Biography (hindi)
जन्म 1982 को मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया में हुआ, उनका जन्म ही बिना हाथ और पैरो के हुआ था.कई डॉक्टर उनके इस विकार को सुधारने में असफल हुए. और आज भी निक अपना जीवन बिना हाथ और पैरो के ही जी रहे है. हाथ-पैरो के बिना प्रारंभिक जीवन बिताना उनके लिये काफी मुश्किल था. बचपन से ही उन्हें काफी शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था. लेकिन उन्होंने कभी अपने इस विकार से हार नही मानी, और हमेशा वे औरो की तरह ज़िन्दगी को जीने की कोशिश करते रहे.
निक को हमेशा आश्चर्य होता था की वे दुसरो से अलग क्यू है. वे बार-बार अपने जीवन के मकसद को लेकर प्रश्न पूछा करते थे और उनका कोई उद्देश्य है या नही ये प्रश्न भी अक्सर उन्हें परेशान करता था.
निक के अनुसार, आज उनकी ताकत और उनकी उपलब्धियों का पूरा श्रेय भगवान पर बने उनके अटूट विश्वास को ही जाता है. उन्होंने कहा है अपने अब तक के जीवन में जिनसे भी मिले फिर चाहे वह दोस्त हो, रिश्तेदार हो या सहकर्मी हो, उन सभी ने उन्हें काफी प्रेरित किया.
19 साल की आयु में अपने पहले भाषण से लेकर अब तक निक पुरे विश्व की यात्रा कर रहे है और अपनी प्रेरणादायी घटनाओ से लोगो को प्रेरित कर रहे है. विश्व भर में आज निक के करोडो अनुयायी है, जो उन्हें देखकर प्रेरित होते है. आज युवावस्था में भी उन्होंने बहोत से पुरस्कार हासिल किये है. आज वे एक लेखक, संगीतकार, कलाकार है और साथ ही उनको फिशिंग, पेंटिंग और स्विमिंग में भी काफी रूचि है.
आत्मनिर्भर बनने की जिद्द
निक के माता-पिता उसे हर तरह से आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। छोटी उम्र से ही निक के माता-पिता उसे पानी के तैरना सिखाने लगे। छह साल की उम्र में उसे पंजे की सहायता से टाइप करना सिखाने लगे। विशेषज्ञों की मदद से उन्होंने निक के लिए प्लास्टिक का ऐसा डिवाइस बनवाया जिनकी सहायता से निक ने पैंसिल व पैन पकड़ना व लिखना सीखा।
निक के माता-पिता ने निक को स्पेशल स्कूल में भेजने से मना कर दिया। वो चाहते थे कि निक सामान्य स्कूल में सामान्य बच्चों के साथ ही पढ़े। इसमें बहुत सी मुश्किलें आईं लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। सामान्य बच्चों के साथ पढ़ने-लिखने और काम करने का ये लाभ हुआ कि निक उन्हीं की तरह काम करने लगे
बदली जीवन की दिशा
जब निक तेरह साल के थे तो एक दिन उनकी माँ ने अख़बार में प्रकाशित एक लेख निक को पढ़कर सुनाया जिसमें एक विकलांग व्यक्ति के संघर्ष और सफलता की कहानी थी। निक को अहसास हुआ कि दुनिया में वो अकेला विकलांग नहीं है और परिश्रम व संघर्ष द्वारा आगे बढ़ा जा सकता है। उसके बाद उसके जीवन की दिशा ही बदल गई। उसे महसूस हुआ कि ईश्वर ने उसे कुछ अलग करने के लिए ही ऐसी स्थिति में डाला है। उसे तो स्वयं प्रेरणा व प्रोत्साहन की ज़रूरत थी लेकिन उसने संकल्प लिया कि वो स्वयं लोगों को प्रेरणा व प्रोत्साहन प्रदान करेगा जिससे लोगों में व्याप्त निराशा व अकर्मण्यता दूर हो सके और वे उत्साहपूर्वक कार्य करते हुए अच्छी तरह से जीवन व्यतीत कर सकें।।
करियर
उन्होंने Queensland में 'Griffith University' से Bachelor's Degree in accounting and financial planning में उपाधि हासिल की
