगे माननी पड़ी। पर भूख हड़ताल के कारण क्रांतिकारी यातींद्रनाथ दास शहीद हो गए।

        काकोरी कांड के आरोप मे गिरफ्तार हुए तमाम आरोपीयो मे से चार को मृत्यु दंड की सजा सुनाई गयी और, अन्य सोलह आरोपीयो को आजीवन कारावास की सजा दी गयी। इस खबर ने भगत सिंह को क्रांति के धधकते अंगारे मे बदल दिया। और उसके बाद भगत सिंह ने अपनी पार्टी “नौजवान भारत सभा” का विलय “हिंदुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन”कर के नयी पार्टी “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन”का आहवाहन किया।

रोचक तथ्य :

• बचपन में जब भगत सिंह अपने पिता के साथ खेत में जाते थे तो पूछते थे कि हम जमीन में बंदूक क्यों नही उपजा सकते.
• जलियावाला बाग हत्याकांड के समय भग़त सिंह की उम्र सिर्फ 12 साल थी। इस घटना ने भगत सिँह को हमेशा के लिए क्रांतिकारी बना दिया.
• भगत सिंह ने अपने काॅलेज के दिनो में ‘National Youth Organisation‘ की स्थापना की थी.
• काॅलेज के दिनो में भग़त सिंह एक अच्छे अभिनेता भी थे. उन्होने बहुत से नाटकों में हिस्सा लिया. भग़त सिंह को कुश्ती का भी शौक था.
• भग़त सिंह एक अच्छे लेखक भी थे वो उर्दू और पंजाबी भाषा में कई अखबारों के लिए नियमित रूप से लिखते थे.
• हिन्दू-मुस्लिम दंगों से दुःखी होकर भग़त सिंह ने घोषणा की थी कि वह नास्तिक हैं.
• भग़त सिंह को फिल्में देखना और रसगुल्ले खाना काफी पसंद था। वे राजगुरु और यशपाल के साथ जब भी मौका मिलता था, फिल्म देखने चले जाते थे। चार्ली चैप्लिन की फिल्में बहुत पसंद थीं।
• ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा भग़त सिंह ने दिया था.
• भगत सिंह की अंतिम इच्छा थी कि उन्हें गोली मार कर मौत दी जाए। हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने उनकी इस इच्छा को भी नज़रअंदाज़ कर दिया.

विचार :

• मैं एक मानव हूँ और जो कुछ भी मानवता को प्रभावित करता है उससे मुझे मतलब है।
• क़ानून की पवित्रता तभी तक बनी रह सकती है जब तक की वो लोगों की इच्छा की अभिव्यक्ति करे।
• क्रांति मानव जाती का एक अपरिहार्य अधिकार है। स्वतंत्रता सभी का एक कभी न ख़त्म होने वाला जन्म-सिद्ध अधिकार है। श्रम समाज का वास्तविक निर्वाहक है।
• ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है … दूसरो के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं।
• बुराई इसलिए नहीं बढ़ती की बुरे लोग बढ़ गए है बल्कि बुराई इसलिए बढ़ती है क्योंकि बुराई सहन करने वाले लोग बढ़ गये है।
• राख का हर एक कण मेरी गर्मी से गतिमान है मैं एक ऐसा पागल हूँ जो जेल में भी आज़ाद है।
• मेरी कलम मेरी भावनावो से इस कदर रूबरू है कि मैं जब भी इश्क लिखना चाहूं तो हमेशा इन्कलाब लिखा जाता है।

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बटुकेश्वर दत्त जीवनी - Biography of Batukeshwar Dutt in Hindi Jivani Published By : Jivani.org

बटुकेश्वर दत्त भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। बटुकेश्वर दत्त को देश ने सबसे पहले 8 अप्रैल 1929 को जाना, जब वे भगत सिंह के साथ केंद्रीय विधान सभा में बम विस्फोट के बाद गिरफ्तार किए गए। उन्होनें आगरा में स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने में उल्लेखनीय कार्य किया था। उनका पैत्रिक गाँव बंगाल के 'बर्दवान ज़िले' में था, पर पिता 'गोष्ठ बिहारी दत्त' कानपुर में नौकरी करते थे।

