Biography (hindi)
मिल्खा सिंह आज तक भारत के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित धावक हैं. कामनवेल्थ खेलो में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाले वे पहले भारतीय है. खेलो में उनके अतुल्य योगदान के लिये भारत सरकार ने उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्म श्री से भी सम्मानित किया है. पंडित जवाहरलाल नेहरू भी मिल्खा सिंह के खेल को देख कर उनकी तारीफ करते थे. और उन्हें मिल्खा सिंह पर गर्व था.
प्रारंभिक जीवन :
मिल्खा सिंह का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब में एक सिख राठौर परिवार में 20 नवम्बर 1929 को हुआ था। अपने माँ-बाप की कुल 15 संतानों में वह एक थे। उनके कई भाई-बहन बाल्यकाल में ही गुजर गए थे। भारत के विभाजन के बाद हुए दंगों में मिलखा सिंह ने अपने माँ-बाप और भाई-बहन खो दिया। अंततः वे शरणार्थी बन के ट्रेन द्वारा पाकिस्तान से दिल्ली आए। दिल्ली में वह अपनी शदी-शुदा बहन के घर पर कुछ दिन रहे। कुछ समय शरणार्थी शिविरों में रहने के बाद वह दिल्ली के शाहदरा इलाके में एक पुनर्स्थापित बस्ती में भी रहे।
भारत के विभाजन के बाद की अफ़रा तफ़री में मिलखा सिंह ने अपने माँ बाप खो दिए। अंततः वे शरणार्थी बन के ट्रेन द्वारा पाकिस्तान से भारत आए। ऐसे भयानक बचपन के बाद उन्होंने अपने जीवन में कुछ कर गुज़रने की ठानी। एक होनहार धावक के तौर पर ख्याति प्राप्त करने के बाद उन्होंने २००मी और ४००मी की दौड़े सफलतापूर्वक की और इस प्रकार भारत के अब तक के सफलतम धावक बने। कुछ समय के लिए वे ४००मी के विश्व कीर्तिमान धारक भी रहे।
कार्डिफ़, वेल्स, संयुक्त साम्राज्य में १९५८ के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण जीतने के बाद सिख होने की वजह से लंबे बालों के साथ पदक स्वीकारने पर पूरा खेल विश्व उन्हें जानने लगा। इसी समय पर उन्हें पाकिस्तान में दौड़ने का न्यौता मिला, लेकिन बचपन की घटनाओं की वजह से वे वहाँ जाने से हिचक रहे थे। लेकिन न जाने पर राजनैतिक उथल पुथल के डर से उन्हें जाने को कहा गया।
उन्होंने दौड़ने का न्यौता स्वीकार लिया। दौड़ में मिलखा सिंह ने सरलता से अपने प्रतिद्वन्द्वियों को ध्वस्त कर दिया और आसानी से जीत गए। अधिकांशतः मुस्लिम दर्शक इतने प्रभावित हुए कि पूरी तरह बुर्कानशीन औरतों ने भी इस महान धावक को गुज़रते देखने के लिए अपने नक़ाब उतार लिए थे, तभी से उन्हें फ़्लाइंग सिख की उपाधि मिली।
सेना में उन्होंने कड़ी मेहनत की और 200 मी और 400 मी में अपने आप को स्थापित किया और कई प्रतियोगिताओं में सफलता हांसिल की. उन्होंने सन 1956 के मेर्लबोन्न ओलिंपिक खेलों में 200 और 400 मीटर में भारत का प्रतिनिधित्व किया पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुभव न होने के कारण सफल नहीं हो पाए लेकिन 400 मीटर प्रतियोगिता के विजेता चार्ल्स जेंकिंस के साथ हुई मुलाकात ने उन्हें न सिर्फ प्रेरित किया बल्कि ट्रेनिंग के नए तरीकों से अवगत भी कराया.
इसके बाद सन 1958 में कटक में आयोजित राष्ट्रिय खेलों में उन्होंने 200 मी और 400 मी प्रतियोगिता में राष्ट्रिय कीर्तिमान स्थापित किया और एशियन खेलों में भी इन दोनों प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक हासिल किया. साल 1958 में उन्हें एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली जब उन्होंने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों में 400 मीटर प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया. इस प्रकार वह राष्ट्रमंडल खेलों के व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले स्वतंत्र भारत के पहले खिलाडी बन गए.
इसके बाद उन्होंने सन 1960 में पाकिस्तान प्रसिद्ध धावक अब्दुल बासित को पाकिस्तान में पिछाडा जिसके बाद जनरल अयूब खान ने उन्हें ‘उड़न सिख’ कह कर पुकारा. 1 जुलाई 2012 को उन्हें भारत का सबसे सफल धावक माना गया जिन्होंने ओलंपिक्स खेलो में लगभग 20 पदक अपने नाम किये है. यह अपनेआप में ही एक रिकॉर्ड है.