जब निक 17 साल के हुए, उसने अपने चर्च समूह में भाषण देना शुरू किया।एक वक्ता के रूप में, वह मुख्य रूप से स्कूल के बच्चे,युवा वयस्कों और कामकाजी पेशेवरों को संबोधित करते है।उन्होंने दुनियाभर के विविध चर्चो में संबोधित किया,क्योंकि उनका मानना है कि ईसा मसीह उससे प्यार करते है। 2008 में निक ने अमेरिका के एक TV Show 20/20 के लिए Interview दिया। 2009 में निक 'The butterfly circus' इस Short film में काम किया।इस film को कई Award मिले।2010 में निक ने "Life without limits: Inspiration for a ridiculously good life" नाम की किताब लिखी। अब तक वे 7 किताब लिख चुके है।
निक ने किया आत्महत्या का प्रयास
मित्रों, परेशानियाँ तो एक अच्छे-ख़ासे स्वस्थ व्यक्ति को तोड़कर रख देती हैं। निक को पढ़ाई, खेल-कूद व अपना रोज़मर्रा का काम करने में बड़ी परेशानी होती थी। स्कूल में बच्चे भी उसका मज़ाक़ उड़ाते थे। इन सब चीज़ों से मायूस व दुखी होकर दस वर्ष की उम्र में एक बार निक ने पानी के टब में डूबकर आत्महत्या तक करने की कोशिश की लेकिन उसके माता-पिता के प्यार और प्रोत्साहन ने उसे आगे बढ़ने का हौसला प्रदान किया।
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परमवीर मेजर शैतान सिंह (1 दिसम्बर 1924 तथा मृत्यु 18 नवम्बर 1962) एक भारतीय सेना के एक अधिकारी थे। इन्हें मृत्यु के पश्चात परमवीर चक्र का सम्मान दिया गया।इनका निधन 1962 के भारत-चीन युद्ध में हुआ था , इन्होंने अपने वतन के लिए काफी संघर्ष किया लेकिन अंत में शहीद हो गये तथा भारत देश का नाम रौशन कर गये।
मेजर शैतानसिंह भाटी का जन्म 1 दिसंबर 1924 को जोधपुर (राजस्थान) में हुआ। उनके पिता हेमसिंह भाटी भी सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल थे। 1962 में भारत-चीन युद्ध में मेजर शैतान सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा। 13 कुमायूं सी कंपनी के मेजर शैतान सिंह रेजांग ला मोर्चे पर चीनी सेना का बहादुरी से मुकाबला करते रहे और 18 नवंबर 1962 को शहीद होने से पहले तक भी वे चुशूर सेक्टर में 17 हजार फुट की ऊंचाई पर चीन की गोला-बारूद से लैस भारी सेना का डटकर मुकाबला करते रहे।
एक स्थिति में जब सिंह दुश्मन से घिर गए, तब भी उन्होंने बहादुरी से मुकाबला करते हुए अपनी टुकड़ी को संगठित कर ठिकानों पर तैनात किया और उनका हौसला बढ़ाया, लेकिन जब दुश्मन की एक गोली उनकी बांह में लगी और उनका पैर भी जख्मी हो गया, तो उन्होंने सैनिकों को खुद को वहीं छोड़ने और दुश्मन का सामना करने का आदेश दिया। दुश्मन से लड़ते हुए एक-एक कर मेजर के जवान शहीद हो गए। बर्फ से ढंके उस क्षेत्र में मेजर सिंह का मृत शरीर 3 महीने बाद युद्धक्षेत्र में मिल पाया। मरणोपरांत शैतानसिंह को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
सैन्य कार्रवाई
1962 में चीन-भारतीय युद्ध में, शैतान सिंह की अगुवाई वाली 13 वीं कुमाऊं बटालियन की 'अहिर' कंपनी ने रेजांग ला में यह महत्वपूर्ण स्थान रखे, जो लद्दाख में चुशुल घाटी के दक्षिण-पूर्व दृष्टिकोण पर एक पास है। जम्मू और कश्मीर, 5,000 मीटर की ऊंचाई पर (16,404 फुट)। कंपनी क्षेत्र को तीन पट्टों की स्थिति से बचाव किया गया था और आसपास के इलाके को बाकी बटालियन से अलग कर दिया गया था। रेजांग ला पर चीनी हमले की उम्मीद 18 नवंबर को सुबह आई थी। यह बहुत ठंडा शीतकालीन रात का अंत था, हल्की बर्फ गिरने के साथ। रेज़ांग ला के माध्यम से बर्फीले हवाओं को काटने और बेंबलिंग पतली हवा और ठंड से अधिक, रेजांग ला के स्थान को अधिक गंभीर खामी था। यह एक हस्तक्षेप करने वाली सुविधा के कारण भारतीय तोपखाने से बना था, जिसका मतलब था कि उन्हें बड़े बंदूकों के सुरक्षात्मक आराम के बिना बनाना पड़ता था। सुबह की मंद रोशनी में, चीनी नंबर 7 और नं .8 प्लाटून पदों पर हमला करने के लिए नल्ला के माध्यम से आगे बढ़ते देखा गया।