        बटुकेश्वर ने 1925 ई. में मैट्रिक की परीक्षा पास की और तभी माता व पिता दोनों का देहान्त हो गया। इसी समय वे सरदार भगतसिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन’ के सदस्य बन गए। सुखदेव और राजगुरु के साथ भी उन्होंने विभिन्न स्थानों पर काम किया।

प्रारंभिक जीवन :

        बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर 1910 को बंगाली कायस्थ परिवार में ग्राम-औरी, जिला - नानी बेदवान (बंगाल) में हुआ था। इनका बचपन अपने जन्म स्थान के अतिरिक्त बंगाल प्रांत के वर्धमान जिला अंतर्गत खण्डा और मौसु में बीता। इनकी स्नातक स्तरीय शिक्षा पी.पी.एन. कॉलेज कानपुर में सम्पन्न हुई। 1924 में कानपुर में इनकी भगत सिंह से भेंट हुई। इसके बाद इन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए कानपुर में कार्य करना प्रारंभ किया। इसी क्रम में बम बनाना भी सीखा।

        8 अप्रैल 1929 को दिल्ली स्थित केंद्रीय विधानसभा (वर्तमान में संसद भवन) में भगत सिंह के साथ बम विस्फोट कर ब्रिटिश राज्य की तानाशाही का विरोध किया। बम विस्फोट बिना किसी को नुकसान पहुंचाए सिर्फ पर्चों के माध्यम से अपनी बात को प्रचारित करने के लिए किया गया था। उस दिन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार की ओर से पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल लाया गया था, जो इन लोगों के विरोध के कारण एक वोट से पारित नहीं हो पाया।

        बटुकेश्वर दत्त यूं तो बंगाली थे। बर्दवान से 22 किलोमीटर दूर 18 नवंबर 1910 को एक गांव औरी में पैदा हुए बटुकेश्वर को बीके दत्त, बट्टू और मोहन के नाम से  जाना जाता था। हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए वो कानपुर आ गए। कानपुर शहर में ही उनकी मुलाकात चंद्रशेखर आजाद से हुई। उन दिनों चंद्रशेखर आजाद झांसी, कानपुर और इलाहाबाद के इलाकों में अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां चला रहे थे। 1924 में भगत सिंह भी वहां आए।

        देशप्रेम के प्रति उनके जज्बे को देखकर भगत सिंह उनको पहली मुलाकात से ही दोस्त मानने लगे थे। 1928 में जब हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का गठन चंद्रशेखर आजाद की अगुआई में हुआ, तो बटुकेश्वर दत्त भी उसके अहम सदस्य थे। बम बनाने के लिए बटुकेश्वर दत्त ने खास ट्रेनिंग ली और इसमें महारत हासिल कर ली। एचएसआरए की कई क्रांतिकारी गतिविधियों में वो सीधे तौर पर शामिल थे। जब क्रांतिकारी गतिविधियों के खिलाफ अंग्रेज सरकार ने डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट लाने की योजना बनाई, तो भगत सिंह ने उसी तरह से सेंट्रल असेंबली में बम फोड़ने का इरादा व्यक्त किया, जैसे कभी फ्रांस के चैंबर ऑफ डेपुटीज में एक क्रांतिकारी ने फोड़ा था।

        एचएसआरए की मीटिंग हुई, तय हुआ कि बटुकेश्वर दत्त असेंबली में बम फेंकेंगे और सुखदेव उनके साथ होंगे। भगत सिंह उस दौरान सोवियत संघ की यात्रा पर होंगे, लेकिन बाद में भगत सिंह के सोवियत संघ का दौरा रद्द हो गया और दूसरी मीटिंग में ये तय हुआ कि बटुकेश्वर दत्त बम प्लांट करेंगे, लेकिन उनके साथ सुखदेव के बजाय भगत सिंह होंगे। भगत सिंह को पता था कि बम फेंकने के बाद असेंबली से बचकर निकल पाना, मुमकिन नहीं होगा, ऐसे में क्यों ना इस घटना को बड़ा बनाया जाए, इस घटना के जरिए बड़ा मैसेज दिया जाए।