रोम ओलिंपिक खेल शुरू होने से कुछ वर्ष पूर्व से ही मिल्खा अपने खेल जीवन के सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में थे और ऐसा माना जा रहा था की इन खेलों में मिल्खा पदक जरूर प्राप्त करेंगे। रोम खेलों से कुछ समय पूर्व मिल्खा ने फ्रांस में 45.8 सेकंड्स का कीर्तिमान भी बनाया था। 400 में दौड़ में मिल्खा सिंह ने पूर्व ओलिंपिक रिकॉर्ड तो जरूर तोड़ा पर चौथे स्थान के साथ पदक से वंचित रह गए। 250 मीटर की दूरी तक दौड़ में सबसे आगे रहने वाले मिल्खा ने एक ऐसी भूल कर दी जिसका पछतावा उन्हें आज भी है।
उन्हें लगा की वो अपने आप को अंत तक उसी गति पर शायद नहीं रख पाएंगे और पीछे मुड़कर अपने प्रतिद्वंदियों को देखने लगे जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और वह धावक जिससे स्वर्ण की आशा थी कांस्य भी नहीं जीत पाया। मिल्खा को आज तक उस बात का मलाल है। इस असफलता से सिंह इतने निराश हुए कि उन्होंने दौड़ से संन्यास लेने का मन बना लिया पर बहुत समझाने के बाद मैदान में फिर वापसी की।
मिल्खा ने कहा कि 1947 में विभाजन के वक्त उनके परिवार के सदस्यों की उनकी आंखों के सामने ही हत्या कर दी गई। वह उस दौरान 16 वर्ष के थे। उन्होंने कहा, "हम अपना गांव (गोविंदपुरा, आज के पाकिस्तानी पंजाब में मुजफ्फरगढ़ शहर से कुछ दूर पर बसा गांव) नहीं छोड़ना चाहते थे। जब हमने विरोध किया तो इसका अंजाम विभाजन के कुरुप सत्य के रूप में हमें भुगतना पड़ा। चारो तरफ खूनखराबा था। उस वक्त मैं पहली बार रोया था।" उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद जब वह दिल्ली पहुंचे, तो पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उन्होंने कई शव देखे।
उनके पास खाने के लिए खाना और रहने के लिए छत नहीं थी। मिल्खा ने कहा कि 1960 के रोम ओलिंपिक में एक गलती के कारण वह चार सौ मीटर रेस में सेकेंड के सौवें हिस्से से पदक चूक गए। उस वक्त भी वह रो पड़े थे। मिल्खा ने कहा कि वह 1960 में पाकिस्तान में एक दौड़ में हिस्सा लेने जाना नहीं चाहते थे। लेकिन, प्रधानमंत्री नेहरू के समझाने पर वह इसके लिए राजी हो गए। उनका मुकाबला एशिया के सबसे तेज धावक माने जाने वाले अब्दुल खालिक से था। इसमें जीत हासिल करने के बाद उन्हें उस वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अय्यूब खान की ओर से 'फ्लाइंग सिख' का नाम मिला।
मिला सिंह ने खेलों में उस समय सफलता प्राप्त की जब खिलाड़ियों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, न ही उनके लिए किसी ट्रेनिंग की व्यवस्था थी । आज इतने वर्षों बाद भी कोई एथलीट ओलंपिक में पदक पाने में कामयाब नहीं हो सका है । रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह इतने लोकप्रिय हो गए थे कि जब वह स्टेडियम में घुसते थे, दर्शक उनका जोशपूर्वक स्वागत करते थे । यद्यपि वहाँ वह टॉप के खिलाड़ी नहीं थे, परन्तु सर्वश्रेष्ठ धावकों में उनका नाम अवश्य था । उनकी लोकप्रियता का दूसरा कारण उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी व लंबे बाल थे । लोग उस वक्त सिख धर्म के बारे में अधिक नहीं जानते थे । अत: लोगों को लगता था कि कोई साधु इतनी अच्छी दौड़ लगा रहा है ।
उस वक्त ‘पटखा’ का चलन भी नहीं था, अत: सिख सिर पर रूमाल बाँध लेते थे । मिल्खा सिंह की लोकप्रियता का एक अन्य कारण यह था कि रोम पहुंचने के पूर्व वह यूरोप के टूर में अनेक बड़े खिलाडियों को हरा चुके थे और उनके रोम पहुँचने के पूर्व उनकी लोकप्रियता की चर्चा वहाँ पहुंच चुकी थी । मिल्खा सिंह के जीवन में दो घटनाए बहुत महत्व रखती हैं । प्रथम-भारत-पाक विभाजन की घटना जिसमें उनके माता-पिता का कत्ल हो गया तथा अन्य रिश्तेदारों को भी खोना पड़ा | दूसरी-रोम ओलंपिक की घटना, जिसमें वह पदक पाने से चूक गए |
टोक्यो एशियाई खेलों में मिल्खा ने 200 और 400 मीटर की दौड़ जीतकर भारतीय एथलेटिक्स के लिए नये इतिहास की रचना की। मिल्खा ने एक स्थान पर लिखा है, ‘मैंने पहले दिन 400 मीटर दौड़ में भाग लिया। जीत का मुझे पहले से ही विश्वास था, क्योंकि एशियाई क्षेत्र में मेरा कीर्तिमान था। शुरू-शुरू में जो तनाव था वह स्टार्टर की पिस्टौल की आवाज के साथ सफूचक्कर हो गया। आशा के अनुसार मैंने सबसे पहले फीते को छुआ। मैंने नया रिकार्ड कायम किया था।
जापान के सम्राट ने मेरे गले में स्वर्ण पदक पहनाया। उस क्षण का रोमांच मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। अगले दिन 200 मीटर की दौड़ थी। इसमें मेरा पाकिस्तान के अब्दुल खालिक के साथ कड़ा मुकाबला था। खालिक 100 मीटर का विजेता था। दौड़ शुरू हुई। हम दोनों के कदम एक साथ पड़ रहे थे। फिनिशिंग टेप से तीन मीटर पहले मेरी टांग की मांसपेशी खिंच गयी और मैं लड़खड़ाकर गिर पड़ा।