चीनी हमलावरों का सामना करने के लिए भारतीय सेना के सैनिकों की तैयारी की स्थिति पर गिर गया। 05:00 को जब दृश्यता में सुधार हुआ तो दोनों पक्षियों ने राइफल्स, लाइट मशीनगनों, ग्रेनेड और मोर्टारों के साथ बढ़ते चीनी पर खुले हुए हैं। भारतीय तोपखाने का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। नालों मृत शरीर से भरे थे बचे हुए और मृत शरीर चीनी, हालांकि वे पहले ललाट हमले में विफल रहे, निराश नहीं हुए थे। उन्होंने 05:40 के बारे में तीव्र तोपखाने और मोर्टार फायर के लिए भारतीय पदों का पालन किया।
भारत चीन युद्ध
जून 1962 में चीन-भारत युद्ध के दौरान 13 कुमायूं बटालियन चुशूल सेक्टर में तैनात थी। उस ब्रिगेड की कमान ब्रिगेडियर टी.एन. रैना संभाल रहे थे। अम्बाला से जब यह ब्रिगेड जम्मू कश्मीर पहुँची तो उन्होंने एक दम पहली बार बर्फ देखी। इसके पहले उन्होंने कभी पर्वतीय सीमा का अनुभव नहीं लिया था। अब उन्हें दुनिया के सबसे ज्यादा शीत प्रताड़ित क्षेत्र में लड़ना था। उनके सामने चीन की सेना सिनकियांग से थी, जो ऐसे युद्ध क्षेत्र में लड़ने की अभ्यस्त थी। चीन की सेना के पास सभी आधुनिक शास्त्र तथा भरपूर गोला-बारूद था, जबकि भरतीय सैनिकों के पास एक बार में एक गोली की मार करने वाली राइफलें थीं, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद बेकार घोषित कर दी गई थीं। मौसम की मार और हथियारों की इस स्थिति के बावजूद 13 कुमाँयू की 'सी कम्पनी के मेजर शैतान सिंह इस मनोबल से भरपूर थे कि उनके रेजांग ला के मोर्चे पर अगर दुश्मन हमला करता है तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। दुश्मन की ओर से सब तरफ आटोमेटिक बन्दूकों की तथा मोर्टार की घेरा बन्दी बनी हुई थी। चीनी फौजों ने अचानक हमला किया और सचमुच उसे भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। युद्ध भूमि दुश्मन के सैनिकों की लाशों से भर गई। उनके गुपचुप हमले का कुमायूंनी सतर्कता के कारण भारत को चल गया था। जब चीनी दुश्मन का अचानक हमला नाकाम हो गया तो उसने रेजांग ला पर मोर्टार तथा रॉकेटों से बंकरों पर गोलीबारी शुरू कर दी। ऐसे में किसी भी बंकर के बचे रहे जाने की सम्भावना नहीं थी फिर भी मेजर शैतान सिंह की टुकड़ी ने वहाँ से पीछे हटने का नाम नहीं लिया।
120 जवानों में से 114 शहीद
भारत के इन 120 जवानों में से 114 जवान शहीद हो गए, पांच जवानों को चीन ने युद्ध कैदी के तौर पर गिरफ्तार कर लिया. एक जवान बाद में बच निकलने में कामयाब रहे. वहीं एक सैनिक को मेजर शैतान सिंह ने वापस भेज दिया, ताकि वह पूरे घटनाक्रम को दुनिया के सामने बयान कर सके.मेजर शैतान भी घायल हो गए उनको बचाने के लिए एक सैनिक ने उनके जख्मी शरीर को अपने शरीर के साथ बांधा और पहाड़ों में लुढ़कते हुए उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर लेटा दिया, जहां उनकी मौत हो गई.
1963 की फरवरी में जब मेजर शैतान सिंह की बॉडी पाई गई, तब उनका पूरा शरीर जम चुका था और मेजर मौत के बाद भी अपने हथियार को मजबूती से थामे हुए थे.
मेजर शैतान को मिला परमवीर चक्र
शहीद होने के बाद परमवीर चक्र से नवाज़ा गया. मेजर शैतान सिंह और उनके 120 जवानों की याद में चुशुल के करीब रेज़ांगला में एक युद्ध-स्मारक बनवाया गया. हर साल 18 नवम्बर को इन वीर सिपाहियों को पूरा देश और सेना याद करना नहीं भूलती है. इसके अलावा ‘ए मेरे वतन के लोगों’ को लिखने वाले प्रदीप की प्रेरणा भी मेजर शैतान सिंह और उनके बहादुर साथी ही थे.