        8 अप्रैल 1929 का दिन था, पब्लिक सेफ्टी बिल पेश किया जाना था। बटुकेश्वर बचते-बचाते किसी तरह भगत सिंह के साथ दो बम सेंट्रल असेंबली में अंदर ले जाने में कामयाब हो गए। जैसे ही बिल पेश हुआ, विजिटर गैलरी में मौजूद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त उठे और दो बम उस तरफ उछाल दिए जहां बेंच खाली थी। जॉर्ज सस्टर और बी.दलाल समेत थोड़े से लोग घायल हुए, लेकिन बम ज्यादा शक्तिशाली नहीं थे, सो धुआं तो भरा, लेकिन किसी की जान को कोई खतरा नहीं था। बम के साथ-साथ दोनों ने वो पर्चे भी फेंके, गिरफ्तारी से पहले दोनों ने इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद जैसे नारे भी लगाए। दस मिनट के अंदर असेंबली फिर शुरू हुई और फिर स्थगित कर दी गई।

        उसके बाद देश भर में बहस शुरू हो गई। भगत सिंह के चाहने वाले, जहां ये साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि बम किसी को मारने के लिए नहीं बल्कि बहरे अंग्रेजों के कान खोलने के लिए फेंके गए थे, तो वहीं अंग्रेज और अंग्रेज परस्त इसे अंग्रेजी हुकूमत पर हमला बता रहे थे। हालांकि बाद में फोरेंसिक रिपोर्ट ने ये साबित कर दिया कि बम इतने शक्तिशाली नहीं थे। बाद में भगत सिंह ने भी कोर्ट में कहा कि उन्होंने केवल अपनी आवाज रखने के लिए, बहरों के कान खोलने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल किया था, ना कि किसी की जान लेने के लिए। लेकिन भगत सिंह के जेल जाते ही एचआरएसए के सदस्यों ने लॉर्ड इरविन की ट्रेन पर बम फेंक दिया।

        भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी हुई जबकि बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सज़ा. फांसी की सजा न मिलने से वे दुखी और अपमानित महसूस कर रहे थे. बताते हैं कि यह पता चलने पर भगत सिंह ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी. इसका मजमून यह था कि वे दुनिया को यह दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं. भगत सिंह ने उन्हें समझाया कि मृत्यु सिर्फ सांसारिक तकलीफों से मुक्ति का कारण नहीं बननी चाहिए. बटुकेश्वर दत्त ने यही किया. काला पानी की सजा के तहत उन्हें अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल भेजा गया.

        वहां से 1937 में वे बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना  लाए गए. 1938 में उनकी रिहाई हो गई. कालापानी की सजा के दौरान ही उन्हें टीबी हो गया था जिससे वे मरते-मरते बचे. जल्द ही वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े. उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया. चार साल बाद 1945 में वे रिहा हुए. 1947 में देश आजाद हो गया. नवम्बर, 1947 में बटुकेश्वर दत्त ने शादी कर ली और पटना में रहने लगे. लेकिन उनकी जिंदगी का संघर्ष जारी रहा.

        कभी सिगरेट कंपनी एजेंट तो कभी टूरिस्ट गाइड बनकर उन्हें पटना की सड़कों की धूल छाननी पड़ी. बताते हैं कि एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे. बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया. परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने पेशी हुई तो उनसे कहा गया कि वे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लेकर आएं. हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर से माफ़ी मांगी थी.