मैं फिनिशिंग लाइन पर ही गिरा था। फोटो फिनिश में मैं विजेता घोषित हुआ और एशिया का सर्वश्रेष्ठ एथलीट भी। जापान के सम्राट ने उस समय मुझसे जो शब्द कहे थे वह मैं कभी नहीं भूल सकता। उन्होंने मुझसे कहा था - दौड़ना जारी रखोगे तो तुम्हें विश्व का सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो सकता है। दौड़ना जारी रखो।‘ मिलखा सिंह ने बाद में खेल से सन्न्यास ले लिया और भारत सरकार के साथ खेलकूद के प्रोत्साहन के लिए काम करना शुरू किया। अब वे चंडीगढ़ में रहते हैं।
उपलब्धियाँ :
• इन्होंने 1958 के एशियाई खेलों में 200 मी व 400 मी में स्वर्ण पदक जीते।
• इन्होंने 1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता।
• इन्होंने 1958 के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीता।
पुरस्कार :
मिल्खा सिंह 1959 में 'पद्मश्री' से अलंकृत किये गये।
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सचिन रमेश तेंदुलकर क्रिकेट के इतिहास में विश्व के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ौं में गिने जाते हैं। भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित होने वाले वह सर्वप्रथम खिलाड़ी और सबसे कम उम्र के व्यक्ति हैं। राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित एकमात्र क्रिकेट खिलाड़ी हैं। सन् २००८ में वे पद्म विभूषण से भी पुरस्कृत किये जा चुके है। सन् १९८९ में अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण के पश्चात् वह बल्लेबाजी में कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
उन्होंने टेस्ट व एक दिवसीय क्रिकेट, दोनों में सर्वाधिक शतक अर्जित किये हैं। वे टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज़ हैं। इसके साथ ही टेस्ट क्रिकेट में १४००० से अधिक रन बनाने वाले वह विश्व के एकमात्र खिलाड़ी हैं। एकदिवसीय मैचों में भी उन्हें कुल सर्वाधिक रन बनाने का कीर्तिमान प्राप्त है। सचिन एक महान खिलाड़ी होने के साथ साथ एक अच्छे इंसान भी हैं | क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन ने अपनी मेहनत लगन से देश विदेश में अपने काम का लोहा मनवाया है|
प्रारंभिक जीवन :
24 अप्रैल 1973 को राजापुर के मराठी ब्राह्मण परिवार में जन्मे सचिन का नाम उनके पिता रमेश तेंदुलकर ने अपने चहेते संगीतकार सचिन देव बर्मन के नाम पर रखा था। उनके बड़े भाई अजीत तेंदुलकर ने उन्हें क्रिकेट खेलने के लिये प्रोत्साहित किया था। सचिन के एक भाई नितिन तेंदुलकर और एक बहन सविताई तेंदुलकर भी हैं। १९९५ में सचिन तेंदुलकर का विवाह अंजलि तेंदुलकर से हुआ। सचिन के दो बच्चे हैं - सारा और अर्जुन।
सचिन ने शारदाश्रम विद्यामन्दिर में अपनी शिक्षा ग्रहण की। वहीं पर उन्होंने प्रशिक्षक (कोच) रमाकान्त अचरेकर के सान्निध्य में अपने क्रिकेट जीवन का आगाज किया। तेज गेंदबाज बनने के लिये उन्होंने एम.आर.एफ. पेस फाउण्डेशन के अभ्यास कार्यक्रम में शिरकत की पर वहाँ तेज गेंदबाजी के कोच डेनिस लिली ने उन्हें पूर्ण रूप से अपनी बल्लेबाजी पर ध्यान केन्द्रित करने को कहा।
सामान्य परिवार में बढे हुये सचिन ने अपनी शिक्षा मुंबई के शारदाश्रम विश्वविद्यालय में की। उनके भाई अजित तेंदुलकर इन्होंने बचपन में ही सचिन के अंदर के Cricketer को पहचानकर उन्हें सही से मार्गदर्शन किया। Cricket में के ‘द्रोणाचार्य’ रमाकांत आचरेकर इन्होंने सचिन को सक्षम शिक्षा दी। हँरिस शिल्ड मुकाबले में विनोद कांबली के साथ निजी 326 रन करते हुये 664 रनों की विक्रमी भागीदारी करने का पराक्रम किया और 15 साल की उम्र में वो मुंबई टीम में शामिल हुये।
इनके पिता ने इनका दाखिला क्रिकेट के ‘द्रोणाचार्य’ कहे जाने वाले रमाकांत आचरेकर के यहाँ करा दिया जिन्होंने सचिन के क्रिकेट प्रतिभा को अच्छी तरह से निखारा.वही सचिन तेज गेदबाजी सीखने के लिए M.R.F. Foundation के ट्रेनिंग कैंप में गये जहाँ उन्हें तेज गेदबाजी के कोच डेनिस लिली ने अपनी बल्लेबाजी पर पूरा ध्यान देने के लिए कहा और तब से सचिन बल्लेबाजी करने लगे.
सचिन के कोच रमेश आचरेकर का सचिन को अभ्यास कराने का तरीका बिल्कुल अनोखा था. वह क्रीज पर विकेट के नीचे 1 रूपये का सिक्का रखते थे. अगर किसी गेदबाज ने सचिन को आउट कर दिया तो यह सिक्का उस गेदबाज का हो जाता था और अगर सचिन आउट नहीं हुए तो यह सिक्का सचिन का हो जाता था. सचिन ने अपने गुरु से ऐसे ही 13 सिक्के जीते जो अभी भी सचिन के पास है. इस तरह से सचिन के गुरु ने सचिन को बल्लेबाजी में निपुण बनाया.
सचिन ने सन 1990 में इंग्लैंड दौरे में अपने टेस्ट क्रिकेट का पहला शतक लगाया जिसमे उन्होंने नाबाद 119 रन बनाये इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के टेस्ट मुकाबलों में भी सचिन का प्रदर्शन यही रहा और उन्होंने कई टेस्ट शतक जड़े. सचिन ने 1992-93 में अपना पहला घरेलु टेस्ट मैच इंग्लैंड के खिलाफ भारत में खेला जो उनका टेस्ट कैरियर का 22वा टेस्ट मैच था. सचिन की प्रतिभा और क्रिकेट तकनीक को देखते हुए सभी ने उन्हें डॉन ब्रेडमैन की उपाधि दी जिसे बाद में डॉन ब्रेडमैन ने भी खुद इस बात को स्वीकार करा.