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जन्म 3 अप्रैल 1914 को पंजाब में स्थित अमृतसर में हुआ था, फील्ड मार्शल मानेकशॉ 1969 में भारतीय सेना के प्रमुख सेना अध्यक्ष बने और उनके आदेश के तहत, 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना ने एक शानदार जीत हासिल की।
वह फील्ड मार्शल का सर्वोच्च पद (रैंक) रखने वाले दो भारतीय सैन्य अधिकारियों में से एक हैं। उन्होंने चार दशकों तक सेना में रहकर सेवा की और द्वितीय विश्व युद्ध सहित पाँच युद्धों को भी अपने कार्यकाल में देखा। वह भारतीय सैन्य अकादमी (आई.एम.ए.) देहरादून में, 40 सैनिक छात्रों के पहले समूह में से एक थे, जहाँ से उन्होंने दिसंबर 1934 में अपनी सैन्य शिक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने पहली बार रॉयल स्कॉट्स में सेवा की और बाद में 4/12 फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट में भारतीय सेना के एक दूसरे साधिकार प्रतिनिधि के रूप में भी उन्होंने कार्य किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, मानेकशॉ ने एक कप्तान के रूप में 4/12 फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट के साथ मिलकर देश की सेवा की और बर्मा अभियान में भी हिस्सा लिया।
वह बर्मा में चल रहे अभियान के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गए थे और फिर ठीक होने के बाद, उन्होंने कर्मचारी महाविद्यालय (स्टाफ कॉलेज), क्वेटा में एक कोर्स किया, इस कोर्स को करने से पहले उन्हें पुन: बर्मा भेजा गया जहाँ वह फिर से घायल हो गए। 1947-48 के जम्मू और कश्मीर संचालन के दौरान उन्होंने अपनी रणनीतिक दक्षता का प्रदर्शन किया और बाद में उन्हें 8 गोर्खा राइफल्स का कर्नल बनाया गया और इससे पहले उन्हें इन्फैन्ट्री स्कूल का सेनानायक भी बनाया गया। उन्हें जीओसी-इन-सी पूर्वी कमान के तौर पर नियुक्त किया गया जहाँ उन्होंने नागालैंड में हो रहे विद्रोह को संभाला। 7 जून 1969 को वह सेना के 8वें मुख्य अधिकारी बने।
सैनिक जीवन
17वी इंफेंट्री डिवीजन में तैनात सैम ने पहली बार द्वितीय विश्व युद्घ में जंग का स्वाद चखा, ४-१२ फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट के कैप्टन के तौर पर बर्मा अभियान के दौरान सेतांग नदी के तट पर जापानियों से लोहा लेते हुए वे गम्भीर रूप से घायल हो गए थे।
स्वस्थ होने पर मानेकशॉ पहले स्टाफ कॉलेज क्वेटा, फिर जनरल स्लिम्स की 14वीं सेना के 12 फ्रंटियर राइफल फोर्स में लेफ्टिनेंट बनकर बर्मा के जंगलों में एक बार फिर जापानियों से दो-दो हाथ करने जा पहुँचे, यहाँ वे भीषण लड़ाई में फिर से बुरी तरह घायल हुए, द्वितीय विश्वयुद्घ खत्म होने के बाद सैम को स्टॉफ आफिसर बनाकर जापानियों के आत्मसमर्पण के लिए इंडो-चायना भेजा गया जहां उन्होंने लगभग 10000 युद्घ बंदियों के पुनर्वास में अपना योगदान दिया।
1946 में वे फर्स्ट ग्रेड स्टॉफ ऑफिसर बनकर मिलिट्री आपरेशंस डायरेक्ट्रेट में सेवारत रहे, भारत के विभाजन के बाद 1947-48 की भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947 की लड़ाई में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत की आजादी के बाद गोरखों की कमान संभालने वाले वे पहले भारतीय अधिकारी थे। गोरखों ने ही उन्हें सैम बहादुर के नाम से सबसे पहले पुकारना शुरू किया था। तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सैम को नागालैंड समस्या को सुलझाने के अविस्मरणीय योगदान के लिए 1968 में पद्मभूषण से नवाजा गया।