        लेखक अनिल वर्मा बताते हैं, ‘‘बटुकेश्वर दत्त को कोई सम्मान नहीं दिया गया स्वाधीनता के बाद. निर्धनता की ज़िंदगी बिताई उन्होंने. पटना की सड़कों पर सिगरेट की डीलरशिप और टूरिस्ट गाइड का काम करके बटुकेश्वर ने जीवन यापन किया. उनकी पत्नी मिडिल स्कूल में नौकरी करती थीं जिससे उनका घर चला.’’ अनिल बताते हैं कि एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे तो इसके लिए बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया. परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने पेशी हुई तो कमिश्नर ने उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लाने को कहा.

        हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर जी से माफ़ी मांगी थी. बटुकेश्वर जी का बस इतना ही सम्मान हुआ कि पचास के दशक में उन्हें एक बार चार महीने के लिए विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया. अनिल वर्मा बताते हैं कि बटुकेश्वर दत्त का जीवन इसी निराशा में बीता और 1965 में उनकी मौत हो गई. आज़ादी के साठ साल बाद बटुकेश्वर दत्त को एक किताब के ज़रिए याद तो किया गया लेकिन न जाने कितने ऐसे क्रांतिकारी हैं जिन पर अभी तक एक पर्चा भी नहीं लिखा गया है.

मृत्यू :

        जेल से रिहा होने के बाद दत्त को ट्यूबरक्लोसिस हो गया था। लेकिन फिर भी उन्होंने महात्मा गांधी के भारत छोडो अभियान में भाग लिया और फिर से चार साल के लिए जेल गये। मोतिहारी जेल (बिहार के चंपारण जिले में) में उन्हें रखा गया था। भारत को आज़ादी मिलने के बाद, नवम्बर 1947 को उन्होंने अंजलि से शादी कर ली थी। लेकिन आज़ाद भारत ने उन्हें कोई पहचान नही दिलवाई और उन्होंने अपना पूरा जीवन इसके बाद गरीबी बोझ तले बिताया। और कुछ समय तक लंबी बीमारी से जूझे रहने के बाद अंततः 20 जुलाई 1965 को दिल्ली के AIIMS हॉस्पिटल में उनकी मृत्यु हो गयी थी।

        पंजाब में फिरोजपुर के पास हुसैनीवाला बाग़ में उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहाँ उनके साथी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का भी अंतिम संस्कार उनकी मृत्यु के कुछ वर्षो पहले किया गया था। ऐसे महानुभावों को कृतज्ञ राष्ट्र हमेशा याद करता है और प्रेरणा प्राप्त करता है। ऐसे ही स्मरणीय व्यक्तित्व में शहीद भगत सिंह के साथी स्व. बटुकेश्वर दत्त का नाम सर्वोपरि है। बटुकेश्वर दत्त का त्याग और बलिदान हमेशा इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। महान क्रांतिकारियों का राष्ट्र ऋणी है।

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राम प्रसाद बिस्मिल जीवनी - Biography of Ram Prasad Bismil in Hindi Jivani Published By : Jivani.org

   राम प्रसाद 'बिस्मिल' भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की क्रान्तिकारी धारा के एक प्रमुख सेनानी थे, जिन्हें ३० वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार ने फाँसी दे दी। वे मैनपुरी षड्यन्त्र व काकोरी-काण्ड जैसी कई घटनाओं में शामिल थे तथा हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सदस्य भी थे। राम प्रसाद एक कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी, इतिहासकार व साहित्यकार भी थे।

        बिस्मिल उनका उर्दू तखल्लुस (उपनाम) था जिसका हिन्दी में अर्थ होता है आत्मिक रूप से आहत। बिस्मिल के अतिरिक्त वे राम और अज्ञात के नाम से भी लेख व कवितायें लिखते थे। शुक्रवार ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (निर्जला एकादशी) विक्रमी संवत् १९५४ को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में जन्मे राम प्रसाद को ३० वर्ष की आयु में सोमवार पौष कृष्ण एकादशी (सफला एकादशी) विक्रमी संवत् १९८४ को वे शहीद हुए। 