सचिन के कोच अचरेकर सचिन को सुबह स्कूल जाने से पहले व शाम को स्कूल से आने के बाद क्रिकेट की ट्रेनिंग दिया करते थे| सचिन बहुत मेहनती थे, वे लगातार प्रैक्टिस किया करते थे, जब वे थक जाया करते थे, तब कोच स्टंप में 1 रुपय का कॉइन रख दिया करते थे, जिससे सचिन आगे खेलते रहे| सचिन खेलते रहते थे और पैसे जोड़ा करते थे| 1988 में सचिन ने स्टेट लेवल के मैच में मुंबई की तरफ से खेलकर अपने करियर की पहली सेंचुरी मारी थी| पहले ही मैच के बाद उनका चयन नेशनल टीम के लिए हो गया था और 11 महीनों बाद सचिन ने पहली बार इंटरनेशनल मैच पाकिस्तान के खिलाफ खेला, जो उस समय की सबसे दमदार टीम मानी जाती थी|
इसी सीरीज में सचिन ने पहली बार वन डे मैच खेला| 1990 में सचिन ने इंग्लैंड के हिलाफ़ पहला टेस्ट सीरीज खेली, जिसमें उन्होंने 119 रनों की पारी खेली और दुसरे नंबर के सबसे छोटे प्लेयर बन गए जिन्होंने सेंचुरी मारी| 1996 के वर्ल्ड कप के समय सचिन को टीम का कप्तान बना दिया गया| 1998 में सचिन ने कप्तानी छोड़ दी, व 1999 में उन्हें फिर कप्तान बना दिया गया| कप्तानी के दौरान सचिन ने 25 में से सिर्फ 4 टेस्ट मैच जीते थे, जिसके बाद से सचिन ने कभी भी कप्तानी ना करने का फैसला कर लिया|
सचिन देखने में सीधा-सादा इंसान है । वह अति प्रसिद्ध हो जाने पर भी नम्र स्वभाव का है । वह अपने अच्छे व्यवहार का श्रेय अपने पिता को देता है । उसका कहना है- ”मैं जो कुछ भी हूं अपने पिता के कारण हूँ । उन्होंने मुझ में सादगी और ईमानदारी के गुण भर दिए हैं । वह मराठी साहित्य के शिक्षक थे और हमेशा समझाते थे कि जिन्दगी को बहुत गम्भीरता से जीना चाहिए । जब उन्हें अहसास हुआ कि शिक्षा नहीं, क्रिकेट मेरे जीवन का हिस्सा बनने वाली है, उन्होंने उस बात का बुरा नहीं माना । उन्होंने मुझसे कहा कि ईमानदारी से खेलो और अपना स्तर अच्छे से अच्छा बनाए रखो । मेहनत से कभी मत घबराओ ।”
क्रिकेट के अतिरिक्त सचिन को संगीत सुनना और फिल्में देखना पसन्द है । सचिन क्रिकेट को अपनी जिन्दगी और अपना खून मानते हैं । क्रिकेट के कारण प्रसिद्धि पा जाने पर वह किस चीज का आनन्द नहीं ले पाते-यह पूछने पर वह कहते हैं कि दोस्तों के साथ टेनिस की गेंद से क्रिकेट खेलना याद आता है । 29 वर्ष और 134 दिन की उम्र में सचिन ने अपना 100वां टैस्ट इंग्लैण्ड के खिलाफ खेला । 5 सितम्बर, 2002 को ओवल में खेले गए इस मैच से सचिन 100वां टैस्ट खेलने वाला सबसे कम उम्र का खिलाड़ी बन गया । सचिन के क्रिकेट खेल की औपचारिक शुरुआत तभी हो गई जब 12 वर्ष की उम्र में क्लब क्रिकेट (कांगा लीग) के लिए उसने खेला ।
23 दिसम्बर 2012 को सचिन ने वन-डे क्रिकेट से संन्यास लिया और वहीँ 16 नवम्बर 2013 को मुम्बई के अपने अन्तिम टेस्ट मैच में उन्होंने 74 रनों की पारी खेलकर टेस्ट क्रिकेट से सन्यास लिया. तेंदुलकर ने अपने कैरियर में 200 टेस्ट मैचों में 53.79 के बल्लेबाजी औसत के साथ 15921 रन बनाये जिसमे उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 246* रन था और वही उनके नाम 51 शतक और 68 अर्धशतक दर्ज है। गेदबाजी में उन्होंने 46 विकेट लिए. वही वनडे मैचों में सचिन ने 463 मैचों में 44.83 के बल्लेबाजी औसत के साथ 18426 रन बनाये जिसमे उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 200* रन था वही उनके नाम 49 शतक और 96 अर्धशतक दर्ज है.।उन्होंने वनडे मैचों में अपनी गेदबाजी से टीम के लिए 154 विकेट भी लिये।
वर्ल्ड रिकॉर्ड :
1) मीरपुर में बांग्लादेश के खिलाफ १०० वाँ शतक किया।
2) एकदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट के इतिहास में दोहरा शतक जड़ने वाले पहले खिलाड़ी बने।
3) एकदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मुक़ाबले में सबसे ज्यादा (१८००० से अधिक) रन बनाये।
4) एकदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मुक़ाबले में सबसे ज्यादा ४९ शतक किये।
5) एकदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय विश्व कप मुक़ाबलों में सबसे ज्यादा रन।
6) सचिन तेंदुलकर ने टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा (51) शतक
7) ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ५ नवम्बर २००९ को १७५ रन की पारी मे एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में १७ हजार रन पूरे करने वाले पहले बल्लेबाज बने।
8) सचिन तेंदुलकर का टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक रनों का कीर्तिमान।
9) टेस्ट क्रिकेट १३००० रन बनने वाले विश्व के पहले बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर।
10) एकदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मुक़ाबले में सबसे ज्यादा मैन ऑफ द सीरीज।
11) एकदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मुक़ाबले में सबसे ज्यादा मैन ऑफ द मैच।
12) अन्तर्राष्ट्रीय मुक़ाबलो में सबसे ज्यादा ३०००० रन बनाने का कीर्तिमान।
रोचक तथ्य :
• बचपन में सचिन fast bowler बनना चाहते थे
• सचिन 1987 में India और Zimbabwe के बीच होने वाले मैच में ball boy बने .
• सचिन में एक मैच में पाकिस्तान के किये फील्डिंग की. हाँ आपने बिलकुल सही सुना सचिन ने एक दिन प्रैक्टिस मैच में १९८८ में Brabourne Stadium में पाकिस्तान के लिए फील्डिंग की .