7 जून 1969 को सैम मानेकशॉ ने जनरल कुमारमंगलम के बाद भारत के 8वें चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का पद ग्रहण किया, उनके इतने सालों के अनुभव के इम्तिहान की घड़ी तब आई जब हजारों शरणार्थियों के जत्थे पूर्वी पाकिस्तान से भारत आने लगे और युद्घ अवश्यंभावी हो गया, दिसम्बर 1971 में यह आशंका सत्य सिद्घ हुई, सैम के युद्घ कौशल के सामने पाकिस्तान की करारी हार हुई तथा बांग्लादेश का निर्माण हुआ,
आजादी के बाद
विभाजन से जुड़े मुद्दों पर कार्य करते हुए मानेकशॉ ने अपने नेतृत्व कुशाग्रता का परिचय दिया और योजना तथा शासन प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। सन 1947-48 के जम्मू और कश्मीर अभियान के दौरान भी उन्होंने युद्ध निपुणता का परिचय दिया। एक इन्फेंट्री ब्रिगेड के नेतृत्व के बाद उन्हें म्हो स्थित इन्फेंट्री स्कूल का कमांडेंट बनाया गया और वे 8वें गोरखा राइफल्स और 61वें कैवेलरी के कर्नल भी बन गए। इसके पश्चात उन्हें जम्मू कश्मीर में एक डिवीज़न का कमांडेंट बनाया गया जिसके पश्चात वे डिफेन्स सर्विसेज स्टाफ कॉलेज के कमांडेंट बन गए। इसी दौरान तत्कालीन रक्षामंत्री वी. के. कृष्ण मेनन के साथ उनका मतभेद हुआ जिसके बाद उनके विरुद्ध ‘कोर्ट ऑफ़ इन्क्वारी’ का आदेश दिया गया जिसमें वे दोषमुक्त पाए गए। इन सब विवादों के बीच चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया और मानेकशॉ को लेफ्टिनेंट जनरल पदोन्नत कर सेना के चौथे कॉर्प्स की कमान सँभालने के लिए तेज़पुर भेज दिया गया।
सन 1963 में उन्हें आर्मी कमांडर के पद पर पदोन्नत किया गया और उन्हें पश्चिमी कमांड की जिम्मेदारी सौंपी गयी। सन 1964 में उन्हें ईस्टर्न आर्मी के जी-ओ-सी-इन-सी के तौर पर शिमला से कोलकाता भेजा गया। इस दौरान उन्होंने नागालैंड से आतंकवादी गतिविधियों का सफलता पूर्वक सफाया किया जिसके स्वरुप सन 1968 में उन्हें पद्म भूषण प्रदान किया गया।
जीत के जनक
1971 में इंदिरा गांधी के राजनीतिक नेतृत्व में सैम मानेकशॉ ने उस राष्ट्रीय अपमान को धो डाला जिसमें एक पाकिस्तानी फौजी 10-10 भारतीय फौजियों के बराबर होता है। इस फितूर के शिकार पाकिस्तानियों को पहली बार हकीकत का अहसास हुआ। यहां इस घटना का ज़िक्र प्रासंगिक होगा कि इंदिरा गांधी दिसंबर 1970 से क़रीब आठ महीने पहले फौजी कार्रवाई चाहती थीं। मानेकशॉ ने साफ़ मना कर दिया था क्योंकि निर्णायक जीत के लिए तब तक भारत की सशस्त्र सेनाएं तैयार नहीं थीं। पहली बार भारत की थल सेना, वायुसेना और नौसेना ने समन्वित कार्रवाई की। थल सेना ढाका की ओर बढ़ रही थी, तो नौसेना की मिसाइल बोटों के हमले से कराची बंदरगाह धू-धूकर जल रहा था। मानेकशॉ के कुशल सैनिक नेतृत्व का ही यह कमाल था। इंदिरा गांधी चाहती थीं कि एक तरफ बांग्लादेश बने और दूसरी तरफ पश्चिमी पाकिस्तान को इतना तबाह कर दिया जाए कि लंबे समय तक वह सिर न उठा सके। उनका आदेश था 'स्मैश पाक वॉर मशीन।' मानेकशॉ को भरोसा था कि वह इसे कर दिखाएंगे। यह संभव नहीं हो पाया क्योंकि सोवियत संघ ने इसके लिए मना कर दिया था। फौजी साजोसामान और सुरक्षा परिषद में वीटो के लिए सोवियत संघ पर निर्भर भारत अकेले पश्चिमी