प्रारंभिक जीवन :

        ज्येष्ठ शुक्ल 11 संवत् 1954 सन 1897 में पंडित मुरलीधर की धर्मपत्नी ने द्वितीय पुत्र को जन्म दिया। इस पुत्र का जन्म मैनपुरी में हुआ था। सम्भवत: वहाँ बालक का ननिहाल रहा हो। इस विषय में श्री व्यथित हृदय ने लिखा है- 'यहाँ यह बात बड़े आश्चर्य की मालूम होती है कि बिस्मिल के दादा और पिता ग्वालियर के निवासी थे। फिर भी उनका जन्म मैनपुरी में क्यों हुआ? हो सकता है कि मैनपुरी में बिस्मिल जी का ननिहाल रहा हो।' इस पुत्र से पूर्व एक पुत्र की मृत्यु हो जाने से माता-पिता का इसके प्रति चिन्तित रहना स्वाभाविक था।

        अत: बालक के जीवन की रक्षा के लिए जिसने जो उपाय बताया, वही किया गया। बालक को अनेक प्रकार के गण्डे ताबीज आदि भी लगाये गए। बालक जन्म से ही दुर्बल था। जन्म के एक-दो माह बाद इतना दुर्बल हो गया कि उसके बचने की आशा ही बहुत कम रह गई थी। माता-पिता इससे अत्यन्त चिन्तित हुए। उन्हें लगा कि कहीं यह बच्चा भी पहले बच्चे की तरह ही चल न बसे। इस पर लोगों ने कहा कि सम्भवत: घर में ही कोई बच्चों का रोग प्रवेश कर गया है। इसके लिए उन्होंने उपाय सुझाया।

        बताया गया कि एक बिल्कुल सफ़ेद खरगोश बालक के चारों ओर घुमाकर छोड़ दिया जाए। यदि बालक को कोई रोग होगा तो खरगोश तुरन्त मर जायेगा। माता-पिता बालक की रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार थे, अत: ऐसा ही किया गया। आश्चर्य की बात कि खरगोश तुरन्त मर गया। इसके बाद बच्चे का स्वास्थ्य दिन पर दिन सुधरने लगा। यही बालक आगे चलकर प्रसिद्ध क्रान्तिकारी अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

        आठवीं कक्षा तक वो हमेश कक्षा में प्रथम आते थे, परन्तु कुसंगति के कारण उर्दू मिडिल परीक्षा में वह लगातार दो वर्ष अनुत्तीर्ण हो गए। राम प्रसाद की इस अवनति से सभी को बहत दु:ख हुआ और दो बार एक ही परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर उनका मन भी उर्दू की पढ़ाई से उठ गया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेज़ी पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। उनके पिता अंग्रेज़ी पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे पर रामप्रसाद की मां के कहने पर मान गए। नवीं  कक्षा में जाने के बाद रामप्रसाद आर्य समाज के सम्पर्क में आये और उसके बाद उनके जीवन की दशा ही बदल गई। आर्य समाज मंदिर शाहजहाँपुर में वह स्वामी सोमदेव के संपर्क में आये।

        जब रामप्रसाद बिस्मिल 18 वर्ष के थे तब स्वाधीनता सेनानी भाई परमानन्द को ब्रिटिश सरकार ने ‘ग़दर षड्यंत्र’ में शामिल होने के लिए फांसी की सजा सुनाई (जो बाद में आजीवन कारावास में तब्दील कर दी गयी और फिर 1920 में उन्हें रिहा भी कर दिया गया)। यह खबर पढ़कर रामप्रसाद बहुत विचलित हुए और ‘मेरा जन्म’ शीर्षक से एक कविता लिखी और उसे स्वामी सोमदेव को दिखाया। इस कविता में देश को अंग्रेजी हुकुमत से मुक्ति दिलाने की प्रतिबद्धिता दिखाई दी।