• पाकिस्तान में अपने पहले मैच में सचिन ने सुनील गावस्कर से मिले हुए Pad पहने .
• सचिन सीधे हाथ से खेलते हैं पर लिखने के लिए उलटे हाथ का उपयोग करते हैं.
• सचिन को Rajiv Gandhi Khel Ratna, Arjuna Award and Padma श्री और भारत रत्न अवार्ड्स मिले हैं.
• सचिन को सोते में चलने और बोलने की आदत है .
• सचिन को 1990 में champagne की बोतल मिले भी मिली जब उन्होंने मन ऑफ़ थे मैच मिला . पर उन्हें उसे खोलने की अनुमति नहीं थी क्योकि उनकी उम्र 18 साल से कम थी .
पुरूस्कार :
• 1994 – अर्जुन पुरस्कार, खेल में उनके उत्कृष्ट उपलब्धि के सम्मान में भारत सरकार द्वारा
• 1997-98 – राजीव गांधी खेल रत्न, खेल में उपलब्धि के लिए दिए गए भारत के सर्वोच्च सम्मान
• 1999 – पद्मश्री, भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार
• 2001 – महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार, महाराष्ट्र राज्य के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार
• 2008 – पद्म विभूषण, भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार
• 2014 – भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार
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महेश भूपति एक भारत के पेशेवर टेनिस खिलाड़ी हैं। लिएंडर पेस के साथ मिलकर उन्होंने तीन डबल्स खिताब जीते हैं जिनमें 1999 का विबंलडन का खिताब भी शामिल है। साल 1999 भूपति के लिए स्वर्णिम वर्ष साबित हुआ क्योंकि इसमें उन्होंने अमेरिकी ओपन मिश्रित खिताब जीता और फिर लिएंडर पेस के साथ रोलां गैरां और विंबलडन समेत तीन युगल ट्राफी अपने नाम की। वह और पेस सभी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंटों के फाइनल में पहुंचने वाली पहली युगल जोड़ी बने थे। साल 1999 में ही दोनों को युगल की विश्व रैंकिंग में पहली भारतीय टीम बनने का गौरव हासिल हुआ। ओपन युग में 1952 के बाद यह पहली उपलब्धि थी। हालांकि बीच के सालों में महेश भूपति और लिएंडर पेस के बीच कुछ मतभेद हो गए जिसकी वजह से दोनों ने एक-दूसरे के साथ खेलना बंद कर दिया पर 2008 बीजिंग ओलंपिक्स के बाद से उन्होंने पुनः साथ-साथ खेलना शुरू कर दिया।
महेश भूपति का जन्म 7 जून 1974 को मद्रास में हुआ। 14 वर्ष की उम्र में अंतराष्ट्रीय टेनिस करियर की शुरुआत करने वाले भूपति ने अपनी मेहनत से टेनिस में कई खिताब अपने नाम किए। महेश भूपति ने 1999 का फ्रेंच ओपन और विम्बलडन का ग्रैंड स्लेम का डबल का खिताब लिएंडर पेस के साथ जोड़ी बनाकर जीता। 2001 में भी उन्होंने लिएंडर पेस के साथ साथ जोड़ी बनाकर फ्रेंच ओपन के खिताब पर कब्जा किया।
लिएंडर पेस मतभेदों के बाद उन्होंने बेलारूस के मैक्स मिरनी के साथ जोड़ी बनाकर 2002 का यूएस ओपन का खिताब जीता। मिक्स डबल्स में भी उन्होंने 8 ग्रैंड स्लेम खिताब अपने नाम किए हैं। इनमें 2009 ऑस्ट्रेलियन ओपन और 2012 फ्रेंच ओपन में उनकी जोड़ीदार सानिया मिर्जा थी। 2008 के ऑस्ट्रेलियन ओपन में यह जोड़ी रनरअप रही थी।
लिएंडर ने 1996 में भूपति के साथ युगल वर्ग का ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने की भविष्यवाणी की थी, तब उसका अच्छा-खासा मजाक बनाया गया और उसे छोटा मुंह बड़ी बात कहा गया क्योंकि उस समय इनकी जोड़ी विश्व क्रम में 80वें क्रम पर थी । परन्तु दोनों ने हिम्मत नहीं हारी और सफलता के शिखर पर चढ़ते चले गए । इसके पूर्व किसी भारतीय जोड़ी का एक या दो चक्र जीतना ही बहुत बड़ी बात समझी जाती थी । परन्तु लिएंडर और महेश भूपति की जोड़ी ने आठ ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंटों में से सात के सेमीफाइनल में प्रवेश किया, फिर उसके बाद पेस की कही बात सच साबित हुई जब इस युगल जोड़ी ने 1999 के फ्रेंच व विंबलडन खिताब जीते । ग्रैंड स्लैम के पहले पड़ाव आस्ट्रेलियाई ओपन में भी वह फाइनल में कड़े संघर्ष में हारी ।
महेश भूपति के बारे में कहा जाता है कि वह लिंएडर पेस के विपरीत अन्तर्मुखी व संवेदनशील इंसान हैं । उस में जबर्दस्त पेशेवर परिपक्वता है ।
महेश भूपति का पूरा नाम महेश श्रीनिवास भूपति है । उसकी रैंक युगल युगल खेल में नम्बर 1 है । उसके शौक नेट-सर्फिंग और क्रिकेट खेलना है ।
1994-1995 में मिसीसिपी यूनीवर्सिटी में उसका दो वर्ष का शानदार कैरिया रहा । उसने ऑल अमेरिका का एकल व युगल खिताब 1995 में जीता । अली हमदेह के साथ जोड़ी बनाकर 1995 में एन.सी.सी.ए. की युगल चैंपियनशिप जीती ।
शादी
महेश भूपति साल 2011 में लारा दत्ता के साथ शादी के बंधन में बंध गय। उनकी एक बेटी भी है-सायरा भूपति।
उपलब्धियां :