पाकिस्तान की कमर न तोड़ पाता। सोवियत संघ को अमेरिका और चीन ने संदेश दिया था कि भारत ने पश्चिमी पाकिस्तान में सैनिक कार्रवाई जारी रखी, तो वे हस्तक्षेप करेंगे। इंदिरा गांधी का राजनीतिक मिशन अधूरा रह गया। फिर भी मानेकशॉ के सैनिक नेतृत्व ने राष्ट्र को सर्वथा नया आत्मविश्वास दिया। याद करें, इससे पहले कब शत्रु सैनिकों ने इस तरह भारत के आगे घुटने टेके थे? सेल्यूकस की यूनानी सेना पर चंद्रगुप्त मौर्य की निर्णायक जीत के बाद शताब्दियों के इतिहास में दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।
निधन
मानेकशॉ का निधन 27 जून 2008 को निमोनिया के कारण वेलिंगटन (तमिल नाडु) के सेना अस्पताल में हो गया। मृत्यु के समय उनकी आयु 94 साल थी।
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दशरथ मांझी काफी कम उम्र में अपने घर से भाग गए थे और धनबाद की कोयले की खानों में उन्होनें काम किया। फिर वे अपने घर लौट आए और फाल्गुनी देवी / Falguni Devi से शादी की। अपने पति के लिए खाना ले जाते समय उनकी पत्नी फाल्गुनी पहाड़ के दर्रे में गिर गयी और उनका निधन हो गया। अगर फाल्गुनी देवी को अस्पताल ले जाया गया होता तो शायद वो बच जाती यह बात उनके मन में घर कर गई। इसके बाद दशरथ मांझी ने संकल्प लिया कि वह अकेले अपने दम पर वे पहाड़ के बीचों बीच से रास्ता निकालेगे और फिर उन्होंने 360 फ़ुट-लम्बा (110 मी), 25 फ़ुट-गहरा (7.6 मी) 30 फ़ुट-चौड़ा (9.1 मी)गेहलौर की पहाड़ियों से रास्ता बनाना शुरू किया। इन्होंने बताया, “जब मैंने पहाड़ी तोड़ना शुरू किया तो लोगों ने मुझे पागल कहा लेकिन इस बात ने मेरे निश्चय को और भी मजबूत किया। ”
उन्होंने अपने काम को 22 वर्षों (1960-1982) में पूरा किया। इस सड़क ने गया के अत्रि और वज़ीरगंज सेक्टर्स की दूरी को 55 किमी से 15 किमी कर दिया। माँझी के प्रयास का मज़ाक उड़ाया गया पर उनके इस प्रयास ने गेहलौर के लोगों के जीवन को सरल बना दिया। हालांकि उन्होंने एक सुरक्षित पहाड़ को काटा, जो भारतीय वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम अनुसार दंडनीय है फिर भी उनका ये प्रयास सराहनीय है। बाद में मांझी ने कहा,” पहले-पहले गाँव वालों ने मुझपर ताने कसे लेकिन उनमें से कुछ ने मुझे खाना दीया और औज़ार खरीदने में मेरी सहायता भी की।”
पहाड़-
मांझी के प्रयत्न का सकारात्मक नतीजा निकला। केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर उन्होंने अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट के एक सड़क बना डाली। इस सड़क ने गया के अत्रि और वज़ीरगंज सेक्टर्स की दूरी को 55 किमी से 15 किमी कर दी ताकि गांव के लोगो को आने जाने में तकलीफ ना हों। आख़िरकार 1982 में 22 वर्षो की मेहनत के बाद मांझी ने अपने कार्य को पूरा किया। उनकी इस उपलब्धि के लिए बिहार सरकार ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्म श्री हेतु उनके नाम का प्रस्ताव भी रखा। 22 साल की मेहनत:
पत्नी के चले जाने के गम से टूटे दशरथ मांझी ने अपनी सारी ताकत बटोरी और पहाड़ के सीने पर वार करने का फैसला किया. लेकिन यह आसान नहीं था. शुरुआत में उन्हें पागल तक कहा गया. दशरथ मांझी ने बताया था, 'गांववालों ने शुरू में कहा कि मैं पागल हो गया हूं, लेकिन उनके तानों ने मेरा हौसला और बढ़ा दिया'.
अकेला शख़्स पहाड़ भी फोड़ सकता है!