        इसके बाद रामप्रसाद ने पढ़ाई छोड़ दी और सन् 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के दौरान कांग्रेस के नरम दल के विरोध के बावजूद लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की पूरे लखनऊ शहर में शोभायात्रा निकाली। इसी अधिवेशन के दौरान उनकी मुलाकात केशव बलिराम हेडगेवार, सोमदेव शर्मा व मुकुन्दीलाल आदि से हुआ। इसके बाद कुछ साथियों की मदद से उन्होंने ‘अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित की जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रकाशित होते ही प्रतिबंधित कर दिया।

        बिस्मिल के दादा जी नारायण लाल का पैतृक गाँव बरबाई था। यह गाँव तत्कालीन ग्वालियर राज्य में चम्बल नदी के बीहड़ों के बीच स्थित तोमरघार क्षेत्र के मुरैना जिले में था और वर्तमान में यह मध्य प्रदेश में है। बरबाई ग्राम-वासी आये दिन अंग्रेज़ों व अंग्रेज़ी आधिपत्य वाले ग्राम-वासियों को तंग करते थे।

        पारिवारिक कलह के कारण नारायण लाल ने अपनी पत्नी विचित्रा देवी एवं दोनों पुत्रों - मुरलीधर व कल्याणमल सहित अपना पैतृक गाँव छोड़ दिया। उनके गाँव छोड़ने के बाद बरबाई में केवल उनके दो भाई - अमान सिंह व समान सिंह ही रह गये जिनके वंशज आज भी उसी गाँव में रहते हैं। आज बरबाई गाँव के एक पार्क में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा राम प्रसाद बिस्मिल की एक प्रतिमा स्थापित कर दी गयी है।

         कुमार अवस्था (14 साल की उम्र) में पहुँचते ही रामप्रसाद को उर्दू के उपन्यास पढ़ने का शौक लग गया। नये-नये उपन्यास खरीदने के लिये इन्हें रुपयों की आवश्यकता होने लगी। यदि वो उपन्यासों के लिये अपने पिता से धन मांगते तो बिल्कुल न मिलता इसलिये इन्होंने अपने पिता के संदूक से पैसे चुराने शुरु कर दिये। इसके साथ ही इन्हें नशा करने और सिगरेट पीने की भी लत लग गयी। जिस पुस्तक विक्रेता से बिस्मिल उपन्यास खरीदकर पढ़ते थे वो इनके पिता का परिचित था।

        उसने इस बात की शिकायत इनके पिता से कर दी जिससे घर में इनकी हरकतों पर नजर रखी जाने लगी। इस पर इन्होंने उस पुस्तक विक्रेता से पुस्तक खरीदना छोड़ दिया और किसी और से पुस्तकें खरीदकर पढ़ने लगे। लेकिन कहते हैं कि झूठ और चोरी को लोग चाहे किताना भी क्यों न छिपा ले छुपाये नहीं छुप पाता। यह कहावत बिस्मिल पर पूरी तरह से चरितार्थ हुई। एक दिन ये नशे की हालत में अपने पिता के संदूक से पैसे चुरा रहे थे।

        होश में न होने के कारण इनसे संदूक खटक गयी और आवाज को सुनकर इनकी मां जाग गयी और उन्होंने इन्हें चोरी करते देख लिया। इससे इनके सारे राज खुल गये। जब इनकी तलाशी ली गयी तो इनके पास से बहुत से उपन्यास और पैसे मिले। रामप्रसाद की सच्चाई पर से पर्दा उठने के बाद संदूक का ताला बदल दिया गया और उनके पास से मिले उपन्यासों को जलाने के साथ ही इनकी हरेक छोटी-छोटी हरकतों पर नजर रखी जाने लगी। अपनी इन्हीं गलत हरकतों के कारण ही वो लगातार मिडिल परीक्षा में दो बार फेल भी हुये। कठोर प्रतिबंधों के कारण इनकी आदतें छूटी नहीं लेकिन बदल जरुर गयी।