महेश ने 1991 में भारत का प्रतिनिधित्व किया 1992 की विबंलडन जूनियर डबल्स चैंपियनशिप में वह फाइनल में पहुंचे | इसी वर्ष उस चीनी ब मलेशियन सेटेलाइट प्रतियोगिता जीती ।
1994 में अमेरिकन कालिजस्ट टूर्नामेंट जीता । उसी वर्ष इण्डोनेशियन ओपन की एकल चैंपियनशिप जीती । 1994 व 1995 में वह राष्ट्रीय चैंपियन बना | 1995 में डेविस कप में हांगकाग के विरुद्ध खेला ।
1995 में अरूबा चैलेंजर में पेस के साथ युगल खिताब जीता ।
1996 में पांच चैलेंजर युगल खिताब जीते ।
1997 में जापान की राकी हिराकी के साथ फ्रेंच ओपन जीतने के साथ अपना ग्रैंड स्लैम का खिताबी सफर शुरू किया ।
1997 में पेस के साथ खेलते हुए सात में छह ए. टी. सी. युगल खिताब पर कब्जा किया । जिससे इस युगल ने ए. टी. पी. विश्व डबल्स कप के लिए क्वालीफाई कर लिया । फाइनल में हार लीच स्टार्क से और टीम रैकिंग में पेस के साथ चौथे नम्बर पर रहे तथा एकल रैंकिंग में 11वें नम्बर पर रहे |
1997 में ही रोलैन्ड गैरर्स में मिश्रित युगल खिताब जीता । चिली की सिबर्सरीन को हरा कर भारत को डेविस कप में 3-2 से विजय दिलाई |
1998 में लॉस एंजोलिस में युगल चैंपियनशिप जीती |
1998 में 98 विश्व ग्रुप में 6-2 के रिकार्ड के साथ युगल
मुकाबले में फाइनल में पहुंचे और ए. टी. पी. विश्व युगल चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई किया ।
1999 का वर्ष उनके कैरियर का सर्वश्रेष्ठ वर्ष रहा जिसमें उन्होंने 1999 में तीन युगल खिताब जीते जिसमें रोलैण्ड गैरोस और विबंलडन शामिल है । इस वर्ष लिएंडर व भूपति की जोड़ी भारत की पहली जोड़ी बनी जो चारों ग्रैंड स्लैम मुकाबलों के फाइनल में पहुंची । 26 अप्रैल को इस जोड़ी की रैकिंग में नम्बर एक स्थान मिला । इस जोड़ी ने फ्रेंच व विबंलडन खिताब भी जीता ।
1999 में ही यह जोड़ी यू. एस. ओपन व आस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में पहुंची | यह जोड़ी ए. टी. पी. वर्ल्ड चैंपियनशिप के में फाइनल में हार गई ।
1999 के नवम्बर माह में भूपति की कंधे की सर्जरी की गई । बड़े-बड़े मुकाबले जीतने के कारण इस जोडी को 6,18,004 डालर की राशि पुरस्कार में मिली ।
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लिएंडर पेस भारत के व्यावसायिक टेनिस खिलाड़ी हैं जो आजकल युगल एवं मिश्रित युगल मुकाबलों में भाग लेते हैं। वह भारत के सफलतम खिलाड़ियों में से एक हैं। उन्होंने कई युगल एवं मिश्रित युगल स्पर्धायें जीती हैं। उनको भारत का खेल जगत में सबसे ऊँचा पुरस्कार राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार 1996-1997 में दिया गया और साथ ही २००१ में पद्म श्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 2014 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
युगल मैचों के अलावा उन्होंने डेविस कप टेनिस स्पर्धा में भारत के लिये कई यादगार जीतें हासिल की और 1996 अटलांटा ओलम्पिक में कांस्य पदक जीता।
लिएंडर पेस पुरुष डबल्स तथा मिक्सड डबल्स के सर्वाधिक सफल खिलाड़ियों में से एक हैं । उनका जन्म गोवा में हुआ था और पालन-पोषण कलकत्ता में हुआ । उनकी मां जेनिफर पेस 1980 में भारतीय बास्केट बॉल टीम की कैप्टेन थी और उनके पिता डा. वैस अगापितो पेस हॉकी के मिड-फील्डर थे और 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में भारतीय टीम के सदस्य थे, जिसने कांस्य पदक जीता था ।
उसकी स्कूली शिक्षा मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, हायर सेकेंड्री स्कूल से हुई । उसका निवास स्थान भारत में कलकत्ता तथा अमेरिका के फ्लोरिडा में ऑरलेन्डो है । वह सीधे हाथ का खिलाड़ी है ।
लिएंडर ने 7 वर्ष की आयु में टेनिस सीखना आरम्भ कर दिया था और खेल की बेसिक जानकारी साउथ क्लब, कलकता से आरम्भ की ।
उसने 1985 में मद्रास की ब्रिटेनिया टेनिस एकेडेमी में प्रशिक्षण आरम्भ कर दिया और उनकी कोचिंग दबे-ओ-मियरा ने की । पेस ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति 1990 में अर्जित की जब उन्होंने विंबलडन जूनियर का खिताब जीता और जूनियर विश्व रैंकिंग में नम्बर एक खिलाड़ी बन गए ।
इसके पूर्व 14 वर्ष से कम आयु वर्ग की राइस बाउल चैंपियनशिप उन्होंने 1987 में हांगकांग में जीती । 2 वर्ष बाद 16 से कम आयु वर्ग की प्रतियोगिता भी उन्होंने जीती । उन्होंने जूनियर व सीनियर राष्ट्रीय चैंपियन का खिताब भी हासिल किया ।
जब पूरी दुनिया के शीर्ष-खिलाड़ी डेविस कप के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं तब लिएंडर ने दिखाया कि अपने देश के लिए खेलना कितने गर्व की बात है । उन्हें सर्किट के डबल्स खिलाड़ी के रूप में जाना जाता है ।