साल 1960 से 1982 के बीच दिन-रात दशरथ मांझी के दिलो-दिमाग में एक ही चीज़ ने कब्ज़ा कर रखा था. पहाड़ से अपनी पत्नी की मौत का बदला लेना. और 22 साल जारी रहे जुनून ने अपना नतीजा दिखाया और पहाड़ ने मांझी से हार मानकर 360 फुट लंबा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता दे दिया
वर्तमान संस्कृति में
फिल्म प्रभाग ने इन पर एक वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री) फिल्म " द मैन हु मूव्ड द माउंटेन" का भी 2012 में उत्पादन किया कुमुद रंजन इस वृत्तचित्र(डॉक्यूमेंट्री) के निर्देशक हैं। जुलाई 2012 में निदेशक केतन मेहता ने दशरथ माँझी के जीवन पर आधारित फिल्म मांझी: द माउंटेन मैन बनाने की घोषणा की। अपनी मृत्युशय्या पर, मांझी अपने जीवन पर एक फिल्म बनाने के लिए "विशेष अधिकार" दे दिया। 21 अगस्त 2015 को फिल्म को रिलीज़ किया गया।नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने माँझी की और राधिका आप्टे ने फाल्गुनी देवी की भूमिका निभाई है।मांझी के कामों को एक कन्नड़ फिल्म "ओलवे मंदार" (en:Olave Mandara) में जयतीर्थ (Jayatheertha) द्वारा दिखाया गया है।
मार्च 2014 में प्रसारित टीवी शो सत्यमेव जयते का सीजन 2 जिसकी मेजबानी आमिर खान में की, का पहला एपिसोड दशरथ माँझी को समर्पित किया गया।आमिर खान और राजेश रंजन भी माँझी के बेटे भागीरथ मांझी और बहू बसंती देवी से मुलाकात की मांझी की और वित्तीय सहायता प्रदान करने का वादा किया। हालांकि, 1 अप्रैल 2014 को चिकित्सीय देखभाल वहन करने में असमर्थ होने के कारण बसंती देवी की मृत्यु हो गयी। हाल ही में उसके पति ने ये कहा की अगर आमिर खान ने मदद का वादा पूरा किया होता तो ऐसा नहीं होता।
दुनिया से चले गए लेकिन यादों से नहीं!
दशरथ मांझी के गहलौर पहाड़ का सीना चीरने से गया के अतरी और वज़ीरगंज ब्लॉक का फासला 80 किलोमीटर से घटकर 13 किलोमीटर रह गया. केतन मेहता ने उन्हें गरीबों का शाहजहां करार दिया. साल 2007 में जब 73 बरस की उम्र में वो जब दुनिया छोड़ गए, तो पीछे रह गई पहाड़ पर लिखी उनकी वो कहानी, जो आने वाली कई पीढ़ियों को सबक सिखाती रहेगी.
निधन
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में पित्ताशय(गॉल ब्लैडर) के कैंसर से पीड़ित माँझी का 73 साल की उम्र में, 17 अगस्त 2007 को निधन हो गया। बिहार की राज्य सरकार के द्वारा इनका अंतिम संस्कार किया गया। बाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गहलौर में उनके नाम पर 3 किमी लंबी एक सड़क और हॉस्पिटल बनवाने का फैसला किया।
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अरूणिमा सिन्हा (जन्म:1988) भारत से राष्ट्रीय स्तर की पूर्व वालीबाल खिलाड़ी तथा माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय विकलांग हैं।
Arunima Sinha का जन्म सन 1988 में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ अरुणिमा की रुचि बचपन से ही स्पोर्ट्स में रही वह एक नेशनल वॉलीबॉल प्लेयर भी थी। उनकी लाइफ में सब कुछ समान्य चल रहा था। तभी उनके साथ कुछ ऐसा घटित हुआ जिसके चलते उनकी जिंदगी का इतिहास ही बदल गया। क्या थी वह घटना जिसके चलते उन्होंने नए कीर्तिमान रच दिये आइए जानते हैं।
अरुणिमा सिन्हा 11 अप्रैल 2011 को पद्मावती एक्सप्रेस (Padmavati Express) से लखनऊ से दिल्ली जा रही थी रात के लगभग एक बजे कुछ शातिर अपराधी ट्रैन के डिब्बो में दाखिल हुए और अरुणिमा सिन्हा को अकेला देखकर उनके गले की चैन छिनने का प्रयास करने लगे जिसका विरोध अरुणिमा सिन्हा ने किया तो उन शातिर चोरो ने अरुणिमा सिन्हा को चलती हुई ट्रैन बरेली के पास बाहर फेक दिया जिसकी वजह से अरुणिमा सिन्हा का बाया पैर पटरियों के बीच में आ जाने से कट गया पूरी रात अरुणिमा सिन्हा कटे हुए पैर के साथ दर्द से चीखती चिल्लाती रही लगभग 40 – 50 ट्रैन गुजरने के बाद पूरी तरह से अरुणिमा सिन्हा अपने जीवन की आस खो चुकी थी लेकिन शायद अरुणिमा सिन्हा के जीवन के किस्मत को कुछ और ही मंजूर था