        जब हर दयाल के साथी भाई परमानंद को फांसी दी गई, तो उसकी दास्तां पढ़कर स्वामी सोमदेव को गुस्सा आ गया। बिस्मिल को भी बड़ा आघात पहुंचा और उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के कुकर्मों को एक कविता में पिरो दिया। कविता थी, "मेरा जन्म"। उन्होंने अपनी कविता सोमदेव को भी सुनायी और वहीं से वे सोमदेव के अच्छे मित्र बन गये। पढ़ाई पूरी करने के बाद बिस्मिल लखनऊ आ गये। यहीं से उनकी जंग का सफर शुरू हुआ। जब बिस्मिल अपने साथ‍ियों के साथ दिल्ली और आगरा गये, तो पुलिस से मुठभेड़ हुई।

        दोनों तरफ से गोलियां चलीं। बिस्मिल यमुना नदी में कूद पड़े और पानी के अंदर से तैरते हुए दूर निकल गये। पुलिस को लगा कि बिस्मिल मुठभेड़ में मारे गये। बाद में पुलिस को पता चला कि बिस्मिल जिंदा हैं, तो 1 नवंबर 1919 को मैनपुरी के मजिस्ट्रेट बीएस क्रिस ने दोनों के ख‍िलाफ गैरजमानती वॉरंट जारी कर दिया। 1919 से लेकर 1920 तक बिस्मिल अंडरग्राउंड हो गये और वेश बदलकर उत्तर प्रदेश के तामाम गांवों में विचरण करते रहे। इस बीच उन्होंने कई किताबें लिखीं, जो अलग-अलग नामों से प्रकाश‍ित हुईं।

        फरवरी 1922 में जब चौरी-चौरा में अंग्रेज पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे किसानों को मौत के घाट उतार दिया, तब बिस्मिल को बड़ा आघात पहुंचा। हालांकि गुस्साये लोगों ने 22 पुलिसवालों को जिंदा जला दिया था। अहिंसा की बात करने वाले महात्मा गांधी का विरोध करने के लिये बिस्मिल गया गये। यही वो मौका थाा, जब इंडियन नेशनल कांग्रेस के चितरंजन दास ने इस्तीफा दे दिया। उसी वक्त कांग्रेस दो भागों में टूट गई। एक तरफ मोती लाल नेहरू और दूसरी तरफ चितरंजन दास। तभी युवा इकाई बिस्मिल के नेतृत्व में बनी।

        बिस्मिल भली-भाँति जानते थे कि जब तक क्रांतिकारी देशभक्तों का सहयोग देश के निवासी और प्रेस नहीं देगी, तब तक सफलता प्राप्त नहीं होगी। अपने जेल जीवन में उन्होंने ऐसी-ऐसी बातों को देखा, जिसकी वह स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते थे। देशोत्थान तथा सामाजिक प्रतिबद्धता के चलते, उन्होंने देशवासियों से हिन्दू-मुस्लिम का भेद भुलाकर एकजुट होने की अपील की तथा संपूर्ण राष्ट्र के हित में प्रांतीयता के भाव को घातक माना।

        आत्मकथा में एक स्थान पर बिस्मिल कहते हैं- ''यदि चार अच्छे पैरवी करने वाले होते, तो पुलिस का तीन चौथाई मुकदमा टूट जाता।'' एक महान देशभक्त के लिए यदि कोई अच्छा पैरवी करने वाला भी न मिले तो यह शर्मसार होने वाली बात है। ग्रामीण विकास की पक्षधरता: ग्रामीण विकास के पक्षधर बिस्मिल देश के प्रत्येक भाग से अपना जुड़ाव मानते थे। ग्रामीण विकास को भी वह देश के विकास का अंग मानते थे। उन्होंने नवयुवकों से बार-बार ग्रामीण जीवन की उन्नति के लिए अपील की।