ITF जूनियर का खिताब पाने के बाद इन्हें भारतीय डेविस कप में प्रवेश मिला ,जिसमे हारकर भी इन्होने अच्छे खेल का प्रदर्शन किया | 1990 में इन्होने अफ्रीका के मार्कोस ओदृश्का को 7-5 , 2-6 ,6-4 से हराकर खिताब अपने नाम किया | हालांकि सीनियर वर्ग प्रतियोगिताओ में ये डेविस कप मुकाबलों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते रहे किन्तु लिएंडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी ने ग्रैंड स्लैम का खिताब जीतकर विश्व में नम्बर वन की वरीयता हासिल की | पेस और भूपति ने 1995 में जोड़ी बनाकर खेलना शुरू किया | 1997 में धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए न केवल ATP खिताब जीता बल्कि विश्व की चौथी वरीयता क्रम में जा पहुचे |
1998 में इन्होने दुहा ,इटली ,शंघाई की युगल स्पर्धाओं में खिताब जीतकर 3 ग्रांड स्लैम ऑस्ट्रेलियाई , अमेरिकी और फ्रेंच के सेमीफाइनल में पहुचे | 1997 में विंबलडन में भी सेमीफाइनल में इन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था | दुर्भाग्यवश इनकी जोड़ी आपसी मतभेदों की वजह से कुछ समय के लिए अलग हो गयी थी किन्तु फिर भी देश के लिए इन्होने अपने मतभेदों को दरकिनार कर पुन: खेलना शुरू किया | आज भी मिक्स डबल की प्रतियोगिताओ में पेस और भूपति खेलते हुए देश का नाम रोशन कर रहे है |
पेस 1996 में एटलांटा ओलम्पिक्स में कांस्य पदक जीतकर भारत के लिए ओलम्पिक पदक जीतने वाले वे दूसरे खिलाड़ी बन गए। इस जीत के बाद लिएंडर पेस की महेश भूपति के साथ जोड़ी के रूप में अपने करियर को आगे बढ़ाया। पेस-भूपति की जोड़ी भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि साबित हुई। पेस-भूपति ने साथ मिलकर भारत और भारत के बाहर कई महत्वपूर्ण मुकाबलों में जीत हासिल की।
लिएंडर पेस को टेनिस में अपने योगदान के लिए 1996 में भारत के गौरवपूर्ण राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड और 2001 में पद्मश्री अवॉर्ड से नवाजा गया।
आर्थिक उपलब्धियां
अनेक खिताब जीतने पर उन्हें बड़ी धनराशि पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हुई। चूंकि यह खिताब पेस और महेश ने डबल्स में जीते अत: पुरस्कार राशि भी दोनों को सम्मिलित रूप से प्राप्त हुई है। उन्हें विबंलडन का युगल खिताब जीतने पर एक लाख 86 हजार 420 पौंड स्टर्लिंग की राशि प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त लिएंडर को लिसा रेमंड के साथ मिश्रित युगल का खिताब जीतने पर 79,180 पौंड स्टर्लिग की राशि मिली। फ्रेंच ओपन के युगल खिताब के लिए पेस व भूपति को कुल मिलाकर 2 लाख 68 हजार डालर की राशि प्राप्त हुई। वर्ष के पहले ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट आस्ट्रेलियाई ओपन के फाइनल में पहुंचने से ही दोनों को लगभग 55 लाख डालर की राशि प्राप्त हुई।
इस प्रकार अकेले लिएंडर पेस को 1999 के तीनों ग्रैंड स्लैम टूर्नामेटों में लगभग 1 करोड़ 60 लाख रुपये की राशि मिली। 1996 तक इस जोड़ी की टेनिस से कुल आमदनी लगभग पांच लाख डालर से भी कम थी लेकिन 1997 से 1999 के बीच दोनों ने लगभग 25 लाख डॉलर की कमाई की।
लिएंडर पेस व महेश की जोड़ी ने विज्ञापनों से भी अच्छी आय अर्जित की। पेप्सी, एडिडास, आई.टी.सी. जैसी कम्पनियों ने इनके ग्रैंड स्लैमों में अच्छे प्रदर्शन के कारण ही अच्छा सहयोग दिया। फिर सियाराम ग्रुप की माडलिंग से भी इन्होंने अच्छी कमाई की।
2004 में लिएंडर पेस तथा महेश भूपति की जोड़ी ने टोरंटो (कनाडा) में 25 लाख डालर के ए.टी.पी. टेनिस मास्टर सीरीज में युगल खिताब जीता। पेस-भूपति ने एक साथ खेलते हुए यह 23वां खिताब जीता।
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अंजलि भागवत का जन्म 5 दिसंबर 1969 को हुआ था, वह मुंबई में एक कोंकणी परिवार से है। महान एथलीट कार्ल लुईस से प्रेरित होकर, भागवत ने खेल में रूचि विकसित की राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) में कैडेट के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान शूटिंग के दौरान उनका पहला ब्रश हुआ। जूडो कराटे और उन्नत पर्वतारोहण के एक छात्र, भागवत एनसीसी के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षित थे। वह मुंबई में कीर्ति महाविद्यालय में मुख्य रूप से एनसीसी के करीबी रिश्ते के साथ जुड़ गई। अपने पाठ्यक्रम के एक हिस्से के रूप में उन्हें एमआरए (महाराष्ट्र राइफल एसोसिएशन) में मिला। उसने 21 वर्ष की उम्र में शूटिंग शुरू कर दी और बंदूक रखने के 7 दिनों के भीतर, उन्होंने 1988 में नेशनल चैम्पियनशिप में हिस्सा लिया, इस प्रक्रिया में महाराष्ट्र के लिए रजत पदक जीता।