फिर लोगो को इस घटना के पता चलने के बाद इन्हें नई दिल्ली (New Delhi) के AIIMS में भर्ती कराया गया जहा अरुणिमा सिन्हा अपने जिंदगी और मौत से लगभग चार महीने तक लड़ती रही और जिंदगी और मौत के जंग में अरुणिमा सिन्हा की जीत हुई और फिर अरुणिमा सिन्हा के बाये पैर को कृत्रिम पैर के सहारे जोड़ दिया गया
अरुणिमा सिन्हा के इस हालत को देखकर डॉक्टर भी हार मान चुके थे और उन्हें आराम करने की सलाह दे रहे थे जबकि परिवार वाले और रिस्तेदारो के नजर में अब अरुणिमा सिन्हा कमजोर और विंकलांग हो चुकी थी लेकिन अरुणिमा सिन्हा ने अपने हौसलो में कोई कमी नही आने दी और किसी के आगे खुद को बेबस और लाचार घोसित नही करना चाहती थी
“मंजिल मिल ही जाएगी भटकते हुए ही सही, गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं।”
अरुणिमा यहीं नहीं रुकीं। युवाओं और जीवन में किसी भी प्रकार के अभाव के चलते निराशापूर्ण जीवन जी रहे लोगों में प्रेरणा और उत्साह जगाने के लिए उन्होंने अब दुनिया के सभी सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को लांघने का लक्ष्य तय किया है। इस क्रम में वे अब तक अफ्रीका की किलिमंजारो (Kilimanjaro: To the Roof of Africa) और यूरोप की एलब्रुस चोटी (Mount Elbrus) पर तिरंगा लहरा चुकी हैं।
दोस्तों अरुणिमा अगर हार मानकर और लाचार होकर घर पर बैठ जाती तो आज वह अपने घर-परिवार के लोगों पर बोझ होती। सम्पूर्ण जीवन उन्हें दूसरों के सहारे गुजारना पड़ता। लेकिन उनके बुलंद हौसले और आत्मविश्वास ने उन्हें टूटने से बचा लिया। दोस्तों मुश्किलें तो हर इंशान के जीवन में आतीं हैं, लेकिन विजयी वही होता है जो उन मुश्किलों से, बुलन्द हौसलों के साथ डटकर मुकाबला करता है। अरुणिमा सिन्हा हमारे देश की शान है और हमें उनसे जीवन में आने वाले दुःखों और कठिनाइयों से लड़ने की प्रेरणा लेनी चाहिए। हम तहे दिल से अरुणिमा सिन्हा को सलाम करते हैं।
इस तरह अरुणिमा ने वापस लौटने में सफलता हासिल की और सभी को चौंकने पर मजबूर कर दिया। Arunima ने साबित कर दिया कि अगर इंसान सच्चे दिल से चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकता। चाहे वह औरत हो या आदमी या फिर कोई विकलांग। अरुणिमा का कहना है कि-" इंसान शरीर से विकलांग नहीं होता बल्कि मानसिकता से विकलांग होता है"।अरुणिमा की इच्छा है की वह विश्व की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करें। जिनमें से चार उन्होंने सफलतापूर्वक फतेह कर ली है।
उद्यम
अपराधियों द्वारा चलती ट्रेन से फेंक दिए जाने के कारण एक पैर गंवा चुकने के बावजूद अरूणिमा ने गजब के जीवट का परिचय देते हुए 21 मई 2013 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (29028 फुट) को फतह कर एक नया इतिहास रचते हुए ऐसा करने वाली पहली विकलांग भारतीय महिला होने का रिकार्ड अपने नाम कर लिया। ट्रेन दुर्घटना से पूर्व उन्होने कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में राज्य की वॉलीबाल और फुटबॉल टीमों में प्रतिनिधित्व किया है।
सम्मान/पुरस्कार
उत्तर प्रदेश में सुल्तानपुर जिले के भारत भारती संस्था ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वाली इस विकलांग महिला को सुल्तानपुर रत्न अवॉर्ड से सम्मानित किये जाने की घोषणा की। सन 2016 में अरुणिमा सिन्हा को अम्बेडकरनगर रत्न पुरस्कार से अम्बेडकरनगर महोत्सव समिति की तरफ से नवाजा गया
अरुणिमा सिन्हा के मोटिवेशनल शब्द -
अभी तो इस बाज की असली उड़ान बाकी है,
अभी तो इस परिंदे का इम्तिहान बाकी है।
अभी अभी तो मैंने लांघा है समंदरों को,
अभी तो पूरा आसमान बाकी है!!!
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