        असहयोग आंदोलन के संदर्भ में वह लिखते हैं- ''असहयोग आंदोलन में कार्यकर्ताओं की इतनी अधिक संख्या होने पर भी सबके सब शहर के प्लेटफार्मों पर लेक्चरबाजी करना ही अपना कर्तव्य समझते थे। यहाँ बिस्मिल के विचार गाँधी जी से मेल खाते दिखायी देते हैं, देश की स्वतंत्रता सर्वांगीण उन्नति से ही मिल सकती है। बिस्मिल एक महान देशभक्त के साथ-साथ समाज चेता भी थे।

        अपने जीवन के अनुभवों को वह भावी नवयुवकों से साझा करना चाहते थे, तभी उन्होंने आत्मकथा में उन सभी बातों का साफ-साफ उल्लेख किया, जो उनके क्रांतिकारी जीवन में बाधा बनीं। देश की युवा शक्ति सही दिशा में जाए यही उनका अंतिम संदेश था। इसीलिए वह कहते हैं- ''सभी धर्मों और सभी पार्टियों को काँग्रेस को ही प्रतिनिधि मानना चाहिए। फिर वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेजों को भारतीयों के आगे शीश झुकाना होगा।''
        
        दरअसल उस वक्त हिंदुस्तान में गांधी जी का शुरू किया हुआ असहयोग आंदोलन अपने जोरों पर था. शाहजहांपुर में एक मीटिंग में भाषण देने रामप्रसाद बिस्मिल आए हुए थे. अशफाक को ये बात पता चली तो वो भी वहां पहु्ंचे. जैसे ही प्रोग्राम ओवर हुआ अशफाक लपक कर बिस्मिल से मिले और उनको अपना परिचय उनके एक दोस्त के छोटे भाई के रूप में दिया. फिर बताया कि मैं ‘वारसी’ और ‘हसरत’ के नाम से शायरी भी करता हूं.

        इसके बाद से बिस्मिल का इंट्रेस्ट थोड़ा सा अशफाक में बढ़ा. बिस्मिल उनको अपने साथ लेकर आए और उनकी कुछ एक शायरियां सुनीं जो कि उनको पसंद आईं. इसके बाद से दोनों अधिकतर साथ ही दिखते. आस-पास के इलाके में बिस्मिल और अशफाक का जोड़ा फेमस हो गया. वो कहीं भी मुशायरों में जाते तो मुशायरे लूट कर ही आते.

        सभी प्रकार से मृत्यु दंड को बदलने के लिए की गई दया प्रार्थनाओं के अस्वीकृत हो जाने के बाद बिस्मिल अपने महाप्रयाण की तैयारी करने लगे। अपने जीवन के अंतिम दिनों में गोरखपुर जेल में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी। फांसी के तख्ते पर झूलने के तीन दिन पहले तक वह इसे लिखते रहे। इस विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है-

        'आज 16 दिसम्बर, 1927 ई. को निम्नलिखित पंक्तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जबकि 19 दिसंबर, 1927 ई. सोमवार (पौष कृष्ण 11 संवत 1984) को साढ़े छ: बजे प्रात: काल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है। अतएव नियत सीमा पर इहलीला संवरण करनी होगी।'

रचनाएँ :

• कुछ अश‍आर 
• ऐ मातृभूमि! तेरी जय हो 
• तराना-ए-बिस्मिल 
• न चाहूं मान 
• मातृ-वन्दना 
• मुखम्मस 
• बिस्मिल की उर्दू गजल 
• बिस्मिल की अन्तिम रचना 
• विद्यार्थी बिस्मिल की भावना 
• सर फ़रोशी की तमन्ना 
• हे मातृभूमि 
• गुलामी मिटा दो 
• आज़ादी 
• हैफ़ जिस पे कि हम तैयार थे मर जाने को 
• हमारी ख़्वाहिश 
• एक अन्य गीत 
• फूल 
• जब प्राण तन से निकलें 
• हक़ीक़त के वचन 
• प्रार्थना 
• फाँसी की कल्पना 
• भजन 
• भारत जननि 

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