विवाह
अंजलि के पति मंदार भागवत उन्हें पूरा सहयोग देते हैं। अंजलि की सुन्दर नाकनक्श को देखकर उनके घर विज्ञापन तथा फिल्मों के ऑफर भी आए थे। इस बारे में अंजलि बताती हैं, मलयालम फिल्म निदेशक जयराज ने मुझे बुलाकर कहा था कि उनके पास मेरे लिए एक फिल्म की स्क्रिप्ट है। मैंने उसे हंस कर टाल दिया। मेरे पास फिल्मों की शूटिंग के लिए वक्त नहीं है, मैं अपनी शूटिंग में ही व्यस्त हूँ।" अंजलि का विवाह वर्ष 2000 में मंदार के साथ हुआ था। अंजलि का कहना था कि विवाह के वक्त मंदार खुश थे कि मेरी पत्नी 9 से 5 बजे तक की नौकरी नहीं करती। इसीलिए मैं भी उत्साहित थी। हमारी तीन मुलाकातों के बाद हमने एक दूसरे को हां कह दिया। लेकिन तभी मैं चैंपियनशिप के लिए बाहर चली गई और डेढ़ माह के पश्चात् लौटी। तब मुझे डर लग रहा था कि लौटते वक्त एयरपोर्ट पर मंदार को कैसे पहचानूंगी। वैसे मैं घर पर सभी घरेलू काम बखूबी निभाती हूं। अंजलि के पति मंदार की इच्छा है कि उनकी पत्नी सुर्खियों में छाई रहेंं और देश का नाम रोशन करें।
अंजलि भागवत केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में खेल कोटे के अन्तर्गत इंस्पेक्टर पद पर कार्यरत हैंं। अंजलि को विश्वास है कि क्रिकेट की भांति एक दिन शूटिंग का खेल भी दर्शकों में लोकप्रिय होगा। 2000 के सिडनी ओलंपिक में फाइनल में जगह बनाने वाली अंजलि पहली महिला शूटर हैं। फाइनल में आठ प्रतियोगियों के बीच वह मात्र 493.1 अंक बना कर अंतिम स्थान पर रहीं। वह नियमित रूप से योगाभ्यास, मानसिक व्यायाम, श्वास सम्बन्धी व्यायाम व शूटिंग अभ्यास करती हैं। वह स्त्री होने पर गर्व महसूस करती हैं।
उपकरण और प्रायोजक
भागवत अपने एयर राइफल कार्यक्रमों के लिए एक जर्मन निर्मित राइफल फेंवेरकेबाउ का उपयोग करता है। 10 मीटर के लिए वह एक फ़िनवेर्करबाउ पसंद करती है, जबकि 50 मीटर के लिए वह एक .22 वाल्थर का उपयोग करती है।
भागवत की पहली किट उन्हें बॉलीवुड अभिनेता और एक साथी शूटर नाना पाटेकर ने 1 99 3 में भेंट की थी। वह 2000 में हिंदुजा फाउंडेशन द्वारा आधिकारिक तौर पर प्रायोजित थी, और बाद में 2008 में मित्तल चैंपियंस ट्रस्ट द्वारा प्रायोजित किया गया। हुंडई निगम ने 2004 से पहले उनकी प्रशिक्षण का समर्थन किया ।
उपलब्धियां
1992 में अंजलि को शिव छत्रपति अवार्ड दिया गया |
1993 में अंजलि को ‘महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार’ देकर सम्मानित किया गया |
वर्ष 2001 में कशाबा जाधव अवार्ड दिया गया ।
वर्ष 2002 में अंजलि को अमेरिकन सोसायटी की ओर से ”यंग एचीवर” अवार्ड दिया गया |
वर्ष 2003 में उसे ‘महाराष्ट्र शान’ पुरस्कार दिया गया ।
वर्ष 2000 में अजंलि को सर्वाधिक महत्वाकांक्षी पुरस्कार-‘अर्जुन पुरस्कार’ प्रदान किया गया ।
आई.एस.एस.एफ. रेटिंग के अनुसार अजंलि काफी समय तक 10 मी. एयर राइफल स्पर्धा में महिलाओं में एक नम्बर स्थान (रैंक 1) रही |
वर्ष 2002 में सिडनी विश्व कप में 397/400 अंक पर अजंलि ने रजत पदक प्राप्त किया |
वर्ष 2002 में ही अटलांटा विश्व कप में अजंलि ने अपना रिकार्ड सुधारते हुए 399/400 का का स्कोर बनाकर रजत पदक जीता ।
म्यूनिख वर्ल्ड कप 2002 में अंजलि ने रजत पदक हासिल किया और इस में पदक जीत कर अजंलि ने यह पदक जीतने वाली प्रथम भारतीय शूटर होने का गौरव हासिल किया ।
यहां अंजलि ने ‘चैंपियंस ट्राफी’ जीती और उसे वर्ष 2002 का ‘‘चैंपियन ऑफ चैंपियंस’‘ घोषित किया गया । एयर राइफल के महिला, पुरुष व मिश्रित श्रेणी में उसे इस पुरस्कार के लिए चुना गया ।
जनवरी 2002 में अजंलि ने डेन हेग एयर वेपन चैंपियनशिप में विश्व रिकार्ड की बराबरी करते हुए चार स्वर्ण, सात रजत व एक कांस्य पदक जीते ।
वर्ष 2000 में वह सिडनी ओलंपिक में पहले प्रयास में ओलंपिक फाइनल में पहुंचने वाली प्रथम भारतीय शूटर बन गई
वर्ष 2002 में मानचेस्टर राष्ट्रमडल खेलों में 4 स्वर्ण पदक जीते । ये पदक उसने व्यक्ति व पेयर स्पर्धाओं (एयर राइफल, स्माल बोर राइफल थ्री पोजीशन) प्राप्त किए ।
‘सैमसंग इंडिया’ ने उसे ओलंपिक के लिए स्पांसर किया था |
वर्ष 2005 में हीरो होंडा स्पोर्ट्स अकादमी ने शूटिंग की वर्ष 2004 की श्रेष्ठतम खिलाड़ी के रूप में नामांकित किया ।
वर्ष 2006 में मेलबर्न (आस्ट्रेलिया) में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में अजंलि ने पेयर्स स्पर्धा में रजत पदक प्राप्त किया ।
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